loader

मज़दूरों को अधिक राहत देने के लिए मनरेगा में बदलाव करे सरकार

जब कोरोना का ख़तरा ख़त्म हो जाएगा तो ये करोड़ों मज़दूर खुशी-खुशी काम पर लौटना चाहेंगे और सरकार का सिरदर्द अपने आप ठीक हो जाएगा। गलवान घाटी का तनाव घट रहा है तो सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अब अपना पूरा ध्यान कोरोना से लड़ने में लगाएगी।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक

तालाबंदी के दौरान जो करोड़ों मज़दूर अपने गाँव लौट गए थे, उन्हें रोज़गार देने के लिए सरकार ने महात्मा गांधी रोजगार योजना (मनरेगा) में जान डाल दी थी। सरकार ने लगभग 4.5 करोड़ परिवारों की दाल-रोटी का इंतजाम कर दिया था। लेकिन इस योजना की तीन बड़ी सीमाएं हैं।

मनरेगा की ख़ामियाँ

एक तो यह कि इसमें दिन भर की मज़दूरी लगभग 200 रुपए है। दूसरा, किसी भी परिवार में सिर्फ एक व्यक्ति को ही मज़दूरी मिलेगी। तीसरा, पूरे साल में 100 दिन से ज्यादा काम नहीं मिलेगा। यानी 365 दिनों में से 265 दिन उस मज़दूर या उस परिवार को कोई अन्य काम ढूंढना पड़ेगा।
सरकार ने तालाबंदी के बाद मनरेगा की कुल राशि में मोटी वृद्धि तो की ही, उसके साथ-साथ करोड़ों लोगों को मुफ़्त अनाज बाँटने की घोषणा भी की। इससे भारत के करोड़ों नागरिकों को राहत तो ज़रूर मिली है, लेकिन अब कई समस्याएँ एक साथ खड़ी हो गई हैं।

पहली समस्या तो यह कि सवा लाख परिवारों के 100 दिन पूरे हो गए हैं। इसके अलावा 7 लाख परिवारों के 80 दिन और 23 लाख परिवारों के 60 दिन भी पूरे हो गए।
 शेष चार करोड़ परिवारों के भी 100 दिन कुछ हफ़्तों में पूरे हो जाएँगे। फिर इन्हें काम नहीं मिलेगा। ये बेरोज़गार हो जाएंगे। 

बरसात के बाद?

अभी बरसात और बुवाई के मौसम में ग़ैर-सरकारी काम भी गाँवों में काफी हैं, लेकिन कुछ समय बाद शहरों से गए ये मज़दूर क्या करेंगे? इनके पेट भरने का ज़रिया क्या होगा?

क्या करे सरकार?

कोरोना और उसका डर इतना फैला हुआ है कि मज़दूर अभी शहर लौटना नहीं चाहते। ऐसी स्थिति में सरकार को तुरंत कोई रास्ता निकालना चाहिए। वह चाहे तो एक ही परिवार के दो लोगों को रोज़गार देने का प्रावधान कर सकती है।
सरकार चाहे तो 202 रुपए के बजाय 250 रुपए रोज़ दे सकती है और 100 दिन की सीमा को 200 दिन तक बढ़ा सकती है ताकि अगले दो-तीन माह, जब तक कोरोना का ख़तरा है, मजदूर और उनके परिवार के बुजुर्ग और बच्चे भूखे नहीं मरें।
जब कोरोना का ख़तरा ख़त्म हो जाएगा तो ये करोड़ों मज़दूर खुशी-खुशी काम पर लौटना चाहेंगे और सरकार का सिरदर्द अपने आप ठीक हो जाएगा।
गलवान घाटी का तनाव घट रहा है तो सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अब अपना पूरा ध्यान कोरोना से लड़ने में लगाएगी।

(डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
डॉ. वेद प्रताप वैदिक
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

विचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें