UPI भुगतान पर शुल्क लगाए जाने की आशंका के बीच वित्त मंत्रालय ने सफ़ाई दी है कि आम नागरिकों को UPI से भुगतान करने पर कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं देना होगा। मंत्रालय ने कहा कि व्यक्ति से व्यक्ति के बीच सभी UPI लेनदेन भी मुफ्त बने रहेंगे। हालाँकि सरकार ने यह भी साफ़ किया है कि भविष्य में अगर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR लागू किया जाता है तो यह सभी कारोबारियों पर एक समान नहीं लगाया जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था में केवल एक तय सीमा से ऊपर और सीमित श्रेणी के कारोबारी लेनदेन पर मामूली शुल्क लगाया जा सकता है। मंत्रालय के मुताबिक यह शुल्क डेबिट या क्रेडिट कार्ड से लिए जाने वाले MDR से काफी कम होगा।

यह सफाई संसद में टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल 2026 पेश होने के बाद UPI शुल्क को लेकर उठी आशंकाओं के बीच आई है। यह बिल लोकसभा में पास किया जा चुका है। इस विधेयक में वह प्रस्ताव है जिससे बैंकों और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर्स को UPI और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान पर शुल्क लेने का अधिकार मिल जाएगा।
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क्या आम लोगों को पैसे देने होंगे?

इस सवाल पर वित्त मंत्रालय ने कहा है कि 'नहीं'। मंत्रालय ने कहा कि UPI से भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। खास तौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। मंत्रालय ने कहा है कि बिल में किए गए बदलाव को आम यूजरों पर UPI शुल्क लगाने की योजना के रूप में समझना गलत है।

इसने यह भी किया है कि भविष्य में यदि मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR लागू किया भी जाता है तो वह थ्रेशोल्ड आधारित होगा। यानी हर UPI लेनदेन पर शुल्क लगाने की बात नहीं है।

बड़े कारोबारियों पर लग सकता है शुल्क

वित्त मंत्रालय के अनुसार यदि MDR लागू किया जाता है तो यह केवल एक निश्चित सीमा से ऊपर के कुछ कारोबारी लेनदेन पर लागू होगा। इसका मतलब यह है कि छोटे दुकानदारों, किराना स्टोर और छोटे कारोबारियों पर इसका असर नहीं पड़ने की संभावना है। भुगतान उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि संभावित शुल्क मुख्य रूप से बड़े कारोबारियों पर लगाया जा सकता है। हालांकि अंतिम सीमा अभी तय नहीं हुई है।

एक संभावना यह है कि 50 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार करने वाले कारोबारियों को इस व्यवस्था के दायरे में रखा जाए, क्योंकि आयकर कानून की धारा 269SU इसी सीमा से अधिक कारोबार करने वालों पर लागू होती है। कुछ जानकारों ने इससे कम करीब 1 से 1.5 करोड़ रुपये की सीमा की संभावना भी जताई है। अभी इस सीमा पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

MDR क्या है?

MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए कारोबारी से लिया जाता है। कार्ड से भुगतान के मामले में यह शुल्क आमतौर पर बैंक, कार्ड नेटवर्क और भुगतान से जुड़े दूसरे पक्षों के बीच बांटा जाता है। क्रेडिट कार्ड पर MDR आम तौर पर 1 से 3 फीसदी तक और डेबिट कार्ड पर करीब 0.9 फीसदी तक हो सकता है।

UPI के मामले में जनवरी 2020 से नियमित बैंक-खाता से भुगतान पर जीरो MDR की व्यवस्था रही है। सरकार ने इसके बजाय भुगतान प्रणाली से जुड़े पक्षों को प्रोत्साहन राशि देकर इस व्यवस्था को चलाया है। अब सरकार का तर्क है कि UPI के लगातार बढ़ते इस्तेमाल के साथ पूरे सिस्टम को लंबे समय तक चलाने के लिए एक टिकाऊ वित्तीय मॉडल की जरूरत है।

संसद में बिल आने के बाद क्यों शुरू हुआ विवाद?

सरकार ने संसद में टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल 2026 पेश किया है। लोकसभा से पारित हो चुके इस विधेयक में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट 2007 में बदलाव का प्रस्ताव है। इस बदलाव से बैंकों और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर्स के लिए यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड भुगतान पर शुल्क लेने का रास्ता खुल सकता है। इसी के बाद आशंका जताई जाने लगी कि यदि कारोबारियों से एमडीआर लिया गया तो वे इसकी भरपाई ग्राहकों से कर सकते हैं। वित्त मंत्रालय ने अब इसी आशंका को दूर करने की कोशिश की है।

मंत्रालय ने कहा कि यूपीआई के अधिकांश लेनदेन मुफ्त बने रहेंगे और एमडीआर को यदि लागू किया गया तो सभी लेनदेन पर इसे नहीं लगाया जाएगा।

2000 रुपये से ज्यादा के लेनदेन पर नजर

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में यूपीआई के व्यक्ति से व्यक्ति भुगतान में सिर्फ करीब 4 फीसदी लेनदेन ऐसे थे जिनकी राशि 2000 रुपये से अधिक थी। लेकिन इन 4 फीसदी लेनदेन की कुल यूपीआई भुगतान मूल्य में हिस्सेदारी करीब दो-तिहाई थी। यही वजह है कि बड़े मूल्य वाले कारोबारी लेनदेन पर MDR लगाने का विकल्प सरकार के लिए अहम माना जा रहा है। 

इस व्यवस्था में छोटे और कम मूल्य वाले डिजिटल भुगतान को मुफ्त रखते हुए बड़े कारोबार से यूपीआई के संचालन की लागत का कुछ हिस्सा वसूलने की कोशिश की जा सकती है।

सरकार का दावा क्या?

वित्त मंत्रालय का कहना है कि यूपीआई अब केवल भुगतान का माध्यम नहीं है, बल्कि भारत के डिजिटल बुनियादी ढाँचे का अहम हिस्सा बन चुका है। 2025-26 में यूपीआई पर 24000 करोड़ से अधिक लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 314 लाख करोड़ रुपये रही। लेनदेन की संख्या में पिछले साल की तुलना में करीब 30 फीसदी और कुल मूल्य में करीब 21 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इतने बड़े स्तर पर सिस्टम को चलाने के लिए बैंक, NPCI, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और तकनीकी कंपनियों को लगातार खर्च करना पड़ता है। सरकार अब मानती है कि केवल सरकारी सब्सिडी के भरोसे UPI के अगले चरण का विस्तार करना लंबे समय तक संभव नहीं होगा।

अभी तक सरकार देती रही है प्रोत्साहन राशि

यूपीआई को मुफ्त रखने के लिए केंद्र सरकार छोटे कारोबारियों के लिए कम मूल्य वाले UPI और RuPay डेबिट कार्ड लेनदेन पर प्रोत्साहन योजना चलाती रही है। इस योजना के तहत 2000 रुपये तक के कुछ भुगतान पर अधिकतम 0.15 फीसदी तक प्रोत्साहन दिया जाता है। यह राशि बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और थर्ड-पार्टी ऐप प्रोवाइडर्स के बीच बांटी जाती है।
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2021-22 से 2024-25 के बीच केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत क़रीब 8730 करोड़ रुपये का भुगतान किया। हालाँकि वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह राशि भुगतान उद्योग द्वारा उठाई गई कुल लागत का केवल करीब 11 फीसदी थी।

कांग्रेस ने सरकार पर उठाए सवाल

यूपीआई शुल्क की संभावित व्यवस्था को लेकर कांग्रेस ने सरकार पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि MDR की लागत आखिरकार आम लोगों पर ही पड़ सकती है। उनका कहना है कि यदि कारोबारियों पर शुल्क लगाया गया तो वे किसी न किसी रूप में इसे ग्राहकों से वसूलने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि UPI व्यवस्था की लागत को भारतीय रिजर्व बैंक के ज़रिए क्यों नहीं पूरा किया जा सकता। जयराम रमेश ने RBI द्वारा 2025-26 में केंद्र सरकार को दिए गए क़रीब 2.86 लाख करोड़ रुपये के लाभांश का भी ज़िक्र किया।

क्या यूपीआई शुल्क के पीछे अमेरिकी दबाव है?

इस मुद्दे का एक दूसरा पहलू भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से जुड़ा है। जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि UPI और RuPay को लेकर अमेरिका की व्यापार संबंधी आपत्तियों के बीच यह बदलाव सामने आया है। अमेरिकी यूएसटीआर की 2026 की नेशनल ट्रेड एस्टिमेट रिपोर्ट में भारत के इलेक्ट्रॉनिक भुगतान क्षेत्र को लेकर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत की कुछ नीतियां घरेलू भुगतान कंपनियों को विदेशी कंपनियों की तुलना में लाभ देती हैं।
अमेरिकी रिपोर्ट में यूपीआई में विदेशी भुगतान सेवा प्रदाताओं की भागीदारी और थर्ड-पार्टी यूपीआई ऐप्स के लिए 30 फीसदी बाजार हिस्सेदारी की सीमा का भी ज़िक्र किया गया था। हालाँकि वित्त मंत्रालय ने साफ तौर पर कहा है कि यह दावा कि बाहरी दबाव के कारण भारत अपनी यूपीआई नीति बदल रहा है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है।

फोनपे और गूगल पे की बड़ी हिस्सेदारी

यूपीआई के बाजार में कुछ बड़े ऐप्स का दबदबा भी इस बहस में शामिल है। फोनपे और गूगल पे मिलकर यूपीआई के करीब 80 फीसदी लेनदेन संभालते हैं। थर्ड-पार्टी ऐप्स के लिए 30 फीसदी बाजार हिस्सेदारी की सीमा लागू करने की समयसीमा कई बार टाली जा चुकी है और फिलहाल दिसंबर 2026 की समयसीमा बताई गई है। ऐसे में UPI शुल्क और बाजार हिस्सेदारी से जुड़े नियमों का असर भारत के डिजिटल भुगतान बाजार पर बड़ा हो सकता है।

बहरहाल, वित्त मंत्रालय की मौजूदा सफाई से इतना साफ़ है कि सरकार आम उपभोक्ताओं से यूपीआई इस्तेमाल करने के लिए सीधे शुल्क लेने की योजना नहीं बता रही है। व्यक्ति से व्यक्ति भुगतान मुफ्त रहेगा और अधिकांश छोटे लेनदेन भी मुफ्त रहने की बात कही गई है। संभावित एमडीआर का बोझ मुख्य रूप से बड़े और तय सीमा से ऊपर के कारोबारी लेनदेन पर डाला जा सकता है। हालांकि कितनी राशि से ऊपर एमडीआर लगेगा, कितनी दर होगी और किन कारोबारियों पर लागू होगा, इसका अंतिम ढांचा अभी तय नहीं हुआ है। इसलिए फिलहाल यूपीआई यूजरों के लिए राहत की बात यह है कि QR कोड स्कैन कर सामान्य UPI भुगतान करने पर कोई नया शुल्क नहीं लगाया जा रहा है। लेकिन बड़े कारोबारियों के लिए भविष्य में UPI भुगतान की लागत बढ़ सकती है और इस बदलाव का अंतिम स्वरूप सरकार के आगे के फैसलों पर निर्भर करेगा।