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छात्रों को स्कूल लाने के लिए कश्मीर में 5-12वीं की परीक्षा की तारीख़ें तय

जम्मू-कश्मीर में ढाई महीने से पाबंदी है। दुकानें बंद हैं। सार्वजनिक परिवहन भी नहीं चल रहा है। कर्फ़्यू जैसे हालात हैं। ख़ौफ़ का माहौल है। स्कूल खुले हैं, लेकिन न तो बच्चे जा रहे हैं और न ही अध्यापक। सरकार के तमाम प्रयास के बाद भी स्कूलों में बच्चे नहीं जा रहे हैं। ऐसे में ही स्कूलों में बच्चों को लाने के लिए जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अब नयी तरकीब निकाली है। इसके लिए इसने स्कूलों में वार्षिक परीक्षाएँ घोषित कर दी हैं। परीक्षाएँ होंगी तो बच्चों को स्कूल जाने की मजबूरी होगी। प्रशासन को शायद लगता है कि क़रीब एक महीने तक चलने वाली परीक्षा के लिए अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजेंगे और स्थिति को सामान्य करने में मदद मिलेगी।

स्टेट इंस्टिट्यूट ऑफ़ एजुकेशन यानी एसईआई और जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन यानी जेकेबीओएसई ने कक्षा पाँच से लेकर 12वीं तक के लिए परीक्षा की तारीख़ें तय की हैं। जेकेबीओएसई चेयरपर्सन वीना पंडिता ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' से कहा कि 10वीं की परीक्षा 29 अक्टूबर, 12वीं की 30 अक्टूबर और 9वीं की परीक्षा 18 नवंबर से शुरू होगी। 10वीं की परीक्षा 20 दिन में जबकि 9वीं और 12वीं की परीक्षा क़रीब एक माह में पूरी होगी। कश्मीर के शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार कश्मीर डिविजन में निजी और सरकारी स्कूलों में 5वीं से 12वीं तक 6.5 लाख छात्र हैं।

रिपोर्ट के अनुसार परीक्षा कराने का एक ऐसा ही फ़ैसला 2016 में भी तब लिया गया था जब हिज़्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद एक महीना तक हिंसात्मक प्रदर्शन होता रहा था। तब महबूबा मुफ़्ती की सरकार ने बंद के दौरान ही परीक्षाओं की घोषणा की थी।
पाँच अगस्त को अनुच्छेद 370 में फेरबदल के बाद से बंद स्कूलों को खुलने पर सरकार की ओर से बढ़-चढ़ कर यह दावा किया गया था कि सबकुछ इतना सामान्य है कि अब स्कूल तक खुल गए, लेकिन अभिभावक सुरक्षा की स्थिति का हवाला देते हुए बच्चों को स्कूल ही नहीं भेज रहे हैं। अभिभावकों में ख़ौफ़ का माहौल है।
ख़ौफ़ का माहौल इसलिए भी है कि पिछले एक हफ़्ते में जब से सोमवार को पोस्टपैड मोबाइल सेवा को शुरू किया गया है तब से आतंकियों ने पुलवामा और शोपियाँ में कई हमले किए हैं और तीन लोगों को मार डाला है। सोमवार को ही शोपियाँ में राजस्थान के एक ट्रक चालक को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलवामा में छत्तीसगढ़ के एक मजदूर की हत्या कर दी गई थी और पंजाब के फल लादने वाले चरणजीत सिंह की शोपियाँ में बुधवार को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हमले में चरणजीत सिंह के मालिक भी गंभीर रूप से घायल हो गए। 
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ऐसा नहीं है कि सरकार को ऐसी स्थिति के बारे में पता नहीं है। पिछले हफ़्ते सरकार ने ही एक विज्ञापन निकाला था जिसमें इसने माना था कि जम्मू-कश्मीर में सबकुछ ठीक नहीं है। जम्मू कश्मीर सरकार के इस विज्ञापन की पहली लाइन थी, ‘दुकानें बंद’, ‘कोई सार्वजनिक परिवहन नहीं’। पाँच अगस्त को अनुच्छेद 370 में बदलाव किए जाने के बाद यह पहली बार है कि सरकार ने ऐसी बात मानी हो। इससे पहले तो सरकार ये दावे करती रही है कि राज्य में शांति है और लोग सरकार के फ़ैसले का समर्थन कर रहे हैं। पाबंदी लगाए जाने के बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों और पत्थरबाज़ी की घटनाओं की ख़बरों को भी सरकार यह कहकर ख़ारिज़ करती रही है कि दो महीने में एक गोली तक नहीं चली है। लेकिन सरकार अपने ही इन दावों को जम्मू-कश्मीर के कई अख़बारों में जारी अपने विज्ञापन में ‘झूठा’ साबित करती हुई दिखती है। 

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बच्चों की सुरक्षा की चिंता

हालाँकि इस विज्ञापन में स्कूलों के संबंध में कोई ज़िक्र नहीं है, लेकिन रिपोर्टें तो ऐसी आ रही हैं कि स्कूलों में बच्चों को अभिभावक नहीं भेज रहे हैं। इस पर 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने अभिभावकों, स्कूल संचालकों और छात्रों से बातचीत के आधार पर एक रिपोर्ट छापी है। 

अख़बार के अनुसार, श्रीनगर के बुचपोरा इलाक़े में रहने वाले एजाज़ अहमद ने कहा, 'सामान्य स्थिति दिखाने के लिए सरकार हमारे बच्चों के जीवन को ख़तरे में डाल रही है। वे हर चीज के साथ राजनीति करते रहे हैं और अब शिक्षा के साथ भी राजनीति कर रहे हैं।' उन्होंने कहा, 'बच्चों का स्कूल जाना ज़रूरी है लेकिन उनकी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? और यह भी कि वे दूसरे टर्म (सेमेस्टर) में बिना एक महीने की पढ़ाई किए ही परीक्षा में कैसे बैठेंगे।' कई ऐसी रिपोर्टें आई हैं जिसमें कहा गया है कि सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र अभिभावक बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रहे हैं।

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स्कूल संचालकों के लिए चुनौती

स्कूल संचालकों के लिए स्कूलों का ठीक ढंग से संचालन करना सबसे बड़ी चुनौती है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, श्रीनगर के बुचपोरा इलाक़े में स्थित ग्रीन वैली स्कूल के चेयरमैन मोहम्मद यूसुफ़ ने कहा, 'हमारा स्कूल हर दिन खुला रहता है, लेकिन छात्र नहीं आते हैं। हर माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चिंता उनके बच्चे की सुरक्षा है। डर ऐसा है कि हमारे ड्राइवर भी बच्चों को स्कूल लाने के लिए तैयार नहीं हैं।' दूसरे स्कूलों के संचालक भी ऐसी ही स्थिति का हवाला देते हैं। 

अख़बार के अनुसार, श्रीनगर में 12वीं कक्षा के छात्र अकीब अहमद ने कहा, '5 अगस्त से स्कूल बंद है। मैं अपने घर पर ही पढ़ रहा हूँ, शिक्षा विभाग को पाठ्यक्रम में कुछ छूट देने की घोषणा करनी चाहिए।'

सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि घाटी में सफलतापूर्वक परीक्षा कराना 'सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा' होगी। 

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