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कमलनाथ ने शुरू की सिंधिया की ‘घेराबंदी’, मध्य प्रदेश में उपचुनाव की आहट? 

मध्य प्रदेश में कोरोना संक्रमण के ख़िलाफ़ लड़ाई चल रही है, लेकिन इस बीच राजनीतिक हलचल तेज़ होने से उपचुनावों की आहट भी साफ़ तौर पर सुनाई देने लगी है। दो महीने पहले सत्ता गँवाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उपचुनावों के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक पूर्व विधायकों की 'घेराबंदी' तेज़ कर दी है। उनकी निगाह बीजेपी के असंतुष्टों पर टिकी है। सत्ता में आयी बीजेपी और सरकार के मुखिया शिवराज सिंह भी सियासी दाँव खेलने में जुटे हुए हैं। कांग्रेस की सरकार गिराने में महती भूमिका निभाने वाले कांग्रेस के पूर्व विधायक भी बीजेपी से टिकट हासिल करने की जुगत में हैं।

मध्य प्रदेश में कुल 24 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। हालाँकि चुनाव की तारीख़ों के एलान में अभी वक़्त है। लेकिन एक दर्जन ज़िलाध्यक्षों की नियुक्तियाँ मध्य प्रदेश कांग्रेस ने की हैं। गुना शहर और ग्रामीण के साथ-साथ श्योपुर, शिवपुरी और ग्वालियर ग्रामीण का ज़िलाध्यक्ष भी बदला गया है। ये वो पाँच क्षेत्र हैं जहाँ सिंधिया समर्थकों के हाथों में ही पूरी कांग्रेस की बागडोर हुआ करती थी। पाँचों क्षेत्र उपचुनाव की दृष्टि से भी बेहद अहम हैं। नाथ ने सिंधिया के घनघोर विरोधियों को ज़िले की कमान सौंपी है। कितनी सफलता मिलती है? यह वक़्त बतायेगा।

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बीजेपी में गये सिंधिया समर्थक कांग्रेस के पूर्व विधायक टिकट को लेकर आश्वस्त हैं। उधर पूरा जीवन कांग्रेस के ख़िलाफ़ लड़ते रहने वाले भाजपाई अपने भविष्य को लेकर खासे चिंतित हैं। 

पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के अग्रणी नेताओं में शुमार किये जाने वाले दिवंगत लीडर कैलाश जोशी के बेटे दीपक जोशी की नाराज़गी की ख़बर आई थी। हाटपिपलिया विधानसभा से वह चुनाव लड़ते रहे हैं। साल 2018 का चुनाव सिंधिया समर्थक कांग्रेस के मनोज चौधरी से हार गये थे।

सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी तो मनोज ने भी विधायक पद से त्यागपत्र दे दिया। हाटपिपलिया की इस रिक्त सीट से मनोज का टिकट अब बीजेपी ने ‘पक्का’ कर दिया है। दीपक जोशी इससे ग़ुस्से में हैं। विकल्प खुले होने की बात कहकर पिछले सप्ताह उन्होंने सनसनी फैलाई थी। पार्टी ने बुलाकर ‘डांट लगाई’ तो फ़िलहाल तो जोशी ने कह दिया, ‘वह बीजेपी के साथ हैं। टिकट इश्यू नहीं है।’ अपने इस बयान पर वह कब तक कायम रहेंगे, इस बात को लेकर बीजेपी के ही आला सूत्र सशंकित हैं।

हाटपिपलिया जैसी स्थिति उपचुनाव वाले सभी 22 क्षेत्रों में बनना तय माना जा रहा है। कहा जाता है कि सिंधिया के साथ बीजेपी ने ‘डील’ के तहत कांग्रेस छोड़ने वाले सभी विधायकों को टिकट देने का भरोसा दिया हुआ है। ऐसे में कहा जा रहा है कि बीजेपी के नेता इन हालातों के अपने क्षेत्र में कांग्रेस के लिए काम करने के साथ भविष्य की चिंता भी पाले हुए हैं। सूत्रों के अनुसार ऐसे असंतुष्टों पर कमलनाथ की नज़र है।

यह भी तय माना जा रहा है कि जो कुछ कांग्रेस में हुआ था, वही कुछ टिकटों की घोषणा के बाद बीजेपी में भी देखने को मिलेगा। टिकटों के अलावा शिवराज कैबिनेट के विस्तार पर भी सभी की निगाहें हैं। बड़ी संख्या में बीजेपी के वरिष्ठ विधायक मंत्री पद की आस लगाए बैठे हुए हैं।

शिवराज कैबिनेट में फ़िलहाल पाँच सदस्य हैं। पाँच में दो सिंधिया समर्थक ग़ैर विधायक भी मंत्री हैं। कैबिनेट का विस्तार होने पर सिंधिया समर्थक उन चार ग़ैर विधायकों को जगह मिलना तय माना जा रहा है जो कमलनाथ कैबिनेट में सदस्य थे और पद छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए।

कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामने वाले कुल 22 विधायकों में छह पूर्व मंत्रियों के अलावा चार-पाँच पूर्व वरिष्ठ विधायक शिवराज सिंह सरकार में मंत्री पद मिलने की लालसा पाले हुए हैं। वे मानकर चल रहे हैं कि बीजेपी का साथ देने के ईनाम स्वरूप पार्टी उन्हें मंत्री पद अवश्य देगी।

निर्दलीय विधायक भी हैं

कमलनाथ सरकार में खनिज मंत्री रहे निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल गुड्डा को उम्मीद है कि शिवराज कैबिनेट में जगह दी जाएगी। बसपा की रामबाई भी शिवराज सरकार में मंत्री पद की उम्मीद पाले हुए हैं। बता दें कि मध्य प्रदेश विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या 230 है। इस हिसाब से अधिकतम 35 मंत्री बनाये जा सकते हैं। शिवराज समेत कुल छह सदस्य अभी काबीना में हैं। यानी 29 पद ही बच रहे हैं। जबकि मंत्री पद को लेकर हालात एक अनार सौ बीमार वाले हैं।

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बताया जाता है कि पहली खेप में काबीना में ना लिये जाने से वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव, भूपेन्द्र सिंह, राजेन्द्र शुक्ल, अजय विश्नोई, गौरीशंकर बिसेन, रामपाल सिंह, करण सिंह वर्मा, पारस जैन और जगदीश देवड़ा मुँह फुलाये हुए हैं। संजय पाठक, विश्वास सारंग और इस तरह के अन्य पूर्व मंत्रियों में भी मंत्री पद पाने को बेचैनी का आलम है।

जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों ने भी बीजेपी के अनेक विधायकों की उम्मीदों को बढ़ा रखा है। जिन क्षेत्रों में उपचुनाव होने हैं, वहाँ जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को मंत्रिमंडल विस्तार में साधना आवश्यक होगा। 

कुल मिलकार बीजेपी सरकार, उसके मुखिया शिवराज और संगठन के सामने दोहरा संकट है। पहला - टिकट कटने वाले बीजेपी और उसके समर्थकों को साधना होगा और दूसरा - मंत्री पद के बँटवारे में तमाम संतुलन को हर हालत में बनाना होगा। इस स्थिति से पार्टी और शिवराज कैसे निपटेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।

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संजीव श्रीवास्तव
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