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गाँधी-150: गाँधीजी के हत्यारे गोडसे का महिमा मंडन करने वाले लोग कौन?

एक ऐसे समय में जब राजनीति का मक़सद किसी भी तरह से सत्ता हासिल करना रह गया हो और समाज में सब तरफ़ पैसे की ताक़त का बोलबाला हो, सामान्य लोग भी निजी और सार्वजनिक जीवन में मन वचन और कर्म से बहुत हिंसक हो चुके हों, राजनीति में सेवाभाव की अहमियत पर ज़ोर देने वाले गाँधीजी के पहलू के बारे में बात करना ज़्यादा ज़रूरी हो गया है।
अमिताभ

राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गाँधी के जीवित रहते हुए और उनकी एक कट्टरपंथी हिंदू के हाथों हत्या के बाद के 71 बरसों में बार-बार यह सवाल खड़ा किया गया है कि गाँधी के विचारों और उनके सिद्धांतों की प्रासंगिकता क्या है?

गाँधी के जीवन काल में ही भारत की आज़ादी की लड़ाई के तमाम शीर्षस्थ नेता- नेहरू, पटेल, सुभाष, आम्बेडकर, मौलाना आज़ाद, जयप्रकाश नारायण- उनकी बहुत-सी बातों से तीखी असहमतियाँ रखते थे और उन्हें खुलेआम ज़ाहिर भी करते थे। गाँधी ने कभी किसी को भी अपनी आलोचना की वजह से खारिज नहीं किया। हर बड़े युगप्रवर्तक की तरह उन्हें भी इस बात का अहसास था कि उनको हमेशा प्रासंगिकता की कसौटी पर कसा जाएगा। इसलिए उन्होंने अपने जीते जी ही ख़ुद को किसी वाद का प्रवर्तक मानने से इनकार करते हुए कहा था कि उनका जीवन ही उनका संदेश है।

यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। क्योंकि इसके आधार पर गाँधी की प्रासंगिकता तय करने के लिए हमें उनके समूचे जीवन की तरफ़ देखना होगा। देखना होगा उनके देहांत के बाद से भारत समेत पूरी दुनिया के राजनैतिक-सामाजिक हालात में आए बदलावों और चुनौतियों की तरफ़ और फिर उनसे निपटने का रास्ता तलाशने के लिए जब गाँधी के जीवन और उनके चिंतन की तरफ़ मुड़ेंगे तब हम पाएँगे कि पूरी दुनिया को वहीं से रोशनी लेनी पड़ेगी।

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दरअसल, गाँधी की प्रासंगिकता के सवाल पर बचाव का रुख़ अपनाने के बजाय हमें गाँधी के समाज-निर्माण के मॉडल को खारिज करने वालों, उनका मखौल उड़ाने वालों, उनके नाम पर पाखंड करने वाले नेताओं, समूहों, विचारकों और राजनैतिक दलों से पलटकर पूछना चाहिए कि उनका वैकल्पिक मॉडल क्या है? उनसे पूछा जाना चाहिए कि तमाम औद्योगिक-तकनीकी तरक्कियों, विकास के दावों और बाज़ारवाद के अभूतपूर्व विस्तार के बावजूद ऐसा क्यों है कि दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी को अब भी भूखे पेट सोना पड़ता है, क्यों करोड़ों लोगों के सिर पर छत नहीं है, क्यों करोड़ों बच्चों के पास न तो किताबें हैं और न ही कपड़े, क्यों करोड़ों युवा बेरोज़गार हैं, क्यों उनके पास किसी सुनहरे भविष्य का कोई सपना नहीं है? क्यों पर्यावरण के सवाल दिन पर दिन तीखे होते जा रहे हैं, पानी ख़त्म हो रहा है, नदियों के पानी से लेकर साँस लेने वाली हवा सब ख़तरनाक स्तर तक ज़हरीले हो चुके हैं? अगर उपभोक्तावादी मॉडल इतना ही कारगर था तो 16 साल की एक लड़की को दुनिया भर के हाकिमों को लताड़ना क्यों पड़ा और क्यों कहना पड़ा -हाउ डेयर यू?

सुरसा की तरह बढ़ती भोगवादी संस्कृति, लोगों के बेलगाम लालच, राज्य प्रायोजित और व्यक्तिगत हिंसा और युद्ध के बीच हम बाज़ार और राज्यसत्ता, दोनों की नाकामी देख रहे हैं। हमारी सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेता आर्थिक मोर्चे पर अपनी नाकामी छुपाने के लिए दलील दे रहे हैं कि पूरी दुनिया में मंदी छाई हुई है।

उपभोक्तावाद ने हमें भयंकर लालची बना दिया है। हमारी हवस, लिप्सा, भूख लगातार बढ़ती ही जा रही है। दुनिया भर में बढ़ती असमानता और असंतोष के पीछे यह हवस एक बहुत बड़ी वजह है। 

ऐसे में गाँधीजी का वह कथन याद करने की ज़रूरत है कि पृथ्वी में सब लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता है लेकिन किसी एक आदमी के लालच के लिए सारे प्राकृतिक संसाधन भी कम पड़ जाएँगे।

यह देखना दिलचस्प है कि जैसे-जैसे वैश्वीकरण के साथ-साथ हिंसा, युद्ध, भोगवाद, अनैतिकता, भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ा है, गाँधीजी की अहमियत भी बढ़ी है। प्रतिरोध के उनके तौर-तरीक़ों की गूँज दुनिया भर में होने वाले अहिंसक आंदोलनों में देखी जा सकती है।

सत्याग्रह के सामने स्वच्छाग्रह का जुमला!

गाँधीजी की 150वीं सालगिरह के मौक़े पर हमारे देश में एक ऐसी पार्टी का शासन है जिसकी एक सांसद खुलेआम गाँधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमा मंडन करती है। 'मैं भी बापू' की जगह 'मैं भी गोडसे' के स्टिकर-पोस्टर दिखने लगे हैं, अमेरिका के राष्ट्रपति हमारे प्रधानमंत्री को भारत का नया ‘राष्ट्रपिता’ घोषित कर चुके हैं जिस पर विनम्र विरोध या लज्जित अस्वीकार के बजाय उसे शांति से उदरस्थ कर लिया गया है। यह भी देखना चाहिए कि गाँधी के सत्याग्रह के विचार को स्वच्छाग्रह के जुमले में बदलने से इमेज की मार्केटिंग तो हो सकती है लेकिन गाँधी की नैतिकता की विरासत से उसका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। आज के नेता वोट की खातिर टीवी कैमरों के आगे सफ़ाई कर्मचारियों के पैर पखारते हैं। गाँधीजी ने कैमरों या अख़बार के रिपोर्टरों के आगे कभी शौचालयों की सफ़ाई नहीं की। नैतिकता और नैतिकता के नाम पर किए जा रहे पाखंड में अंतर समझना ज़रूरी है। 

दरअसल, गाँधीजी के जीवन में इतना कुछ है कि उनके राजनीतिक विचारों से असहमति रखने वाले भी अगर चाहें तो उनकी बताई तमाम बातों पर अमल करके अपना और समाज का भला कर सकते हैं। 

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गाँधीजी होने का मतलब

सादगी, कड़ी मेहनत, दूसरों की सेवा, अध्ययन, लेखन, समाज से संवाद, आत्मनिर्भरता,  स्वच्छता, करुणा, अनुशासन पर आधारित दिनचर्या और जीवन शैली, स्वास्थ्य के प्रति सजगता, खान-पान, ख़र्चों पर काबू रखना आदि तमाम बातें ऐसी हैं जिन्हें अमल में लाने से निजी और सार्वजनिक ज़िंदगी यक़ीनन बेहतर हो सकती है। सरकारी ढकोसलेबाज़ी से अलग रहकर भी यह सब किया जा सकता है।

गाँधीजी की ख़ासियत थी कि दूसरों को कोई सीख देने से पहले ख़ुद उस पर अमल करके और ख़ुद को कड़ी कसौटियों पर कस करके देखते थे। सिद्धांत को व्यवहार में लाकर परखना उनका उसूल था। गाँधीजी मानते थे कि कथनी और करनी के भेद से बचने का यह  सबसे कारगर उपाय है।

गाँधीजी ने 1914 में 'रचनात्मक कार्यक्रम' नाम की एक पुस्तिका गुजराती में लिखी जिसका बाद में हिंदी, अंग्रेज़ी और अन्य कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और उसकी लाखों प्रतियाँ बिकीं। चौदह सूत्रों के रचनात्मक कार्यक्रमों वाली यह किताब पहले विश्व युद्ध के समय लिखी गई थी। इसकी भूमिका में गाँधीजी ने लिखा था-

रचनात्मक कार्यक्रम, दूसरे शब्दों में कहें तो सत्य और अहिंसा के साधनों से की गई पूर्ण स्वराज्य की रचना है। हिंसा और असत्य के साधनों से जो राष्ट्र बने, और महायुद्धों में पैसा, मनुष्य और सत्य को खोकर वे क्या पा रहे हैं, इतिहास में इसका दु:खद दर्शन हमें मिलता आ रहा है।


महात्मा गाँधी

अपनी इस पुस्तिका में गाँधीजी ने लिखा कि अगर हमें सच्चा राष्ट्रभक्त बनना है तो हमारे गाँव साफ़ होने ही चाहिए। जिस कुएँ, तालाब या नदी के पास हम नहाते हैं, उसका पानी भी हमें साफ़ रखना चाहिए। उन्होंने लिखा, 

"मैं इसे बहुत बड़ा दुर्गुण मानता हूँ कि हमारी पवित्र नदियों के किनारे हम कितने अपवित्र काम करते हैं। उसी गंदगी से रोग पैदा होते हैं, उससे सबको नुक़सान पहुँचता है। इस दुर्गुण के लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं। पानी, आहार और हवा स्वच्छ होने चाहिए। इसके लिए हर आदमी को ध्यान रखना होगा कि दूसरे आदमी को भी पानी, आहार और हवा स्वच्छ मिले। इसलिए पानी में गंदगी न छोड़ें। खाने में मिलावट न करें। हवा को प्रदूषित न करें। इसका ध्यान हर भारतवासी को रखना होगा। अपने लिए और सबके लिए पानी, खाना, हवा इन तीनों की सफ़ाई बहुत ज़रूरी है।"

गंगा सफ़ाई के नाम पर अरबों रुपये पानी में बहा देने वाली सरकारों से लेकर नदियों में गणपति विसर्जन करने वाली मंडलियों तक, सबके लिए इसमें स्पष्ट संदेश है, बशर्ते हम उसे देखना-समझना और अपनाना चाहें।

ख़ुद की महानता बताने वाले नेता गाँधीजी से सीखें

आज के ज़माने में जब हमारे नेता लोग सार्वजनिक मंचों से अपने बारे में बात करते हुए एक ओढ़ी हुई, अभिनय युक्त भावुकता के साथ बचपन से ही अवतरित हो चुकी अपनी महानता के क़िस्से सुनाते रहते हैं जिनका प्रकारांतर से मंतव्य यह होता है कि मैं तो बचपन से ही ऐसा बनना चाहता था या कि मैंने और मेरे परिवार के लोगों ने क्या-क्या कष्ट सहे वर्तमान की महानता तक पहुँचने के लिए आदि आदि, ऐसे समय में महात्मा गाँधी की आत्मकथा प्रयास करके पढ़नी चाहिए। महात्मा गाँधी के बारे में बात करते हुए आम तौर पर बहुत सारे लोग, बल्कि बहुसंख्यक लोग यह मानते हैं कि मौजूदा दौर में गाँधीजी अप्रासंगिक हो चुके हैं।

जिन्हें व्यावहारिक राजनीति में शुद्धता, नैतिकता, ईमानदारी, सच्चाई वग़ैरह की तलाश रहती है, उन्हें गाँधी की आत्मकथा पढ़कर राजनैतिक-सामाजिक जीवन में सच्ची और नक़ली नैतिकता के अंतर को समझने में मदद मिल सकती है।

'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' नाम से लिखी गई अपनी आत्मकथा की प्रस्तावना में गाँधी  कहते हैं- मुझे आत्मकथा कहाँ लिखनी है? मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के जो अनेक प्रयोग मैंने किए हैं, उनकी कथा लिखनी है। ...यदि मुझे केवल अपने सिद्धांतों का, अर्थात् तत्वों का ही वर्णन करना हो, तब तो यह आत्मकथा मुझे लिखनी ही नहीं चाहिए। लेकिन मुझे तो उन पर रचे गए कार्यों का इतिहास देना है और इसीलिए मैंने इन प्रयत्नों को 'सत्य के प्रयोग' जैसा पहला नाम दिया है।

प्रस्तावना के अंतिम हिस्से में गाँधीजी ने सूरदास के पद के ज़रिये अपने विकारों की स्वीकारोक्ति की है-

मो सम कौन कुटिल खल कामी

जिन तनु दियो ताहि बिसरायो, ऐसो नमकहरामी

उन्होंने कहा - अपने विकारों को मैं देख सकता हूँ, पर उन्हें अभी तक निकाल नहीं पा रहा हूँ।

विचार से ख़ास

गाँधीजी से तुलना

आज एक के बाद एक नेताओं के शर्मनाक एमएमएस आते हैं, भ्रष्टाचार की कहानियाँ उजागर होती हैं मगर किसी को शर्म आती हो, ऐसा नहीं दिखता। कितने नेता ऐसे होंगे जो अपने बारे में 'विषयाँध'  शब्द का इस्तेमाल करने की हिम्मत जुटा सकते हैं। गाँधी अपनी आत्मकथा के शुरुआती हिस्सों में ही अपने मांसाहार, बीड़ी पीने, चोरी करने, और पिता की मृत्यु के समय पत्नी के साथ शयन-गृह में होने की ग्लानि का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं - ‘यद्यपि माता-पिता के प्रति मेरी अपार भक्ति थी, उसके लिए मैं सब कुछ छोड़ सकता था, तथापि सेवा के समय भी मेरा मन विषय को छोड़ नहीं सकता था। इसी से मैंने अपने को एक पत्नी-व्रत का पालन करने वाला मानते हुए भी विषयांध माना है।’

आज देश की किसी भी पार्टी का बड़े से बड़ा नेता भी क्या महात्मा गाँधी की तरह के क़बूलनामे का नैतिक साहस दिखा सकता है?

गाँधीजी अपनी ही धुन में रहते थे, जो सोच लिया उसे करना है, अपना एजेंडा तय करके उस पर ख़ुद भी अमल करना है और दूसरों से भी करवाना है। यह उनके स्वभाव की विशेषता थी। इस पर वह अड़े रहते थे। राजनीति का लक्ष्य सेवा और करुणा की भावना पर आधारित समाज की स्थापना करना हो, ऐसा उनके विचार और व्यवहार के बारे में पढ़ने पर देखा जा सकता है। अपने उसूलों पर अमल के मामले में गाँधीजी किसी का लिहाज़ या परवाह नहीं करते थे। ऐसी तमाम कहानियाँ हैं जब उन्होंने अपने परिवार के लोगों, अपनी पत्नी कस्तूरबा, अपने अत्यंत प्रिय जवाहर लाल नेहरू को भी नहीं बख़्शा।

एक ऐसे समय में जब राजनीति का मक़सद किसी भी तरह से सत्ता हासिल करना रह गया हो और समाज में सब तरफ़ पैसे की ताक़त का बोलबाला हो, सामान्य लोग भी निजी और सार्वजनिक जीवन में मन वचन और कर्म से बहुत हिंसक हो चुके हों, राजनीति में सेवाभाव की अहमियत पर ज़ोर देने वाले गाँधीजी के पहलू के बारे में बात करना ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। समाज में सेवा, करुणा, सौहार्द की भावना स्थापित करने में गाँधीजी की तरकीबें आज भी सबसे कारगर हैं।

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