आतंकवादियों द्वारा कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाने और नई हिटलिस्ट जारी करने से सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कश्मीरी पंडित अब गृहमंत्री अमित शाह और पीएम मोदी के नाम खुला ख़त लिखकर आरोप लगा रहे हैं कि 'यह कश्मीर की छद्म नॉर्मेल्सी है'।
जम्मू-कश्मीर में प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को एक बार फिर आतंकियों की नई धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। कथित तौर पर लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक संगठन की ओर से जारी नई 'हिट लिस्ट' में कई कर्मचारियों के नाम, मोबाइल नंबर, घर के पते और वाहन नंबर सार्वजनिक किए गए हैं। धमकी दी गई है कि वे नौकरी छोड़ दें, नहीं तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इन धमकियों के बाद घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के बीच एक बार फिर भय का माहौल बन गया है। पीड़ित और एक्टिविस्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को खुला पत्र लिखकर सवाल उठा रहे हैं कि यदि कश्मीर में हालात सामान्य हैं तो फिर कश्मीरी पंडितों को लगातार आतंकियों की धमकियाँ क्यों मिल रही हैं।
नई हिट लिस्ट से बढ़ी चिंता
पिछले सप्ताह जारी धमकी भरे पत्रों में कई कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का नाम लेकर उन्हें निशाना बनाया गया है। इन पत्रों में उनके मोबाइल नंबर, जम्मू स्थित घरों के पते और वाहनों के पंजीकरण नंबर तक शामिल हैं। पीड़ितों का कहना है कि उनकी निजी जानकारी सोशल मीडिया पर भी फैलाई गई है, जिससे उनकी और उनके परिवार की सुरक्षा को गंभीर ख़तरा पैदा हो गया है।एक्टिविस्ट सबा कौल का खुला पत्र
कश्मीरी पंडित समुदाय की आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सबा कौल ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को खुला पत्र लिखकर कहा कि कश्मीरी पंडित लगातार असुरक्षा के माहौल में जी रहे हैं। उन्होंने लिखा कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सामान्य स्थिति और पुनर्वास के जो दावे किए गए थे, उनकी वास्तविकता अलग है। घाटी में लौटने वाले कश्मीरी पंडित आज भी टार्गेटेड हत्याओं, धमकियों और डर के साये में जीवन बिता रहे हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल केवल 'सामान्य स्थिति' दिखाने के लिए किया जा रहा है, जबकि उनकी सुरक्षा नहीं की जा रही है। उन्होंने सरकार से ठोस सुरक्षा-व्यवस्था और पुनर्वास नीति लागू करने की मांग की।
डेटा लीक पर गंभीर सवाल
सबा कौल ने सोशल मीडिया पर इसे 'भयावह सुरक्षा संकट' बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्मचारियों की निजी जानकारी लीक होना एक बड़ी सुरक्षा चूक है। उन्होंने गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल कार्यालय से मांग की कि इस कथित डेटा लीक की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और घाटी में काम कर रहे कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ाई जाए। सबा कौल ने अपनी पोस्टों में बताया है कि उन्होंने अपना घर, माता-पिता और भाई खो दिया।
'साँप' कहकर दी गई हिंसा की धमकी
धमकी भरे संदेशों में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत घाटी में लौटे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को 'सांप' बताते हुए उनके ख़िलाफ़ हिंसा, आगजनी और संपत्ति नष्ट करने की खुली धमकी दी गई है। इनमें कहा गया है कि वे अपनी नौकरी छोड़ दें, अन्यथा उन्हें जान से मार दिया जाएगा।बताया जा रहा है कि इन पत्रों को यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल यानी यूएलसी नाम के संगठन ने जारी किया है, जिसे सुरक्षा एजेंसियां पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का सहयोगी या मुखौटा संगठन मान रही हैं। हालांकि अधिकारियों ने अभी तक इन पत्रों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
कर्मचारी संगठनों ने भी उठाई आवाज़
प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों से जुड़े कार्यकर्ता राकेश हांडू ने भी प्रधानमंत्री, उपराज्यपाल और जम्मू-कश्मीर पुलिस के साइबर क्राइम विंग को शिकायत भेजी है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि आतंकियों ने साफ़ शब्दों में कहा है कि स्थानीय और बाहरी कर्मचारियों में कोई फर्क नहीं किया जाएगा और ज़रूरत पड़ने पर 'लाशें उनके गृह राज्यों में भेजी जाएंगी।' उन्होंने इस मामले में एफआईआर दर्ज करने और सभी कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।
कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति यानी KPSS के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने कहा कि इन धमकियों को घाटी में पंडित सरकारी कर्मचारियों की टारगेटेड किलिंग और सुरक्षा को लेकर बार-बार उठ रही चिंताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। डीडब्ल्यू से उन्होंने कहा कि वे सुरक्षा में खामियों को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं कि 2022 में हत्याओं का दौर शुरू होने के बाद से अधिकारियों के साथ कई बैठकें हुई हैं, लेकिन उनसे उनकी चिंताओं का कोई समाधान नहीं निकला है। टिक्कू ने कहा, '2022 से अब तक हुई बैठकों का कोई नतीजा नहीं निकला है।' उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि धमकी देने वालों के पास कर्मचारियों की निजी जानकारी कैसे पहुँच रही है। टिक्कू ने पूछा, 'ये जानकारियां सोशल मीडिया पर कैसे पोस्ट की जा रही हैं?'
7000 कर्मचारियों पर ख़तरे की आशंका
प्रधानमंत्री पुनर्वास योजना के तहत वर्ष 2008 से शुरू हुई योजना में पहले 3000 और बाद में 3000 अतिरिक्त सरकारी नौकरियाँ स्वीकृत की गई थीं। फ़िलहाल क़रीब 7000 कश्मीरी पंडित कर्मचारी घाटी में कार्यरत बताए जा रहे हैं। आतंकी संगठनों की धमकियाँ अब इन सभी कर्मचारियों को प्रभावित करती दिखाई दे रही हैं।आवास और सुरक्षा पर भी सवाल
राकेश हांडू ने दावा किया कि सरकार ने हजारों ट्रांजिट आवास बनाने का दावा किया था, लेकिन उनमें से बहुत कम कर्मचारियों को आवंटित किए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई आवास असुरक्षित इलाकों में हैं, जहां न पर्याप्त सड़क है, न सुरक्षा व्यवस्था और न ही बुनियादी सुविधाएं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार सामान्य स्थिति का दावा करती है तो सबसे पहले कर्मचारियों को सुरक्षित आवास और मज़बूत सुरक्षा व्यवस्था मिलनी चाहिए।
राजनीतिक बहस भी तेज
इन धमकियों को लेकर जम्मू-कश्मीर की राजनीति भी गरमा गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने सवाल उठाया कि केवल प्रधानमंत्री पैकेज के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को ही धमकियाँ क्यों मिल रही हैं। उन्होंने इसे प्रशासन से जुड़ी साज़िश तक बताया और दावा किया कि उनका मक़सद राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी करना है। अब्दुल्ला ने यह सवाल भी उठाया कि इलाके के बाहर से आए हिंदू अधिकारियों को ऐसी धमकियों का सामना क्यों नहीं करना पड़ रहा है।उनके बयानों की कश्मीरी पंडित समूहों और बीजेपी ने कड़ी आलोचना की। उन्होंने अब्दुल्ला पर समुदाय के डर के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया। बीजेपी ने इस बयान को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि आतंकवाद को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही धमकियों को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों से धमकियों के स्रोत का पता लगाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की।
पुनर्वास नीति पर फिर उठे सवाल
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि केवल सरकारी नौकरियां और आवास उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि जब तक घाटी में रहने और काम करने वाले कर्मचारियों को पूरी सुरक्षा का भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक पुनर्वास की योजना अधूरी रहेगी। लगातार मिल रही आतंकी धमकियों ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या घाटी में लौटे कश्मीरी पंडित वास्तव में सुरक्षित हैं, या फिर वे आज भी आतंकवाद के निशाने पर हैं। और घाटी में सामान्य स्थिति बहाल होने का दावा कितना सही है।