बीजेपी ने अंबरनाथ में कांग्रेस के 12 कॉरपोरेटरों को मिलाकर सत्ता हथियाने की कोशिश की, फिर शिंदे ने एनसीपी के 4 कॉरपोरेटर तोड़कर बाज़ी पलट दी। अकोट में बीजेपी ने AIMIM से हाथ मिलाया। जानिए महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति का पूरा खेल।
महाराष्ट्र में इन दिनों स्थानीय निकायों के चुनाव हैं। पहले चरण में नगरपरिषद के चुनाव हुए और अब 29 महानगरपालिका चुनाव हो रहे हैं लेकिन सत्ता की मलाई को लेकर इतनी मारपीट है कि कोई अपना नहीं और कोई पराया नहीं। मुंबई से सटे अंबरनाथ में एकनाथ शिंदे की पार्टी के ज्यादा कॉरपोरेटर आये लेकिन सत्ता बीजेपी को चाहिए थी तो कांग्रेस के ही 12 कॉरपोरेटर रातों रात बीजेपी में मिला लिये। दो दिन में शिंदे ने खेल पलट दिया और एनसीपी के चार कॉरपोरेटर तोड़ कर आख़िरकार सत्ता हासिल कर ली। एक और इलाके अकोट में तो बीजेपी ने उस एमआईएम से साथ मिलकर सत्ता हासिल कर ली जिसको वो दिन रात कोसती है। कुल मिलाकर सबको सत्ता चाहिये बस, विचारधारा चाहे जाये भाड़ में।
असल में केंद्र और राज्य में सत्ता पाने के बाद बीजेपी अब स्थानीय निकायों पर कब्जा करना चाहती है क्योंकि असल काम तो वहीं से होते हैं। बीजेपी के एक पूर्व सांसद, जिनको बीजेपी ने अब किनारे पर कर दिया है, वो कहते हैं कि सांसद और विधायक से ज्यादा माल तो कॉरपोरेटर बनने पर मिलता है। आंकड़ों में ये बात सामने भी आ रही है। पिछली बार जीते कॉरपोरटरों ने जब इस बार चुनाव का डिक्लेरेशन दिया तो उनमें से कई की संपत्ति चार सौ से पांच सौ गुना बढ़ गयी।
जानकार बताते हैं कि मुंबई महानगरपालिका का बजट 80 हजार करोड़ रुपये का है जो कुछ राज्यों के बजट से भी ज्यादा है और जब बजट ज्यादा होगा तो माल कमाने का मौका भी उतना ही मिलता है। कुछ पूर्व कॉरपोरटरों ने बताया कि बीएमसी में सबसे सही लोकतंत्र है जिसके जितने कॉरपोरेटर होते हैं उस पार्टी को हर काम में उतना प्वाइंट परसेंटेज मिल जाता है। इसके अलावा सभी कॉरपोरेटर अपने इलाक़े में होने वाले हर काम के लिए और बिल्डर से पैसा लेते हैं। इस तरह सब खुश रहते हैं। यही हाल सभी बड़ी महानगरपालिकाओं का है। ये लक्ष्मी देवी का ही असर है कि हर कोई महानगरपालिका में जान लगा देता है।
गठबंधनों के साथ आपस में क्यों लड़ रहे?
जहाँ तक बात गठबंधन की करें तो कोई नहीं बचा है। बीजेपी के गठबंधन महायुति मिलकर 29 महानगरपालिकाओं में से केवल 16 में गठबंधन पर है, बाकी जगह अलग-अलग लड़ रहे हैं। पिंपरी चिंचवड़ और पुणे में तो एनसीपी के चाचा-भतीजे मिल गये और बीजेपी उनके खिलाफ लड़ रही है। बीजेपी ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो अजित पवार ने कहा कि मुझ पर भी 70 हजार करोड़ करप्शन के आरोप लगे और जिन्होनें लगाये उनके साथ अब सत्ता में हूं। ये आरोप खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम देवेंद्र फणनवीस ने लगाये थे।
बीजेपी कई जगहों पर अपने सहयोगी और उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की पार्टी को निपटाने में लगी है। सहयोगी रामदास आठवले को तो एक भी सीट नहीं दी गयी लेकिन उनको अप्रैल में राज्यसभा सीट और मंत्री पद बचाना है, इसलिए चुप हो गये हैं।
इंडिया गठबंधन में भी आपसी लड़ाई!
उधर, इंडिया गठबंधन भी तार-तार हो गया है। मनसे से समझौता नहीं करने का बहाना करके लोकल कांग्रेसियों ने दवाब बनाया तो गठबंधन टूट गया। राज और उद्धव ठाकरे साथ आ गये और मराठी अस्मिता के सवाल पर साथ लड़ रहे हैं। उधर कांग्रेस ने अकेले लड़ने का एलान किया लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पायी। बाद में दिल्ली के दवाब में प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी को 62 सीटें दे दीं लेकिन वंचित ने एन वक्त पर 16 सीटों पर लड़ने से इंकार कर दिया तो कांग्रेस भी कुछ नहीं कर पायी और बीजेपी को इसका फायदा मिल रहा है। कांग्रेस ने भी अपनी क़रीब 157 सीटों पर जमकर खेल किया है और कई जगहों पर कांग्रेसी नेताओं ने अपने ही बेटा-बेटी को टिकट देकर मामला सेट कर लिया है। उधर, कांग्रेस मुंबई छोड़कर कुछ अन्य जगहों पर शिवसेना उद्धव और मनसे के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। कुल मिलाकर कोई नहीं बचा। बस जीतने की उम्मीद और आगे मलाई मिलने की आशा में ताकत लगा रहे हैं।
सबने बीएमसी पर राज किया है इसलिए कोई एक दूसरे के खिलाफ बहुत कोई मुद्दा भी नहीं बना पा रहा है। शिवसेना के साथ बीजेपी भी लंबे समय तक सत्ता में रही तो कांग्रेस ने भी मलाई काटी है। उधर, शहर का हाल ये कि मुंबई किसी अंतरराष्ट्रीय शहर तो छोड़िये पिछ़ड़े इलाकों की तरह गंदा लगता है। चुनाव के बीच लाडकी बहिन योजना का पैसा देंगे!
ठाकरे बंधु मिलकर ज़रूर मराठी का मुद्दा खेलने में कामयाब रहे हैं लेकिन बीजेपी और शिंदे की शिवसेना के पास अभी एक तुरुप का इक्का बाकी है। वो 15 जनवरी को चुनाव से ठीक एक दिन पहले सभी महिलाओं के खाते में लाडकी बहिन योजना का दो महीने का पैसा यानी 3 हजार रुपये डालने वाले हैं। कांग्रेस ने इसके खिलाफ चुनाव आयोग में चिट्ठी दी है, लेकिन चुनाव आयोग क्या करेगा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव से सिर्फ जवाब मांगा है, पैसा रोकने को नहीं कहा। वैसे भी बिहार में जब बीच चुनाव में दस हजार रुपये मिलते रहे तो इसको कौन रोकेगा। बीजेपी और शिंदे की शिवसेना को उम्मीद है कि एक दिन पहले दिया गया ये पैसा जमकर वोट दिलायेगा।
कुल मिलाकर लोग परेशान हैं कि विकसित भारत के सपने के बीच भी मुंबई में पानी,सड़क, सफाई और ट्रैफिक जाम जैसे मुद्दे उसे रोज रुलाते हैं, लेकिन नेताओं और दलों को बस सत्ता की पड़ी है। वैसे भी मुंबई में स्थानीय चुनाव में 50 से 55 प्रतिशत तक ही वोट होता है, ऊपर से ये सब तमाशा देखकर बहुत से लोग वोट से दूर रहने का ही मन बना रहे हैं। अगर कम वोटिंग हुई तो चुनाव में जीत का अंतर 200 से 1 हजार वोट तक हो सकता है और तब त्रिकोणीय लड़ाई में कई दिग्गज जीत और हार सकते हैं। वैसे, 147 सीटों पर लड़ रही बीजेपी को उम्मीद है कि मुंबई की 227 कॉरपोरेटर वाली मुंबई बीएमसी पर उसका ही कब्जा होगा और वो एकनाथ शिंदे के साथ मलाई नहीं बांटना चाहती। बीजेपी इस बार राज्य में ज्यादा सत्ता हासिल कर शत-प्रतिशत बीजेपी का नारा पूरा करना चाहती है। उधर, एकनाथ शिंदे और अजित पवार खुद को खेल में बनाये रखने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं तो उद्धव ठाकरे की शिवसेना, राज ठाकरे की मनसे और कांग्रेस के लिए अस्तित्व बचाये रखने का सवाल है।