जंतर मंतर के छात्र आंदोलन और भारी दबाव के बीच धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद इस आंदोलन को दुनिया के कई बड़े मीडिया संस्थानों ने प्रमुखता से कवर किया है। इन घटनाक्रमों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका क़रार दिया है और लिखा है कि 'यह मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है'।

रॉयटर्स, सीएनएन, बीबीसी, द गार्जियन, अल जज़ीरा, साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस आंदोलन को भारत में युवाओं के बढ़ते असंतोष, शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी और राजनीतिक जवाबदेही से जोड़कर देखा है।

दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस, कैंडल मार्च और हजारों छात्रों के सड़कों पर डटे रहने की तस्वीरें दुनियाभर के मीडिया में प्रमुखता से दिखाई गईं। कई रिपोर्टों में कहा गया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की एक बड़ी राजनीतिक घटना है।
ताज़ा ख़बरें

रॉयटर्स: मोदी सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक इम्तिहान

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को 'अप्रत्याशित' बताया। रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि ऐसे नेता की रही है जो दबाव के आगे आसानी से नहीं झुकते।

रॉयटर्स ने लिखा कि छात्रों के बड़े आंदोलन और युवाओं में बढ़ते असंतोष ने सरकार के सामने एक बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि युवा मतदाता बीजेपी के लिए बेहद अहम हैं और परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के साथ-साथ रोजगार की कमी भी युवाओं की नाराजगी का बड़ा कारण बनी।

CNN: मोदी सरकार के लिए दुर्लभ चुनौती

सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक 'दुर्लभ और बढ़ती हुई चुनौती' है। रिपोर्ट के अनुसार, यह आंदोलन केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रहा बल्कि युवाओं के भविष्य, रोजगार, शासन व्यवस्था और जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया। 

सीएनएन ने लिखा कि भारत के युवा स्नातकों में बढ़ती आर्थिक चिंता और अवसरों की कमी ने भी इस आंदोलन को ताकत दी।

बाक़ी अमेरिकी मीडिया ने भी दी प्रमुखता

रायटर्स व सीएनएन के अलावा अमेरिका के कई अन्य प्रमुख मीडिया संस्थानों ने भी इस घटनाक्रम को बड़ी खबर के रूप में प्रकाशित किया। द वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि भारत के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा युवा-नेतृत्व वाले आंदोलन की बड़ी जीत है। सीबीएस न्यूज़ ने कहा कि कई सप्ताह तक चले छात्र प्रदर्शनों के बाद शिक्षा मंत्री ने पद छोड़ा। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा प्रदर्शनकारियों की अहम जीत माना जा रहा है। एनबीसी न्यूज़ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बड़े पैमाने पर हुए युवा आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया।

BBC: सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में से एक

बीबीसी ने इस आंदोलन को भारत के हाल के वर्षों के सबसे बड़े छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलनों में शामिल बताया। रिपोर्ट में 1970 के दशक के गुजरात के 'नव निर्माण आंदोलन' का उल्लेख करते हुए कहा गया कि भारत में कई छात्र आंदोलनों ने राजनीतिक बदलाव की दिशा तय की है।
बीबीसी ने लिखा कि यह आंदोलन केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं रहा बल्कि शिक्षा नीति और शासन व्यवस्था को लेकर भी व्यापक बहस का कारण बना। हालाँकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह देखना बाकी होगा कि क्या यह आंदोलन लंबे समय तक राजनीतिक रूप ले पाएगा।

द गार्जियन: फिल्मी सितारों की चुप्पी पर सवाल

ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में आंदोलन के राजनीतिक पहलुओं से ज्यादा सांस्कृतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया पर ध्यान दिया। रिपोर्ट में कहा गया कि प्रदर्शनकारी इस बात से नाराज थे कि देश के कई बड़े फिल्मी सितारे और सार्वजनिक हस्तियां छात्रों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई पर चुप रहे। गार्जियन ने लिखा कि प्रदर्शनकारियों का कहना था कि कई सेलिब्रिटी दुनिया भर की घटनाओं पर तो बोलते हैं, लेकिन अपने ही देश के युवाओं के साथ हो रही घटनाओं पर चुप्पी साध लेते हैं।

अल जज़ीरा: सरकार के खिलाफ असंतोष

अल जज़ीरा ने इस आंदोलन को हाल के वर्षों में मोदी सरकार के खिलाफ सबसे बड़े सार्वजनिक विरोधों में से एक बताया। रिपोर्ट के अनुसार, आंदोलन की शुरुआत परीक्षा में कथित गड़बड़ियों से हुई, लेकिन बाद में यह बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अवसरों की कमी और शासन व्यवस्था जैसे बड़े मुद्दों तक पहुंच गया।
रिपोर्ट में कुछ विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि सरकार और भारत की नई पीढ़ी यानी 'जनरेशन-Z' के बीच बढ़ती दूरी ने सरकार पर दबाव बढ़ाया।

SCMP: विश्वविद्यालयों से निकलकर पूरे देश में फैला आंदोलन

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट यानी एससीएमपी ने लिखा कि यह आंदोलन विश्वविद्यालय परिसरों से निकलकर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन में बदल गया। रिपोर्ट में कहा गया कि छात्रों के अलावा विपक्षी दलों और नागरिक समाज के कई संगठनों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया। प्रकाशन ने इसे रोजगार, भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था को लेकर बढ़ती चिंता का प्रतीक बताया।
मीडिया से और खबरें

हालाँकि हर अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान ने इस आंदोलन को अलग-अलग नज़रिए से देखा, लेकिन लगभग सभी रिपोर्टों में एक बात समान रही कि यह आंदोलन केवल कथित पेपर लीक तक सीमित नहीं रहा।


कई रिपोर्टों में इसे भारत के युवाओं की शिक्षा, रोजगार, अवसरों और शासन व्यवस्था को लेकर बढ़ती नाराजगी की अभिव्यक्ति बताया गया। वहीं धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की एक बड़ी राजनीतिक घटना के रूप में पेश किया गया।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों से यह भी संकेत मिला कि यह छात्र आंदोलन अब केवल परीक्षा सुधार की मांग तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारत के युवाओं की व्यापक आकांक्षाओं, जवाबदेही की मांग और भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।