गुरुग्राम में बांग्ला भाषियों को हिरासत में लेने से दहशत, बंगाल लौटने को मजबूर मजदूर
राजनीति के विद्वान और अर्थशास्त्री का साथ आना और सात सौ साठ पन्नों में पूरे भारत की आधुनिक यात्रा का हिसाब लिखना- यह कोई रोज़ का काम नहीं है। ए सिक्स्थ ऑफ़ ह्यूमैनिटी: इंडिपेंडेंट इंडिया’स डेवलपमेंट ओडिसी में देवेश कपूर और अरविंद सुब्रमणियन ने यही किया है। एक तरफ़ संस्थागत अध्ययन, दूसरी तरफ़ आर्थिक सलाहकार का अनुभव- किताब आती है तो साथ लाती है बौद्धिक वजन और विश्लेषण की ऊँचाई।
इकोनॉमिस्ट ने इसे “साहसी” कहा- क्योंकि भारत ने पहले लोकतंत्र चुना, फिर विकास। भूख और गरीबी के बीच सबको वोट का हक़ दिया। किताब बताती है कि चार धाराएँ साथ-साथ चलीं: आधुनिक राज्य का निर्माण, प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था का उदय, जाति-धर्म से भरी समाज की परतों का हिलना, और विविधता से भरे देश को एक सूत्र में बाँधना। आँकड़ों पर पकड़ मज़बूत, तुलना में अनुशासन। वे आसान मिथकों को तोड़ते हैं और दिखाते हैं कि कैसे गाँव बढ़ते रहे, उद्योग ठहर गया, सेवाएँ समय से पहले फूल गईं। 1950 से 1980 का दौर, वे सिर्फ़ आयात-प्रतिस्थापन नहीं मानते, बल्कि कमी का राज बताते हैं—जहाँ निजी उद्यम दबा रहा और सार्वजनिक निवेश अधूरा रहा।
किताब भारत की बड़ी तस्वीर खींचती है। लेकिन ज़मीनी रंग अधूरा रह जाता है।
दूरबीन से देखने पर दूर की चीज़ साफ़ दिखती है, पर गहराई खो जाती है। राजनीति और अर्थशास्त्र की दो लेंस से भारत की दशकों की कहानी बनती है- विकास दर, संस्थागत ताक़त, बजट की नीतियाँ, कल्याण योजनाएँ। तस्वीर में पैटर्न साफ़ है, पर बनावट धुँधली।
लोकतंत्र ने प्रतिनिधित्व दिया, पर जवाबदेही में चूका?
लेखक अपनी कमियों को छिपाते नहीं। लोकतंत्र ने प्रतिनिधित्व दिया, पर जवाबदेही में अक्सर चूका। विकास आया, पर टुकड़ों में और असमान। राज्य कभी ज़्यादा दखल देता है, कभी ग़ायब हो जाता है। वे चेतावनी देते हैं कि संस्थाएँ पीछे जा सकती हैं और देश की एकता जलवायु संकट, तकनीकी हलचल और जनसंख्या के दबाव में नाज़ुक हो सकती है।
लेकिन यह सब ऊपर से देखने की कहानी है। ज़मीन पर तस्वीर और है।
आज़ादी के बाद भारत की आबादी तीन गुना से ज़्यादा हो चुकी है। हर दशक में जैसे नया देश जोड़ना पड़ा— पढ़ाना, रोज़गार देना, शासन करना। दाख़िला बढ़ा, पर बुनियादी कौशल अधूरे। जनसंख्या लाभ का मतलब हुआ करोड़ों को संतुलन पर टिकाए रखना— राशन और नक़द से भूख से बचाना, पर स्थायी उन्नति नहीं देना।
कुल मिलाकर कहना ठीक है। जीना कुछ और है।
सूखे ज़िले का किसान ‘सेवा क्षेत्र का समय से पहले बढ़ना’ नहीं देखता, वह देखता है कि पास में कोई काम नहीं। शहर का मज़दूर “बेरोज़गार विकास” नहीं पढ़ता, वह देखता है कि मज़दूरी टूट गई। निचले मध्यम वर्ग का परिवार जानता है कि भारत ऊपर जा रहा है, पर यह चढ़ाई नाज़ुक है—एक बीमारी या नौकरी जाने से सब उलट सकता है।
आठ दशकों में करोड़ों ऐसी कहानियाँ साथ-साथ चलीं। किताब उन्हें आँकड़ों में बदल देती है। पर उनके बोझ, उनकी उम्मीदें, उनकी ठोकरें और उनकी जिद—यह सब आँकड़ों में नहीं उतरता।
यह विद्वता की कमी नहीं, तरीक़े की सीमा है।
असमानता
जब असमानता आँकड़ों में बँटती है, तो उसका रोज़ का असर धुँधला हो जाता है। जब जाति को ढाँचे में लिखा जाता है, तो उसकी रोज़ की बातचीत पीछे हट जाती है। जब संघीय ढाँचे को संस्थागत कहा जाता है, तो स्कूल, अस्पताल और अदालत की असमानता सिर्फ़ एक चर बन जाती है—न कि उम्मीद और हार के बीच की दीवार।
भारत की कहानी हमेशा अनोखी रही है: गरीब, विशाल, विविध समाज जिसने पहले वोट दिया, फिर पढ़ाई की; पहले अधिकार चुने, फिर दौलत; पहले बहस की, फिर एकता। यह चुनाव अद्भुत था। पर उसका असर सबको बराबर नहीं मिला। दिल्ली की नीति और कस्बे की राशन लाइन के बीच दूरी सिर्फ़ भौगोलिक नहीं, अनुभवजन्य है।
कपूर और सुब्रमणियन ने संस्थागत और आर्थिक यात्रा का बड़ा लेखा लिखा है। नीति-निर्माता और विद्वान इसे बरसों पढ़ेंगे। यह बताता है कि भारत क्यों पूर्व एशिया की तरह उद्योग से नहीं उठा, क्यों राज्य की क्षमता चुनावी ताक़त के बावजूद कमज़ोर रही, क्यों पोषण आय से पीछे रहा। यह न तो आसान विजय गाता है, न आसान निराशा।
आँकड़े पैटर्न दिखाते हैं
पर कोई दूरबीन धूल में खड़े होने का विकल्प नहीं। भारत को समझना आँकड़ों से भी ज़्यादा माँगता है—अर्थशास्त्री की ग्राफ़, राजनीति के संस्थान, पर साथ ही लेखक की संवेदना, नागरिक की गवाही। आँकड़े पैटर्न दिखाते हैं, अर्थ नहीं थामते।
भारत की यात्रा चलती है—स्प्रेडशीट में और कहानियों में, बजट तालिकाओं में और परिवार की डायरी में, संसद की बहस में और घर की फुसफुसाहट में। कोई भी लेखा इसे पकड़ने की कोशिश करेगा, तो कुछ साफ़ दिखेगा और कुछ छूट जाएगा।
ए सिक्स्थ ऑफ़ ह्यूमैनिटी भारत को दूर से साफ़ देखती है। अगली गिनती को पास से सुनना भी सीखना होगा।