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बुलडोजर यंत्र ही नहीं, ताक़त, सत्ता और डर के प्रतीक बन गए!

डर, डर मेरे दिल, डर,

डर, इतना डर, कि डर

बन जाये तेरा घर

डर में ही तेरा बचाव,

छुपाओ, अपने आप को छुपाओ

छुपाओ अपने आप को

जिस्म में, मकान में

कार्पोरेटी दुकान में

अपने आप को छुपाओ

मौन के तूफ़ान में

डर से भी डर

जीते-जी ही मर

डर, ऐ दिल मेरे, डर

कि डर से ही

उदय होता है, सर

डर, ऐ दिल मेरे, डर

डर, ऐ देश मेरे, डर

डर और हौसले/हिम्मत को कई बार विरोधी भावनाएँ माना जाता है; डर को मनुष्य की नकारात्मक मानसिक स्थिति से जोड़ा होता है और हौसले को सकारात्मक स्थिति से, लेकिन मनुष्य की मानसिक स्थिति इतनी सीधी और सपाट नहीं होती। वह डरता है स्थितियों से, वारदातों से, घटनाओं से, हालात से, डराने वाले लोगों से, भीड़ से, सेना से, पुलिस और क़ानून से, युद्धों और लड़ाइयों से, अपने और परायों के लालच से, भविष्य की अनिश्चितता से डरता है। अपने समय के परिवेश से, अतीत के अनुभवों और यादों के कारण, बीते समय में दिए गए घावों के कारण. डर मनुष्य के मानसिक दुनिया का हिस्सा है। डरने के बाद ही इंसान सोचता है कि डर को कैसे नियंत्रित करना है, कैसे हिम्मत जुटानी है और कैसे हिम्मत का दामन थामना है। उसे अपने डरने पर शर्म आती है। वह यह भी तय कर सकता है कि वह डरता रहे। ज्याँ पॉल सार्त्र से शब्द उधार लेकर कहा जा सकता है कि “वह दीवार में एक छेद करके उसमें छिप जाएगा” या उसको प्रतीत होता है कि लुक-छिप कर नहीं जी सकता, उसको हालात का सामना करना पड़ेगा।

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उपरोक्त कविता ऐसे समय में लिखी जा रही है जब देश में डर, भय और खौफ़ का राज्य स्थापित किया जा रहा है; जब धार्मिक कट्टरता से ग्रसित हुजूम एक दूसरे पर हमला कर रहे हैं; पथराव करते हुए और दुकानों और घरों को आग लगाते हैं, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को अपनी हिंसा का शिकार बनाते हैं; धार्मिक स्थलों पर हमले किए जाते हैं; अदालती कार्रवाई के बिना घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाया जाता है; सत्ताधारी हुजूमी हिंसा करने वालों का सार्वजनिक रूप से मान-सम्मान करते हैं; घृणा और नफ़रत फ़ैलाने वाले भाषण दिए जाते हैं; ऐसे भाषण देने वालों की जय-जयकार होती है; उन्हें नायक माना जाता है।

बुलडोजर लोगों को डराने-धमकाने का प्रतीक बन गया है; हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की चुनावी रैलियों में बुलडोजर लाकर खड़े किये गए, क्या बताने के लिए? यही कि आदित्यनाथ शक्तिशाली राजनेता हैं जो उनका उपयोग करता है। इस प्रकार बुलडोजर क़ानून के अनुसार काम करने वाले यंत्र नहीं हैं; शक्ति और सत्ता के प्रतीक हैं; लोगों के बीच सहम और आतंक फैलाने के लिए उपकरण हैं; दुकानों और घरों पर चल रहे इन बुलडोजरों ने कानून और संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को रौंदा और कुचला है; उनका उपयोग देश के सामूहिक मानसिक विभाजन की ओर धकेलने के लिए किया जा रहा है। इस्तेमाल करने वाले टीवी चैनलों और अख़बारों में खुद को सही ठहरा रहे हैं और उन्हें सही माना जा रहा है; इसलिए इस समय में हमें यह कहना पड़ रहा है, “डर! ऐ मेरे देश, डर!”

देश को डरना होगा क्योंकि मध्य प्रदेश के गृह मंत्री के शब्द हवा में गूंज रहे हैं, “जिस घर से पत्थर आए थे, वह पत्थरों का ढेर हो जाएगा” एक केंद्रीय मंत्री के शब्द गूंज रहे हैं, “देश के गद्दारों को, गोली मारो……..को।” सभी जानते हैं वो कौन लोग हैं जिन्हें गद्दार कहा जा रहा है, जिनके घरों को पत्थरों का ढेर बनाने की बात कही जा रही है। देश को इस मानसिकता से डरना होगा। इस मानसिकता से खुद को छिपाना और बचाना होगा।

इस डर के साम्राज्य के निर्माण के दौरान मानवता के एक ऐसे रहबर का जन्मदिन मनाया गया, जिन्होंने मानव जाति को भय-मुक्त होने का संदेश दिया; उन्होंने एक इंसान के अस्तित्व को इस तरह से परिभाषित किया, ‘भय काहू को देत नहि नहि भय मानत आन।।’

यह पंजाब की धरती पर जन्मे गुरु तेग बहादुर जी थे जिन्होंने कठिन समय में एक अवधारणा प्रस्तुत की कि मनुष्य को कैसा होना चाहिए; उन्होंने कहा कि मनुष्य को न तो किसी को डराना चाहिए और न ही किसी से डरना चाहिए। इस श्लोक में स्पष्ट है कि इस अवधारणा में गुरु जी मनुष्य होने की पहली शर्त रखते हैं कि किसी को भय देना या डराना नहीं, और फिर संदेश देते हैं कि किसी का भय स्वीकार भी नहीं करना है।

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गुरु साहिब के जन्मदिन से कुछ दिन पहले रामनवमी और हनुमान जयंती के त्योहार थे। इन त्योहारों के मौक़े पर गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड और दिल्ली में निकाले गए जुलूसों के दौरान हिंसा भड़क उठी, जिसमें देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों, सम्पत्तियों और धर्मस्थलों को निशाना बनाया गया। मध्य प्रदेश के खरगोन कस्बे में घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाया गया। 16-17 अप्रैल की रात को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक दरगाह को भी निशाना बनाया गया और तनाव बढ़ गया। गुजरात के कसबे खंभात (जिला आनंद) में रामनवमी जुलूस के दौरान हुई हिंसा के बाद शहर में बुलडोजर चलाए गए। दिल्ली में हनुमान जयंती के मौक़े पर 16-17 अप्रैल की रात जहांगीरपुरी इलाके में हिंसा भड़क गई। 20 अप्रैल को बुलडोजर इस इलाके में पहुंच गए और सुप्रीम कोर्ट के रोके जाने के बाद भी काम करते रहे। सीपीएम नेता वृंदा करात सुप्रीम कोर्ट के कार्यवाही रोकने के आदेश लेकर  जहांगीरपुरी पहुंचीं और बुलडोजर को रुकवाया। इससे पहले भी लोगों और अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के पौने ग्यारह बजे दिए गए सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों की जानकारी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का जानबूझकर उल्लंघन किया गया। यह सर्वोच्च न्यायालय की मानहानि है; यह देश के कानून और संविधान का अपमान है।

बुलडोजर चलाने के आदेश देने वाले व्यक्ति जानते हैं कि उनका मकसद क्या है; उनका मकसद है लोगों को डराना। डराना एक कला है। सत्ताधारियों के पास लोगों को डराने-धमकाने के लिए तरह-तरह के तरीके होते हैं।

नाजी जर्मनी में, हमलावरों के दिलों में नस्ली जहर भरके उन्हें यहूदियों, जिप्सियों (रोमा) और कम्युनिस्टों पर कहर बरपाने ​​का आदेश दिया गया था। सोवियत संघ में, स्टालिन के शासन के तहत, पुलिस या खुफिया विभाग के नागरिकों जिनमें जाने-माने कम्युनिस्ट नेता भी शामिल थे, के घरों के दरवाजों पर आधी रात को दस्तक देते और वे लोग साइबेरिया की जेलों और मौत की कोठरियों में पहुंचा दिए जाते। भारत में, औपनिवेशिक सरकार ने लोगों की दलीलों या तर्कों को सुनने के बजाय रॉलेट एक्ट जैसे कानून बनाए। इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की। 1984 में दिल्ली और अन्य शहरों में सिखों का नरसंहार किया गया था। 2019 में, जम्मू और कश्मीर का एक राज्य के रूप में अस्तित्व समाप्त हो गया। कई उदाहरण हैं। सभी का उद्देश्य था लोगों को डराना और डर का राज्य स्थापित करना। जहांगीरपुरी में बुलडोजर ऑपरेशन के बाद न सिर्फ बीजेपी नेताओं ने कार्रवाई को जायज ठहराया है, बल्कि दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा है कि उन्होंने नगर निगमों के अध्यक्षों को पत्र लिखकर दंगाइयों की दुकानों और घरों को गिराने को कहा था।

bulldozer in delhi jahangirpuri and mp khargone - Satya Hindi

वर्तमान सरकार हुज़ूमी हिंसा से लेकर यूएपीए के अवैध उपयोग करने, ​​पेगासस जैसे सॉफ्टवेयर की मदद से चिंतकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सियासतदानों के फोन की निगरानी करने और लोगों के घरों और दुकानों के बुलडोजर से गिराने जैसे ढंग-तरीके इस्तेमाल कर रही है। जाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों को पीटा गया और ‘सबक’ सिखाया गया। लक्ष्य एक ही है: तुम डरो; हमसे (यानी सत्ताधारियों से) डरो। डराने के साथ-साथ लोगों के मन में धर्म के आधार पर नफरत भी भरी जा रही है। क्या बहुसंख्यक समुदाय इस परिघटना से लाभान्वित हो रहा है? इसका जवाब है ‘नहीं’; पुत्रों के मन में घृणा का जहर भरकर उन्हें अमानवीयता की ओर धकेला जा रहा है। बहुसंख्यक समुदाय को भी इस परिघटना से डरने की ज़रूरत है।

गत शुक्रवार को गुरु तेग बहादुर जी का प्रकाश पर्व मनाया गया। सिख गुरु ने एक ओर ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों, अंधविश्वासों, मूर्तिपूजा, जात-पात और वर्णाश्रम व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया और दूसरी ओर धार्मिक कट्टरता और उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गुरु नानक-गुरु गोबिंद सिंह की सामाजिक-राजनीतिक क्रांति को इस व्यापक सामाजिक-राजनीतिक-ऐतिहासिक संदर्भ में ही देखा जा सकता है; वे किसी धर्म के विरुद्ध नहीं थे; उनका संदेश सहजीविता का संदेश था। गुरु तेग बहादुर की वाणी में विभिन्न स्थानों पर बेचैनी, पीड़ा और घृणा के विषय सामने आए हैं। अपनी वाणी में वह मानव नियति के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं और फिर स्वयं उनका उत्तर देते हैं। उनकी वाणी आत्म-संवाद की वाणी है। वे सवाल पूछते हैं, ‘बल छुटक्यो बंधन परै, कछु न होत उपाय..’ और फिर वे जवाब देते हैं, ‘बल होआ बंधन छूटै, सभ किछु होत उपाय।।’ इन बोलों ने पंजाब के लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुल्म के खिलाफ लड़ने का साहस दिया है; ये बोल पंजाब की लोक-आत्मा की आवाज बन गए हैं। 

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गुरु साहिब न केवल व्यक्तिगत बलशाली होने का संदेश दे रहे थे; उनके सामने पंजाब और सारी मानवता थी; वह आसन्न संघर्ष को देखते हुए उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने के लिए सामाजिक बल के निर्माण पर जोर दे रहे थे। केवल सामूहिक सामाजिक बल ही शासक वर्ग को चुनौती दे सकता है। सामूहिक सामाजिक बल ही ‘खालसा’ के सृजन का आधार बना।

भय के साम्राज्य का सामना करने के लिये समाज के सभी हिस्सों और वर्गों को बलशाली होना होगा। बलशाली होने के लिए संगठित होना और व्यापक एकता कायम करना आवश्यक है।

 2020-21 के किसान आंदोलन ने हमें यही सिखाया है; पूरे पंजाब और देश के अन्य राज्यों के लोग एकताबद्ध होकर बलशाली हुए; उन्होंने भय उजागर करती सड़कों पर गाड़ी कीलों, जल-तोपों, पुलिस और सुरक्षा बलों के दस्तों अन्य सत्यामयी प्रतीकों को अर्थहीन कर दिया था। उस आंदोलन से पहले, नागरिकता संशोधन अधिनियम के ख़िलाफ़ शाहीन बाग आंदोलन में महिलाओं ने बलशाली होने का प्रदर्शन किया था। ज़रूरत है समाज के हर समुदाय और हर वर्ग का नेतृत्व करने वाले लोकतांत्रिक नेता सामने आयें और संकीर्णता छोड़कर व्यापक जन एकता का निर्माण करें। हमारे समाजों, समुदायों और वर्गों में संकीर्णता, सांप्रदायिकता और महिला विरोधी भावनाओं से लड़ने की भी आवश्यकता है।

शासक लोगों को डराते रहे हैं; इस समय डराने-धमकाने का मकसद डर पैदा करने के साथ-साथ उन्हें सांप्रदायिक आधार पर बांटना है; हमें इस मंसूबे से डरना और इस प्रक्रिया के जटिल अर्थों को समझना चाहिए। डर, सहम और आतंक पैदा करने के साथ ही लोगों के दिलों में साम्प्रदायिकता के रंग को भी गहरा कर रहा है।

अकेलेपन में डर पलता और पनपता है। अकेला आदमी ज़्यादा डरता है और अपने आप में संकुचित हो जाता है। डर और भय के इस भीषण तूफान का सामना करने के लिए हमें एक दूसरे का हाथ थामना होगा। डर को नियंत्रित करके संगठित संगठित होना पड़ेगा।

(शुरुआती कविता की पहली पंक्ति एलन पैटन के उपन्यास ‘रोओ, मेरे प्यारे देश (Cry, the Beloved Country)’ से ली गई है।)
(जनचौक से साभार)
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स्वराजबीर
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