एनसीपी में क्या सबकुछ ठीक नहीं है? एक रिपोर्ट के अनुसार सुनेत्रा पवार ने सुनील तटकरे से पूछा कि उन्हें फडणवीस के साथ गुप्त बैठक की जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई? तो क्या यह पार्टी पर पकड़ बनाने के लिए सुनेत्रा पवार बनाम पुराने नेता का संघर्ष है?
एनसीपी के दो बड़े नेता रात के अंधेरे में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर चले आते हैं और पार्टी प्रमुख सुनेत्रा पवार पूछती रह जाती हैं कि आख़िर उनको इस बैठक के बारे में बताया क्यों नहीं गया। मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल की फडणवीस से देर रात की कथित मुलाक़ात पर सुनेत्रा पवार ने नाराज़गी जताई है। तो क्या पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं है? क्या सुनेत्रा पवार और पुराने नेताओं के बीच पार्टी पर पकड़ के लिए संघर्ष हो रहा है?
पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सच्चिदानंद सिंह ने हाल ही में सुनेत्रा पवार की राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्ति को चुनौती देते हुए कानूनी नोटिस भेजा था। इससे पहले मार्च महीने में सुनेत्रा पवार ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर कहा था कि 28 जनवरी के बाद पार्टी की ओर से भेजे गए किसी भी पत्राचार को मान्य न माना जाए। इसके बाद एक और विवाद तब हुआ था जब चुनाव आयोग को भेजी गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची में सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल के नाम शामिल नहीं थे। ऐसे ही घटनाक्रमों के बीच अब फडणवीस के साथ तटकरे और प्रफुल्ल पटेल की बैठक का विवाद भी आ गया है।
सुनेत्रा पवार ने पार्टी नेताओं की फडणवीस के साथ इस बैठक को लेकर क्या कहा है और एनसीपी में किस बात को लेकर संघर्ष चल रहा है, यह जानने से पहले यह जान लें कि आख़िर उस बैठक के बारे में रिपोर्ट क्या आई है। दरअसल, पहले रिपोर्ट आई थी कि मंगलवार रात मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सरकारी आवास 'वर्षा' में शरद पवार खेमे की एनसीपी के नेता जयंत पाटिल उनसे मिलने पहुंचे थे। उस समय ऐसी चर्चाएं चल रही थीं कि शरद पवार की पार्टी संसद में परिसीमन विधेयक पर बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन कर सकती है और भविष्य में सरकार में भी शामिल हो सकती है। फिर रिपोर्ट आई कि इसी दौरान एनसीपी के वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल भी फडणवीस से मिले। इस बैठक के बाद दोनों एनसीपी गुटों के बीच संभावित मेल-मिलाप की अटकलें और तेज हो गईं।
सुनेत्रा पवार ने जताई नाराज़गी
इस घटना के बाद रिपोर्ट है कि एनसीपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे से नाराज़गी जताई है। वजह यह बताई जा रही है कि उनके बीच हुई बैठक की जानकारी पहले सुनेत्रा पवार को नहीं दी गई। द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि फडणवीस और तटकरे की मुलाकात की ख़बर के बाद बुधवार सुबह सुनेत्रा पवार और सुनील तटकरे की बैठक हुई। रिपोर्ट के अनुसार इसी दौरान सुनेत्रा पवार ने पूछा कि मुख्यमंत्री से होने वाली इतनी अहम मुलाक़ात की जानकारी उन्हें पहले क्यों नहीं दी गई।
अंग्रेज़ी अख़बार की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि सुनेत्रा पवार ने कहा कि यदि पार्टी के शीर्ष नेता मुख्यमंत्री से मिलने जा रहे थे तो राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते उन्हें पहले बताया जाना चाहिए था।
बताया जाता है कि तटकरे ने जवाब दिया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि शरद पवार खेमे की एनसीपी परिसीमन बिल पर एनडीए का समर्थन कर सकती है, इसलिए किसी भी तरह की गलतफहमी से बचने के लिए उन्होंने और प्रफुल्ल पटेल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की। लेकिन सुनेत्रा पवार ने सवाल उठाया कि इस फैसले में उन्हें विश्वास में क्यों नहीं लिया गया।
तटकरे ने विवाद से किया इनकार
इस मामले में विवाद की ख़बरों पर सुनील तटकरे ने मीडिया से बातचीत में किसी भी तरह के मतभेद से साफ़ इनकार किया है। उन्होंने कहा, 'मेरा रिश्ता पहले अजित दादा के साथ बहुत अच्छा था और आज भी सुनेत्रा वहिनी (भाभी) के साथ वैसा ही है। किसी तरह की गलतफहमी या नाराज़गी जैसी कोई बात नहीं है।'
क्या पार्टी दो खेमों में बंट रही है?
कुछ महीने पहले अजित पवार के निधन के बाद पार्टी के भीतर हलचल है और कहा जा रहा है कि दरअसल पार्टी में अलग-अलग दो अलग-अलग धड़े दिखाई देने लगे हैं। सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि एक धड़ा सुनेत्रा पवार और उनके परिवार के साथ खड़ा है, जबकि दूसरा धड़ा लंबे समय से पार्टी चला रहे वरिष्ठ नेताओं के साथ है।
बताया जा रहा है कि सुनेत्रा पवार के बड़े बेटे पार्थ पवार संगठन में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ऐसी भी चर्चाएँ हैं कि भविष्य में प्रदेश अध्यक्ष पद पर बदलाव हो सकता है और उत्तर महाराष्ट्र के किसी विधायक को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालाँकि तटकरे ने साफ़ कहा है कि वह प्रदेश अध्यक्ष बने रहेंगे।पहले भी हो चुके हैं कई विवाद
अजित पवार के निधन के बाद से एनसीपी में लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। मार्च 2026 में सुनेत्रा पवार ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर कहा था कि 28 जनवरी के बाद पार्टी की ओर से भेजे गए किसी भी पत्राचार को मान्य न माना जाए। इसके बाद एक और विवाद तब हुआ था जब चुनाव आयोग को भेजी गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची में सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल के नाम शामिल नहीं थे। बाद में इसे 'कलर्कियल मिस्टेक' बताया गया, लेकिन विपक्षी नेताओं ने इसे वरिष्ठ नेताओं को किनारे लगाने की कोशिश बताया। हाल ही में प्रफुल्ल पटेल ने भी पार्टी के कामकाज में सुधार की जरूरत बताई थी, जिससे अंदरूनी असंतोष की चर्चाएं और तेज हो गईं।
क़ानूनी नोटिस ने भी बढ़ाई मुश्किल
इस बीच पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सच्चिदानंद सिंह ने हाल ही में सुनेत्रा पवार की राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्ति को चुनौती देते हुए कानूनी नोटिस भेजा था। इस नोटिस में उनकी नियुक्ति को 'अवैध' बताया गया है। हालाँकि पवार परिवार के क़रीबी सूत्रों का कहना है कि पार्टी इस नोटिस का जवाब नहीं देगी। उनका मानना है कि यदि नोटिस के पीछे कोई राजनीतिक मंशा है तो वह खुद सामने आ जाएगी।
कई अहम नियुक्तियाँ अब भी अटकीं
एनसीपी की अंदरूनी खींचतान का असर संगठनात्मक कामकाज पर भी दिखाई दे रहा है। अभी तक पार्टी ने युवा मोर्चा अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की है। महिला मोर्चा अध्यक्ष का पद भी खाली है। महाराष्ट्र महिला आयोग के नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो सकी है। वित्त मंत्रालय को लेकर भी स्थिति साफ़ नहीं हो पाई है और अजित पवार के निधन के बाद इसका कार्यभार मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस संभाल रहे हैं।क्या दोनों एनसीपी गुट फिर एक हो सकते हैं?
रिपोर्ट है कि पार्टी के कई विधायकों का मानना है कि यदि शरद पवार गुट और एनडीए में शामिल एनसीपी का विलय हो जाए तो पार्टी फिर मजबूत हो सकती है। हालाँकि अभी तक किसी नेता ने आधिकारिक तौर पर ऐसी मांग नहीं उठाई है। सूत्रों का कहना है कि जब तक पवार परिवार के भीतर नेतृत्व को लेकर सहमति नहीं बनती, तब तक किसी बड़े राजनीतिक फैसले की संभावना कम है।
बढ़ सकती है राजनीतिक हलचल
एनसीपी महाराष्ट्र सरकार का अहम सहयोगी दल है। ऐसे में पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर जारी खींचतान का असर केवल संगठन पर ही नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। फिलहाल पार्टी के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से मतभेद से इनकार कर रहे हैं, लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाएँ संकेत दे रही हैं कि एनसीपी में नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष है।