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नरसिम्हा राव के बाद देवराज अर्स को याद कर क्या कांग्रेस ख़ुद को बदल रही है? 

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के बाद अब कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराज अर्स! कांग्रेस क्या अब अपने पुराने योद्धाओं की विरासत को भुनाने की रणनीति पर चल रही है? जिस तरह 15 अगस्त को कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया पर 'धरोहर और विरासत' के नाम से कैम्पेन चलाया यह इस बात का संकेत दे रहा है कि पार्टी अब अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए पुराने क्षत्रपों का सहारा ले रही है। 

20 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती है और इसी दिन कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराज अर्स की भी जयंती है। इस अवसर पर कांग्रेस कनार्टक में ‘जन ध्वनि’ आंदोलन करने जा रही है। यह आंदोलन भूमि सुधार व एपीएमसी क़ानून में बदलाव के ख़िलाफ़ तथा कोरोना संकट में राज्य सरकार की विफलताओं विरोध में किया जा रहा है। इस आंदोलन में यकायक देवराज अर्स की याद आना एक बदलाव का संकेत है।  
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कांग्रेस के बड़े नेता

देवराज अर्स कर्नाटक में कांग्रेस के एक बड़े नेता हुआ करते थे, वह प्रदेश के  पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने 5 साल का कार्यकाल पूर्ण किया था। उसके बाद सिद्धारमैया ही ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने 5 साल का कार्यकाल पूर्ण किया है। लेकिन देवराज अर्स पर एक जमाने में इंदिरा गांधी का साथ छोड़कर अलग पार्टी बनाने यानी बग़ावत का सिक्का भी चस्पा है।
इंदिरा गांधी की वापसी के बाद जैसे ही एक बार फिर कांग्रेस में संजय गांधी का कद बढ़ा, देवराज अर्स से टकराव शुरू हो गया। पार्टी ने उन्हें कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया।

कांग्रेस को चुनौती

उन्होंने यशवंत राव चव्हाण, देवकांत बरुआ, ब्रह्मानंद रेड्डी, ए. के. एंटनी, शरद पवार, शरत चंद्र सिन्हा, प्रियरंजन दास मुंशी और के. पी. उन्नीकृष्णन जैसे दिग्गज नेताओं को साथ लेकर इंदिरा गांधी को चुनौती दे दी। देवराज अर्स ने कांग्रेस (यू) बना ली, जबकि इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी का नाम कांग्रेस (आई) रख लिया। 

अगले विधानसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस ने वापसी की और अर्स का जनाधार ही नहीं, पार्टी का अस्तित्व भी संकट में आ गया।

कर्नाटक की राजनीति में देवराज अर्स प्रदेश में भूमि सुधार, पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग को आरक्षण तथा सामाजिक क्रांति लाने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं।
उन्होंने प्रदेश की राजनीति में लिंगायत और वोक्कालिगा समाज की राजनीतिक वर्चस्व पर लगाम लगाकर पिछड़ों के प्रतिनिधित्व को मज़बूती भी दी थी। आज कांग्रेस उसी वर्ग को वापस अपने साथ जोड़ने के लिए देवराज अर्स की विरासत को लोगों के बीच ले जाना चाहती है।

कांग्रेस को आई अर्स की याद

20 अगस्त को होने वाले आंदोलन के पोस्टर बैनर में राजीव गांधी के साथ साथ देवराज अर्स की तसवीर भी झलकने लगी है। पार्टी के प्रदेश अधयक्ष डी. के. शिवकुमार अपनी अपील में भी देवराज अर्स को याद कर रहे हैं। यह ठीक वैसे ही हो रहा है जैसे आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में पी.वी. नरसिम्हा राव की जन्मशती कार्यक्रम को पार्टी ज़ोरशोर से मनाने जा रही है।
 नरसिम्हा राव ने कभी कांग्रेस नहीं छोड़ी, लेकिन उनके वारिस आज बीजेपी में बैठे हैं। उन्होंने कांग्रेस के  रुख की आलोचना भी की कि आज क्यों वह राव को याद कर रही है।

नरसिम्हा राव पर राजनीति

2020 नरसिंह राव का जन्म शताब्दी वर्ष है। इसी लिए कई लोग उन्हें याद कर रहे हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव यानी केसीआर ने पीवी के नाम पर राजनीतिक ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश की। उन्होंने ऐलान कर दिया कि तेलंगाना सरकार साल भर अपने खर्चे पर पीवी जन्म शताब्दी समारोह आयोजित करेगी। इस दौरान उनकी उपलब्धियों को यादगार बनाने के लिए एक स्मारक बनाया जाएगा।
 चूंकि पीवी तेलंगाना से हैं, केसीआर ने पीवी के जरिये तेलंगाना सेंटीमेंट पर अधिकार जमाने के मक़सद से नयी राजनीति शुरू कर दी। लिहाजा कांग्रेस आलाकमान को लगा कि एक दिवंगत कांग्रेसी नेता के नाम का सभी फ़ायदा उठाने के कोशिश में हैं, जबकि वह ही पीछे रह जा रही है।

कांग्रेस आलाकमान ने पीवी के प्रति अपने रवैये को बदलने का फ़ैसला किया।  पहले तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस समिति को पीवी के जन्म शताब्दी वर्ष पर बड़े पैमाने पर साल भर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी। फिर इसके बाद, पुरानी बातों को भुलाने का अहसास दिलाते हुए, पुरानी परंपरा तोड़ते हुए पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री की तारीफ की।

बदली रणनीति

पी. वी. नरसिम्हा राव और उसके बाद देवराज अर्स के प्रति बदला रवैया और बदली रणनीति कांग्रेस को कितना फ़ायदा पहुँचाएगी इसका उत्तर समय देगा। लेकिन जिस तरह से कांग्रेस ने यह पहल की है उसका एक संदेश स्पष्ट जाएगा कि कांग्रेस में गांधी परिवार से हटकर भी अब अपने बड़े नेताओं को तरजीह देना शुरु कर दी है। 

कांग्रेस बिहार चुनाव में जगजीवन राम और बंगाल में सिद्धार्थ शंकर राय और अन्य नेताओं की भी विरासत को याद करेगी तो उसका असर मतदाताओं पर पड़ेगा, इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता। 

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संजय राय
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