पूरे देश को इस विषय पर बात करना चाहिए क्योंकि यदि देश की सियासत हृदयहीन होगी तो नौकरशाही भी वैसी ही हो जाएगी और भुगतना पडेगा जनता को। जनता पहले से ही बहुत कुछ भुगत रही है। आगे भी उसे बहुत कुछ भुगतने के लिए कमर कसकर तैयार रहना चाहिए। दरअसल इस समय देश रहस्यवाद से घिरा है। किसी को नहीं पता कि देश में अगले पल क्या होगा ? कोई नहीं जानता कि संसद के विशेष सत्र की दूसरे दिन की कार्यसूची क्या है ? किसी को जानने की क्या जरूरत है ? जो होगा सो सामने आ ही जाएगा।
सरकार एक देश एक चुनाव के बारे में सोच सकती है । एक देश एक नागरिक संहिता के बारे में सोच सकती है लेकिन एक देश, एक भाषा के बारे में नहीं सोच सकती। हिंदी कोई संविधान की धारा 370 नहीं है जो संसद की सहमति से उसे हटा दिया जाये । हिंदी एक भाषा है, भाषा को कोई सियासी दल अपने चुनावी एजेंडे में शामिल नहीं करना चाहता । क्योंकि उसे एक देश एक चुनाव तो मजबूरी में चाहिए, एक देश एक भाषा नहीं।