डॉ. भीमराव आंबेडकर की इस 137वीं जयंती पर उनके स्मरण का महत्त्व इसलिए अधिक बढ़ गया है क्योंकि जिस साझेपन को उन्होंने लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया था वह सबसे अधिक विखंडित हो रहा है। उसका विखंडन भारत से लेकर पश्चिम एशिया होते हुए अमेरिका और यूरोप तक सभी स्थानों पर दिख रहा है। ऐसे में यह जानना उपयोगी होगा कि डॉ. आंबेडकर ने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जान डेवी से क्या ग्रहण किया और उसे अपने विचारों में कैसे समाहित और रूपांतरित किया। साथ ही यह जानना भी आवश्यक है कि अमेरिका में व्याप्त गोरे और काले के नस्ल और रंगभेद को वे भारत के जातिवाद के बरअक्स किस प्रकार देखते थे और क्या उन्होंने अमेरिका में रहते हुए उसके विरुद्ध उठ रहे आंदोलन से किसी प्रकार का जुड़ाव कायम किया था।

जान डेवी से प्रेरणा ली!

भीमराव आंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में 1913 में दाखिला लिया और 1916 तक वहां रहे। इस दौरान उन्होंने एम.ए. और पी.एच.डी की डिग्री हासिल की। वैसे तो उनका विषय अर्थशास्त्र था लेकिन उन्होंने कई अन्य विषयों का अध्ययन किया। उनके व्यक्तित्व को अमेरिका में अगर किसी बौद्धिक ने सर्वाधिक प्रभावित किया तो वे थे प्रोफेसर जान डेवी। वे दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे और दर्शन के व्यावहारिक पक्ष पर जोर देते थे। उनका कहना था कि दर्शन के मेटाफिजिकल यानी तत्वमीमांसा वाले पक्ष पर चर्चा करने और उस पर ज्ञान को निर्मित करने के बजाय दर्शन के उस पक्ष को महत्व देना चाहिए जो मानव के जीवन को बेहतर बनाए। यही वजह है कि डॉ. आंबेडकर ने भी उसी प्रकार भारत की तमाम दार्शनिक धाराओं को खारिज किया जिस तरह जान डेवी ने पश्चिम की विभिन्न दार्शनिक दृष्टियों को खारिज किया था। डॉ. आंबेडकर विभिन्न हिंदू दर्शनों पर जिस तरह हमलावर हैं उसकी प्रेरणा के मूल में प्रोफेसर जान डेवी हैं।
ताज़ा ख़बरें
जान डेवी की पुस्तक ‘डेमोक्रेसी एंड एजूकेशन’ (लोकतंत्र और शिक्षा) वास्तव में एक शिक्षाशास्त्रीय पुस्तक है लेकिन यह पुस्तक आंबेडकर के विचारों को बहुत प्रभावित करती है। हालांकि यह पुस्तक 1916 में उस समय प्रकाशित हुई जब आंबेडकर अमेरिका से रवाना हो रहे थे लेकिन मुंबई के सिद्धार्थ पुस्तकालय में यह पुस्तक आंबेडकर के संकलनों में रखी हुई है और उसके कॉपीराइट पेज पर आंबेडकर ने हस्ताक्षर के साथ यह लिखा है कि उन्होंने इसे 6 जनवरी 1917 को लंदन में खरीदा था। जान डेवी से उनका बहुत अधिक संपर्क रहा हो इसका प्रमाण तो नहीं मिलता लेकिन अमेरिका छोड़ने के बाद भी आंबेडकर डेवी के लेखन को पढ़ते और देखते रहे। माना जाता था कि जान डेवी एक बौद्धिक के रूप में अमेरिकी जनता की अंतरात्मा की आवाज थे।
संवाद और साझापन लोकतंत्र की आत्मा है। जान डेवी के इस विचार को पूरे पैराग्राफ के साथ उनकी पुस्तक जातिभेद का समूल नाश यानी ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता हैः-

“एक आदर्श समाज ऐसा होना चाहिए जिसमें ऐसे माध्यम हों जो एक हिस्से में हो रहे परिवर्तन को दूसरे हिस्से में पहुंचा सकें। एक आदर्श समाज में तमाम तरह के हित होते हैं और उन्हें सचेत रूप से संप्रेषित किया जाना चाहिए और उनको साझा किया जाना चाहिए। एक संगठन के पास दूसरे संगठन से संपर्क करने के लिए तमाम तरह के बिंदु होने चाहिए। यही बंधुत्व है और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। लोकतंत्र महज एक किस्म की सरकार नहीं है। यह एक किस्म का साझा जीवन है। जिसमें एक दूसरे से जुड़े हुए संप्रेषित अनुभव होते हैं। यह एक नजरिया है जिसमें अपने साथी के प्रति सम्मान और आदर की भावना होती है।”

जिस तरह जान डेवी यूरोपीय ज्ञानोदय के प्रभाव में यह मानते थे कि हर व्यक्ति की अपनी अस्मिता होती है और उसे अपने ज्ञान के निर्माण और निर्णय करने में सत्ता और धर्म से प्रभावित हुए बिना तर्क को प्राथमिकता देना चाहिए उसी प्रकार आंबेडकर भी तर्क को प्राथमिकता देते थे।

डेवी का विचार था कि शिक्षा इस प्रकार होनी चाहिए कि वह लोकतंत्र की संवाहक बन सके और मानव का विकास कर सके। जान डेवी मार्क्सवादी नहीं थे लेकिन वे पूंजीवाद के विरोधी थे और सामाजिक आर्थिक समता के हिमायती थे। लेकिन वे साधन और साध्य की पवित्रता और उनके बीच एक साम्य और संतुलन रखने की बात करते थे। आंबेडकर डेवी से इस मामले में भी प्रेरित थे। वे उनसे यहां तक प्रेरित थे कि कोलंबिया विश्वविद्यालय छोड़ने के तीस साल बाद तक भी वे डेवी के पहनने ओढ़ने और उठने बैठने के तरीके और दूसरे मैनरिज्म की नकल करने की कोशिश करते थे।

आंबेडकर का आदर्श धर्म

लेकिन आंबेडकर अपने विचारों को भारतीय स्थितियों और अपने समाज की चुनौतियों के अनुसार ढाल रहे थे। इसलिए जहां पहले प्रोटेस्टेंट रहे डेवी ने अपने बौद्धिक जीवन के मध्यकाल में संगठित धर्म को पूरी तरह से खारिज किया वहीं आंबेडकर ने धर्म की सामाजिक आवश्यकता को एकदम खारिज नहीं किया। आंबेडकर का मानना था कि मनुष्य के नैतिक जीवन के लिए किसी किसी धर्म की आवश्यकता रहेगी। इसीलिए उन्होंने जीवन भर एक आदर्श धर्म की तलाश करने के बाद आखिर में बौद्ध धर्म अपनाया। यहां फिर इथिक्स (1909) संबंधी डेवी और मारल मैन संबंधी रीनहोल्ड न्यूबुर के विचारों से प्रेरणा ग्रहण की। (मारल मैन एंड इमारल सोसायटीः ए स्टडी आफ इथिक्स एंड पालिटिक्स(1932)। लेकिन अफसोस की बात यह है कि 1952 में जब डॉ. आंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट ऑफ़ लॉ की डिग्री लेने के लिए अमेरिका रवाना हो रहे थे उसी समय प्रोफेसर डेवी ने अंतिम सांस ली और उनका यह मशहूर शिष्य उनसे नहीं मिल पाया।
विचार से और

जाति व्यवस्था पर आंबेडकर

अब सवाल यह उठता है कि जिस समय डॉ. आंबेडकर अमेरिका में कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे और भारत की जाति व्यवस्था के बारे में भी अपनी चर्चित थीसिस- ‘कास्ट इन इंडियाः देयर मेकेनिज्म, जिनेसिस एंड डेवलपमेंट’ लिख रहे थे, उस समय क्या उन्होंने वहां के गोरे काले के भेद के बारे में कुछ सोचा था। वे जब कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे उसी समय कैंपस से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर अफ्रीकी-अमेरिकी बौद्धिक लोगों के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आंदोलन हरलेम रेनेशां आकार ग्रहण करने लगा था। लेकिन वह आंदोलन तब शक्तिशाली हुआ जब पहला विश्वयुद्ध ख़त्म हो गया। इस आंदोलन और डॉ. आंबेडकर के बीच किसी प्रकार के संपर्क होने के प्रमाण नहीं हैं। लेकिन भारत लौट आने के काफी बाद 1946 में उन्होंने अमेरिका के नागरिक अधिकारों के नेता और लेखक डब्लू. ई.बी. डू बोइस जो कि नेशनल एसोसिएशन फार एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपुल (एनएएसीपी) से जुड़े थे, उनको पत्र लिखा। उनका उद्देश्य था कि जिस प्रकार अश्वेत लोग संयुक्त राष्ट्र की मदद से अल्पसंख्यक का दर्जा पाने के लिए प्रयासरत हैं उसी प्रकार भारत के अस्पृश्य लोगों को भी वह दर्जा मिलना चाहिए। बोइस ने उस पत्र का जवाब भी दिया। आंबेडकर ने 1955 में बीबीसी को इंटरव्यू देते दासता विरोधी गोरे कार्यकर्ता विलियम लॉयड गैरिसन की तारीफ करते हुए कहा कि गांधी गैरिसन नहीं हैं।
‘जनता’ अखबार में ए पीपुल एट बे (दरकिनार किए गए लोग) में भारत के अस्पृश्यों और काले लोगों के बीच तुलना करते हुए लिखा कि अस्पृश्यता अमेरिका के काले लोगों की गुलामी से भी बदतर है क्योंकि अमेरिका में काले लोग शिक्षा, सदाचार, खुशी, संस्कृति और संपत्ति प्राप्त करने के हकदार हैं जबकि भारत में ऐसा नहीं है। उन्होंने लिखा कि अमेरिका में गोरे लोगों ने नीग्रो लोगों को उठाने के लिए 1865 से 1930 के बीच 8.5 करोड़ डॉलर का कोष जमा किया जबकि भारत में गांधी के हरिजन सेवक संघ ने मात्र दस लाख रुपए का कोष जमा किया। इसके ठीक विपरीत लाला लाजपत राय जो कि उन्हीं दिनों अमेरिका में थे उन्होंने लिखा कि अमेरिका में ‘मनुस्मृति’ का सबसे खराब रूप लागू हुआ है। जबकि भारत के आर्यों की सवर्ण जातियां इस मायने में बेहतर हैं क्योंकि उन्होंने रंगभेद नहीं लागू किया।
सर्वाधिक पढ़ी गयी ख़बरें
इसी सिलसिले में जब भारत के समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया एक सांसद के रूप में 1964 में अमेरिका गए तो उन्होंने अमेरिका के मिसीसिपी राज्य के जैक्सन शहर के गोरे लोगों के लिए आरक्षित एक कैफिटेरिया में घुसने का प्रयास किया। जहां उन्हें 28 मई को गिरफ्तार कर लिया गया। जब अमेरिका के विदेश विभाग ने उनसे माफी मांगी तो उनका कहना था, “मैं अमेरिकी जीवन की किसी बुराई को उजागर करने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। इस तरह की बुरी स्थितियां दुनिया में हर जगह हैं—यहां तक कि भारत में भी हैं।” उनका कहना था कि जो दक्षिण अमेरिका रंगभेद के आधार पर हासिल करने की कोशिश कर रहा है उसे हमने चार हजार साल पहले जातिगत भेदभाव के आधार पर हासिल कर लिया था। पूरा भारत जाति के आधार पर विभाजित है।

यहां आंबेडकर के संदर्भ में एक ही बात उल्लेखनीय है कि उन्होंने भारत की जाति व्यवस्था को नस्ली भेदभाव नहीं माना था। लेकिन साझापन और समता के बारे आंबेडकर के विचार जितने भारत के लिए अहम हैं उतने ही पूरी दुनिया के लिए और बाद में तो वे इस साझापन यानी भाईचारे के स्रोत को बुद्धवाद में देखने लगे थे।