जम्मू के माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की मंजूरी क्या इसलिए वापस ले ली गई कि इसमें ज़्यादा मुस्लिम छात्रों का एडमिशन हो गया था और दक्षिणपंथी समूहों के प्रदर्शन से विवाद हो गया था? राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग यानी एनएमसी के इस ताज़ा फ़ैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोग ऐसे ही सवाल उठा रहे हैं। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस से एमबीबीएस कोर्स चलाने की मंजूरी वापस ले ली है। यह कॉलेज 2025-26 सत्र के लिए 50 सीटों पर एमबीबीएस कोर्स शुरू करने वाला था। इन सीटों में से 44 पर नीट की मेरिट के आधार पर मुस्लिम छात्र आ गए। फिर क्या था, विवाद हो गया हिंदू-मुस्लिम का।

कॉलेज के पहले बैच में 50 में से 44 छात्र मुस्लिम थे। इनको NEET में उनकी मेरिट के आधार पर चुना गया था। लेकिन स्थानीय लोग और विभिन्न हिंदू संगठन नाराज थे कि इसमें ज़्यादा मुस्लिमों का प्रवेश कैसे हो गया। उनका कहना था कि कॉलेज श्री माता वैष्णो देवी श्राइन के दान से बना है, जो मुख्य रूप से हिंदू भक्तों का है। इसलिए हिंदू छात्रों को आरक्षण मिलना चाहिए। इस मुद्दे पर काफी हंगामा हुआ। कुछ लोग एडमिशन रद्द करने की मांग कर रहे थे।
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एनएमसी ने दी थी मंजूरी?

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग यानी एनएमसी ने पिछले साल एनएमसी की मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड यानी एमएआरबी ने दिसंबर 2024 में नए मेडिकल कॉलेजों के लिए आवेदन मांगे थे। श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ने भी आवेदन किया। एनएमसी की एक्सपर्ट्स की टीम द्वारा डिटेल इंस्पेक्शन के बाद लेटर ऑफ़ परमिशन जारी किया गया था। यानी कॉलेज को एमबीबीएस कोर्स चलाने की इजाज़त दी गई थी, जिसमें 50 स्टूडेंट्स को एडमिशन दिया गया था। लेकिन अब एनएमसी को बड़ी कमियाँ नज़र आ गई हैं।

एनएमसी ने अब क्यों बदला फ़ैसला?

पिछले दो हफ्तों में एनएमसी को कई शिकायतें मिलीं। इनमें कॉलेज की सुविधाओं पर गंभीर आरोप थे। एमएआरबी ने अचानक फिजिकल इंस्पेक्शन करवाया। टीम की रिपोर्ट में शिकायतें सही पाई गईं। एनएमसी ने कहा कि कॉलेज में बुनियादी सुविधाओं की बड़ी कमी है। इसने कहा है कि पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं, क्लिनिकल सामग्री की कमी है, योग्य टीचरों की कमी और रेजिडेंट डॉक्टरों की अपर्याप्त संख्या है।

एनएमसी के पत्र में कहा गया, 'कमियां बहुत बड़ी और गंभीर हैं। अगर कॉलेज ऐसे ही चलता तो मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता खराब होती और छात्रों का भविष्य प्रभावित होता।' यह कहते हुए एनएमसी ने 2025-26 सत्र के लिए 50 सीटों वाली एमबीबीएस की मंजूरी वापस ले ली।

एडमिशन ले चुके छात्रों का क्या होगा?

कॉलेज में पहले ही 50 छात्रों का एडमिशन हो चुका था। एनएमसी ने छात्रों के हितों की रक्षा के लिए राज्य-केंद्र शासित प्रदेश अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। इन छात्रों को जम्मू-कश्मीर के अन्य मेडिकल कॉलेजों में सुपरन्यूमरेरी सीटों पर एडजस्ट किया जाएगा। यह नियमों के मुताबिक होगा।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का बयान

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस विवाद पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। एचटी की रिपोर्ट के अनुसार एनएमसी के फ़ैसले से पहले उन्होंने बीजेपी सरकार से कहा था कि वह छात्रों को अन्य कॉलेजों में एडजस्ट करे। उमर ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह शिक्षा, खेल और खाने की आदतों पर सांप्रदायिक राजनीति कर रही है। उमर ने कहा था, 'ये बच्चे परीक्षा पास करके अपनी मेहनत से सीट हासिल किए हैं। किसी ने उन पर कोई एहसान नहीं किया। अगर आप उन्हें वहां नहीं चाहते तो कहीं और एडजस्ट करिए।'
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भाविका कपूर नाम के यूज़र ने एक्स पर लिखा है, 'भारतीय मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत की हदें पार हो गईं। सरकारी स्तर पर कट्टरता! कितनी शर्म की बात है...। 50 सीटों में से 42 मुस्लिम छात्रों ने मेडिकल एजुकेशन के लिए NEET एग्जाम पास करने के बाद एडमिशन लिया और उन्हें माता वैष्णो देवी कॉलेज में एडमिशन मिला। लेकिन, बीजेपी सरकार को यह पसंद नहीं आया। स्थानीय हिंदुत्व गुंडों ने पहले हंगामा और विवाद खड़ा किया और जब वे सब कुछ में फेल हो गए, तो बीजेपी ने कॉलेज की मान्यता रद्द करने का फैसला किया। यह दमन का एक साफ़ मामला है और मुस्लिम युवाओं को बर्बाद करने की जानबूझकर की गई चाल है। बीजेपी चाहती है कि भारत में मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँ।'
इस विवाद ने सांप्रदायिक तनाव बढ़ा दिया है। अब छात्रों का एडजस्टमेंट कैसे होता है, इस पर सभी की नज़र है। एनएमसी ने साफ़ कर दिया कि छात्रों का भविष्य सुरक्षित रहेगा, लेकिन कॉलेज की कमियाँ बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। यह घटना दिखाती है कि शिक्षा जैसे क्षेत्र में राजनीति और सांप्रदायिकता कितनी जल्दी घुस सकती है।