केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना का एमपी में ढ़ोडन बांध। सैकड़ों आदिवासी महिलाएँ चिताओं पर लेटकर रो रही हैं। बच्चे मिट्टी सत्याग्रह कर रहे हैं। अब ‘सांकेतिक फांसी’ आंदोलन की तैयारी है। और बुजुर्ग कह रहे हैं 'अगर जमीन छीनी तो इसी मिट्टी में दफन हो जाएंगे।'
केन नदी को बेतवा से जोड़ने वाली देश की पहली नदी-जोड़ो परियोजना है। इसकी नींव प्रधानमंत्री मोदी ने 25 दिसंबर 2024 को खजुराहो से रखी थी, लेकिन अब मध्य प्रदेश के छतरपुर में इस परियोजना के विरोध में एक बड़ा आदिवासी आंदोलन खड़ा हो चुका है। विकास बनाम अस्तित्व की इस जंग में हजारों आदिवासी 10 दिनों से ढ़ोडन बांध पर डटे हुए हैं। वे कह रहे हैं कि पानी तो आएगा, लेकिन हमारे गांव, जंगल और संस्कृति डूब जाएंगे। पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा डूबने और 23 लाख पेड़ कटने की आशंका है। आदिवासियों का सवाल साफ है कि क्या बुंदेलखंड का विकास उनके वजूद की कीमत पर होगा?

योजना का विरोध क्यों?

अब इस योजना के ख़िलाफ़ आदिवासी आंदोलन का बड़ा रूप ले रहा है। मध्य प्रदेश में छतरपुर के ढ़ोडन बांध के पास हजारों आदिवासियों और किसानों का उग्र प्रदर्शन हो रहा है। इस संघर्ष को शुरू हुए 10 दिन से भी ज्यादा का समय हो गया है। यह आंदोलन मध्य प्रदेश की केन नदी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी से जोड़ने वाली केन बेतवा लिंक परियोजना के ख़िलाफ़ है। इसमें आदिवासियों का आरोप है कि परियोजना के कारण उनके गांव पानी में डूबने वाले हैं। इन लोगों का आरोप है कि सरकार उन्हें बिल्कुल न के बराबर मुआवजा दे रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि अगर उन्हें विस्थापित किया गया तो गरीबी उन्हें जल्द ही खत्म कर देगी। उनकी संस्कृति, परंपराएं और जीवन पूरी तरह खतरे में पड़ जाएगा। आदिवासी महिलाओं ने भावुक होकर कहा, ‘हमारे जंगल, हमारी जमीन, हमारी नदियां सब कुछ छीन ली जाएँगी। हम अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे’। स्थानीय लोग कह रहे हैं कि सरकार विकास के नाम पर उनके अस्तित्व को मिटा रही है।

क्या है परियोजना

केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली नदी जोड़ो योजना है। इसके तहत केन नदी का पानी 221 किमी लंबी नहर से बेतवा नदी में डाला जाएगा। इसमें 77 मीटर ऊंचा ढ़ोडन बांध, दो पावर हाउस और नहर नेटवर्क बनेगा। सरकार का दावा है कि 10 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी। इसके साथ ही बुंदेलखंद के बंजर इलाकों तक पानी पहुंच सकेगा और लोगों को खेती करने में आसानी हो जाएगी। 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा और 103 मेगावाट बिजली बनेगी। परियोजना की लागत 44,605 करोड़ रुपये है। लेकिन इस परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा और 10500 हेक्टेयर जंगल डूब में आ जाएगा।

केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में लगभग 5000 लोग कई दिनों से ‘चिता आंदोलन’ कर रहे हैं। महिलाएँ और छोटे-छोटे बच्चे सांकेतिक चिताओं पर लेटकर प्रदर्शन कर रहे हैं। ढ़ोडन बांध पर इनका नारा गूंज रहा है 'न्याय दो या मौत दो'।

चिता आंदोलन में सभी लोगों ने मिट्टी सत्याग्रह भी किया, जिसमें केन नदी की मिट्टी को लोगों ने अपने पूरे शरीर पर मल लिया। आंदोलनकारियों ने शरीर पर मिट्टी मलकर यह संदेश दिया कि वे इस जमीन के मूल मालिक हैं। बुजुर्गों ने कहा, 'अगर हमें हमारी जमीन से हमें बिना न्याय दिए बेदखल किया गया तो हम इसी मिट्टी में दफन होना पसंद करेंगे।' मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेता जीतू पटवारी ने आरोप लगाया है कि 'मोदी-मोहन की जोड़ी ने मध्य प्रदेश के आदिवासियों को चिता पर लेटने के लिए मजबूर कर दिया है'।
केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ डटे हुए आदिवासियों और अन्य गांव के लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे आगे ‘सांकेतिक फांसी’ का आंदोलन करेंगे। उनका कहना है कि विस्थापन उनके लिए मौत के बराबर है, इसलिए वे सांकेतिक फांसी लगाकर सरकार को संदेश देंगे कि उनकी जिंदगी छीनी जा रही है।

क्या है मांग और आरोप?

  1. विस्थापन और मुआवजा: केन-बेतवा लिंक परियोजना के चलते कम से कम 24 गांव सीधे विस्थापित होंगे या यूं कहे कि हजारों परिवारों को अपना पूरा घर बार गांव छोड़ कर कहीं और जाना होगा और 8 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे। ढ़ोडन गांव में 363 प्रभावित परिवारों को 12.5 लाख रुपये प्रति परिवार दिए गए हैं। ग्रामीण इसे नाकाफी बता रहे हैं और कम से कम 25 लाख की मांग कर रहे हैं।
  2. पर्यावरण का नुकसान: परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा डूब जाएगा। लोगों का आरोप है कि करीब 23 लाख पेड़ केन बेतवा लिंक परियोजना में काट दिए जाएंगे।

जंगल, जमीन और संस्कृति बचाने की लड़ाई

जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन को लोग ‘दमन के खिलाफ लोकतंत्र की जीत’ बता रहे हैं। भटनागर का कहना है कि 'यह सिर्फ मुआवजे की बात नहीं है। यह पानी, जंगल, जमीन और संस्कृति को बचाने की लड़ाई है'।

प्रशासन पर गंभीर आरोप

आंदोलनकारियों का आरोप है कि पुलिस और वन विभाग के अधिकारी आंदोलन स्थल तक खाना-पानी और जरूरी सामान पहुंचने से रोक रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों और दुकानदारों को मदद न करने की धमकी दी जा रही है। महिलाओं को हटाने की कोशिश में पुलिस से झड़प भी हुई। दिल्ली जाकर मांग रखने से रोका गया और रास्ते में नाकेबंदी की गई। पन्ना और छतरपुर के कुछ हिस्सों में धारा 163 लागू कर दी गई है। छतरपुर की सीमाओं पर बाहरी लोगों की आवाजाही रोक दी गई। लोगों का यह भी कहना है कि आदिवासियों की आवाज को दबाने के लिए प्रशासन ने मीडिया पर भी पाबंदी लगा दी है।

छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने कहा है कि सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर रही है और जल्द समाधान निकलेगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि जायज मांगें पूरी की जाएंगी। लेकिन सवाल है क्या यह परियोजना बुंदेलखंड के विकास की राह बनेगी या आदिवासियों के अस्तित्व पर खतरा साबित होगी?