जब सारा देश चुनाव आयोग के अन्याय के विरुद्ध उबल रहा हो तब पुण्यतिथि (12 अक्टूबर) पर डॉ. राम मनोहर लोहिया का पुण्य स्मरण आवश्यक हो जाता है। लोहिया को गए तकरीबन साठ साल होने को आए हैं। लेकिन महात्मा गांधी, भगत सिंह, डॉ. भीमराव आंबेडकर की तरह वे भी आज प्रासंगिक हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया भारत की वह बेचैन आत्मा थे जिनने समाजवाद के सगुण रूप में अवतार लिया था और राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय की परस्पर टकराती धाराओं का समन्वय किया था। अगर गांधी और भगत सिंह औपनिवेशिक दासता यानी साम्राज्यवाद के विरोध के प्रति प्राणों की आहुति देने की सीमा तक प्रतिबद्ध थे तो डॉ. आंबेडकर सामाजिक न्याय के लिए। लेकिन डॉ. आंबेडकर में विऔपनिवेशीकरण की भावना लगभग अनुपस्थित थी। जबकि डॉ लोहिया में दोनों विचार अपनी पूरी ज्वाला के साथ उपस्थित थे। उनके लिए देश की आजादी भी जरूरी थी और जरूरी था स्त्रियों, शूद्रों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के लिए सामाजिक न्याय यानी उनकी मुक्ति।
अपने इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए डॉ. लोहिया को संसद में बैठने, सरकार चलाने और कानून बनाने से गुरेज नहीं था। लेकिन उनका असली डीएनए तो प्रतिरोध का था। उनके व्यक्तित्व के इसी रूप को व्यक्त करते हुए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने उन पर जो कविता लिखी थी उसकी पंक्तियां यहां प्रासंगिक हैः—

ओ मेरे देशवासियों
एक चिनगारी और
जो खाक कर दे दुर्नीति को
ढोंगी व्यवस्था को
कायर गति को मूढ़ मति को
जो मिटा दे दैन्य, शोक, व्याधि
ओ मेरे देशवासियों
यही है उसकी समाधि
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लोहिया बोले थे- अन्यायपूर्ण कानून न मानो

लोहिया ने 1964 में उस समय के प्रमुख छात्र नेता और समाजवादी युवजन सभा के अध्यक्ष बृजभूषण तिवारी को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा था। वह पत्र भले एक व्यक्ति को लिखा गया हो लेकिन वास्तव में वह देश भर के युवाओं को संबोधित था। उस पत्र में कहा गया था कि युवाओं को सरकार के अन्यायपूर्ण कानून और आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए। युवाओं को सकारात्मक प्रतिरोध करना चाहिए क्योंकि वास्तविक लोकतांत्रिक भावना तो इस बात में है कि युवा दमनकारी जज्बे का प्रतिरोध करें। युवाओं को नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों का प्रतिरोध करने के लिए सविनय अवज्ञा करनी चाहिए लेकिन अराजकता नहीं पैदा करनी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने युवाओं को अनुशासनहीनता करने को प्रेरित किया लेकिन उसके लिए ‘परमार्थिक अनुशासनहीनता’ जैसा शब्द इस्तेमाल किया। परमार्थिक अनुशासनहीनता एक नए किस्म का सारगर्भित शब्द है जो कि आज कॉकरोच जनता पार्टी, इंडिया समूह के विपक्षी दलों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। लोहिया ने चूंकि विपक्ष का निर्माण करने के लिए गैर-कांग्रेसवाद नामक रणनीति का सहारा लिया था इसलिए आज इंडिया समूह में लोहिया के जज्बे को अपनाने के सवाल पर तमाम तरह का लोचा है। कुछ लोग उन्हें नेहरू द्वेषी मानकर ठुकराए जाने की बात करते हैं तो कुछ लोग उनके जनसंघ और दीनदयाल के साथ जुड़ने के प्रसंग को आज की भाजपा से जोड़ देते हैं।

लोहिया नेहरू की आलोचना क्यों करते थे?

इस बारे में लोहिया के करीबी और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध ‘हिंदुत्व आर हिन्द स्वराज’ जैसी कठोर दार्शनिक पुस्तक लिखने वाले यूआर अनंतमूर्ति ने उनसे कहा, “मैं नेहरू को पसंद करता हूं। आप उनकी इतनी आलोचना क्यों करते हैं।” अनंतमूर्ति की बात धैर्यपूर्वक सुनने के बाद लोहिया ने कहा “ नेहरू में बहुत सारी अच्छाइयां हैं। वे अगर अपने परिवार के बाहर किसी को उत्तराधिकारी बनाएं तो मैं उनकी अच्छाइयों पर बोलूंगा।” यह बात जेपी भी मानते थे कि नेहरू का विरोध करने पर ही भारत में किसी सगुण विपक्ष का निर्माण हो सकता है। इस बीच गांधी और नेहरू के सोच का बड़ा अंतर सामने आ रहा था और लोहिया ने इसे एक सैद्धांतिक जामा भी पहनाया।

लेकिन लोहिया का असली जज्बा नेहरू विरोध नहीं अन्याय, अनीति और दुर्नीति का विरोध है। अपने इस जज्बे पर वे बार-बार खरे उतरते थे। चाहे बर्लिन की दीवार पर प्रदर्शन करने का मामला हो या अमेरिका में रंगभेद के विरोध प्रदर्शन का मामला हो।

इसी जज्बे के तहत लोहिया जब 1964 में अमेरिका में व्याख्यान देने पहुंचे तो मिसीसिपी के जैक्सन में स्थित मोरिस कैफीटेरिया में अपनी एक अश्वेत मित्र के साथ चाय पीने गए। रेस्तरां वाले ने उनकी सेवा करने से इनकार कर दिया। वे दूसरे दिन फिर पहुंचे और वहां विरोध प्रदर्शन किया और गिरफ्तारी दी। उनकी गिरफ्तारी पर देश दुनिया में हंगामा हुआ और बाद में एक सांसद को गिरफ्तार करने के लिए अमेरिका के विदेश विभाग ने माफी मांगी। संयोग से यह वही 27-28 मई 1964 की तारीख है जब डॉ. लोहिया अमेरिका में रंगभेद के विरुद्ध गिरफ्तारी दे रहे थे और भारत में पंडित जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था। लोगों ने इस मौके पर की गई उनकी टिप्पणी या देर से आई प्रतिक्रिया पर भी गलतफहमी पैदा करने की कोशिश की।
डॉ. लोहिया के चिंतन और दलीय राजनीति के साथ विपक्षी एकता बनाने की राजनीति के बीच अंतर मिलेगा। वह अंतर स्थापित करना आज के समय की मांग है। यह लोहिया को मानने वालों का दायित्व है। तभी हम आज के प्रतिरोध के आंदोलन में लोहिया के सही जज्बे को जिंदा कर सकेंगे। यह बात लोहिया ने स्वयं तुलसी के रामचरित मानस के बारे में भी कही थी कि हमें उनके साहित्य को ‘मोती कूड़ा विवेक’ से देखने की आवश्यकता है। यानी मोती चुन लेना है और कूड़ा छोड़ देना है। इसी मोती कूड़ा विवेक के साथ अपने पुरखों के चिंतन और कर्म में से मोती चुनने की आवश्यकता है। मुश्किल यह है कि तमाम लोहियावादी मोती और कूड़ा दोनों साथ ढोने में यकीन करते हैं जबकि तमाम कांग्रेसी मोती फेंककर कूड़ा ही चुनते रहते हैं।

आज नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कॉकरोच जनता पार्टी के साथ प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, कपिल सिब्बल जो कुछ कर रहे हैं वह लोहिया का ही जज्बा है। डॉ. लोहिया का जज्बा सबसे अधिक राहुल गांधी में है तो सीपीआई(एमएल) के नेता दीपंकर भट्टाचार्य, इसकी छात्र शाखा की नेहा बोरा और वामपंथी दलों में भी दिख रहा है।

वह एक हद तक पूरे देश में फैल रहा है। ममता बनर्जी भी उससे मुक्त नहीं रह सकतीं और न ही धीरे-धीरे उस ओर बढ़ रहे समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव। हालांकि यह सवाल लोग पूछ रहे हैं कि लोहिया की विरासत का सबसे अधिक दावा करने वाले अखिलेश यादव इतनी धीमी गति से और इतना सहम-सहम कर कदम क्यों रख रहे हैं। इसकी वजह वे स्वयं बताएंगे या समय आने पर पता चल जाएगा। लेकिन एक बात तय है कि आज अगर लोहिया होते तो वही भाषा बोल रहे होते जो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बोल रहे हैं। लोहिया की कटुता राहुल के भाषणों में प्रकट हो रही है और वह आवश्यक है। लोहिया निश्चित तौर पर अन्याय के खिलाफ खड़े होते और युवाओं को परमार्थिक अनुशासनहीनता करने के लिए प्रेरित कर रहे होते।
विचार से और

लोहिया समाजवाद के चिंतक योद्धा थे

लोहिया को पूरी तरह समझने के लिए उनकी दार्शनिक ऊंचाई और संघर्ष की गहराई को समझना होगा। तात्कालिक राजनीति के दांवपेंच करने में सभी राजनेता शामिल होते हैं लेकिन वे दांव पेंच उन्हें राजनीतिज्ञ नहीं बनाते। राजनीतिज्ञ बनाते हैं उनके उच्चस्तरीय त्याग और कल्पना करने और चिंतन करने की क्षमताएं। लोहिया समाजवाद के चिंतक योद्धा थे, वे पूंजीवाद के कठोर आलोचक थे। लेकिन वे तानाशाही पर टिके समाजवाद के भी निंदक थे। उनके सिद्धांत में समता और संपन्नता तो थी ही लेकिन उससे गहरी थी नागरिक स्वतंत्रता। कोई आंख मूंदकर भी कह सकता कि आज समाज में सर्वाधिक हनन नागरिक अधिकारों का ही हो रहा है। यही गांधी का स्वराज या रामराज्य था जिसमें ब्रिटिश पूंजीवाद और सैन्यवाद की जगह पर भारतीय पूंजीवाद और सैन्यवाद को विकल्प के तौर पर नहीं चुना गया था। लोहिया के दर्शन में हेनरी डेविड थोरो का वह सिद्धांत बोलता था जिसे उन्होंने 1849 में अपने पैम्फलेट ‘सिविल डिसओबिडियंस’ में कहा था कि सर्वश्रेष्ठ सरकार वह है जो न्यूनतम शासन करती है। यही बात आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में दोहराते थे। लेकिन आज इसी परिभाषा के आधार पर वे साबित कर रहे हैं कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन की मांग ठुकरा कर और पूरी दिल्ली में कश्मीर और मणिपुर की तरह से हजारों सुरक्षा बल तैनात कर वे अधिकतम और निम्न स्तरीय शासन के सिद्धांत की स्थापना कर रहे हैं।
लोहिया के जज्बे को महसूस करते हुए बालकवि बैरागी ने लिखा थाः—

जवानी आज समझी है कि तुम क्या थे तुम्हें जो दर्द था वो हाय!
किसका था तुम्हारा अक्खड़ी लहजा
तुम्हारी फक्कड़ी बातें, तुम्हारी खुश्क सी रातें
...
करोड़ों उठ गए वारिस तुम्हारी एक हिचकी पर
कहीं विप्लव कुआंरा या कि ला औलाद मरता है?
हमारी धमनियों के तुम मसीहा थे, मसीहा हो सुनो!
तुमको बगावत का हर एक क्षण याद करता है।

आज जरूरत है गैर-कांग्रेसवाद और नेहरूविरोध के पिंजड़े से धमनियों के इस मसीहा को आजाद करने की। उसके विप्लवी विचारों और संघर्षों के माध्यम से नई पीढ़ी के संघर्ष को राह दिखाने की। यही हमारे दौर का ‘नवसमाजवाद’ है। आज जनसंघर्षों की इस गंगा में नहाकर लोहिया को नया जीवन मिल सकता है। इसीलिए जो भी आज अन्याय से लड़ रहा है उसमें कहीं न कहीं लोहिया का अंश है, भगत सिंह और गांधी का अंश तो है ही। इसीलिए यह कहने में हर्ज नहीं है कि जो लड़े न्याय के हेतु लोहिया सोही।