जंतर मंतर प्रकरण का बढ़ता घेरा
जंतर-मंतर सरकार की जान नहीं छोड़ रहा है। जिस शख्स को हवाई अड्डे से लाकर और सारे परमिशनों के साथ जंतर मंतर पर बैठने की व्यवस्था हुई उसी के द्वारा शुरू हुआ आंदोलन अभी तक के मोदी राज के लिए सबसे नुकसानदेह साबित हुआ और अभी भी यह शांत नहीं हो रहा है। मंत्री के इस्तीफे समेत सारी मांगें पूरी हो गई हैं लेकिन सांसत ऐसी हो गई है कि संसद भवन में मौजूद रहकर भी प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सदन का सामना नहीं कर पाए और पूरा मानसून सत्र बेमानी बन गया।
बात आंदोलन की मांगों से हटकर 20 जुलाई को हुई पुलिस कार्रवाई और पैलेट गन से फायरिंग पर आ गई। खुद सरकारी पक्ष ने इस बारे में इतनी तरह की बातें कर दीं कि विपक्ष के लिए बड़ा मौक़ा हाथ आ गया। अगर गृहमंत्री ने फायरिंग का आदेश दिया तब भी स्वीकारना मुश्किल और अगर उनकी जानकारी के बगैर दिल्ली और संसद के दरवाजे पर फायरिंग हो गई तो और मुश्किल। जाहिर है इस स्थिति को शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपाकर नहीं टाला जा सकता है। पर सिर निकालना भी आसान नहीं है।
फेशियल पहचान तकनीक पर फँसी सरकार
और जब तक यह मुद्दा है और रहा तब तक ही दूसरा मामला भी सामने आ गया। जब आंदोलन बहुत तेजी से बढ़ा और सरकार की साँस फूलने लगी तो बीजेपी और मोदी समर्थकों ने आंदोलन को लेकर कई तरह की बातें कीं और सोशल मीडिया पर जेन जी के प्रचार का जबाब देने की कोशिश की। इसमें आंदोलन के फ़ॉरेन फँडेड होने और आंदोलनकारियों के बीच अपराधी तत्वों की मौजूदगी होने के आरोप भी थे। फ़ॉरेन फँडेड का प्रमाण तो वहां आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने वालों द्वारा बाहर से खाना भेजने की पर्चियों को डस्टबिन से जुटाने जैसी बेवकूफी से जुटाने का प्रयास किया गया लेकिन अपराधियों की मौजूदगी के लिए पुलिस के फेशियल पहचान वाहन में आए रिकॉर्ड का हवाला दिया गया।
बाद में पुलिस से भी यह रिकॉर्ड जाहिर कराया गया। कुछ पुलिस वालों के चोटिल और घायल होने की बात भी थी। लेकिन जल्दी ही उनके प्लास्टर उतारने के प्रमाण भी सोशल मीडिया पर आने लगे। आंदोलनकारियों के पास पत्थर से भरा ट्रक खड़ा होने के प्रमाण भी आए।
पुलिस वालों के साथ मिलकर कुछ सिविलियन ड्रेस वालों की गुंडागर्दी के प्रमाणों ने तो सरकारी प्रयासों को पलीता ही लगा दिया। बच्चों ने ही उनमें से कई की जन्मपत्री तलाशकर सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दिया। सरकार और संघ परिवार ने जेन ज़ी से संवाद बढ़ाने का प्रयास भी किया।
पर जब दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जबाब में कहा कि उसकी फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक से लैस वाहन ने जंतर मंतर आंदोलन के दौरान 2873 ऐसे लोगों की पहचान की जो उसके रिकॉर्ड के अनुसार अपराधी हैं। जाहिर है, यह बहुत बड़ी संख्या है और बहुत भरोसेमंद बात है। इनमें हत्या, डाका, बलात्कार से लेकर आर्म्स ऐक्ट जैसी धाराओं के मामले वाले अपराधी भी थे और काफी बड़ी संख्या में थे। शुरू में बहस इसी पर चल रही थी कि ये लोग वहां किस तरह पहुंचे।
कायदे से कोई भी अपराधी सरकार विरोधी ऐसी गतिविधि में शामिल होकर शासन को और नहीं चिढ़ा सकता जिससे उसे सीधे कोई लाभ न होता हो। दूसरी तरफ यह संभावना ज्यादा होती है कि वह शासन तंत्र के इशारों पर और उसे खुश करने के लिए कुछ ऐसे काम करे जिससे उसके खिलाफ के मामलों में कुछ ढील हो जाए। इससे शासन को भी अपनी पुलिस या पार्टी के लोगों से ‘बुरे काम’ करने की मजबूरी खत्म हो जाती है। पक्ष और विपक्ष इन तर्कों का अपने अपने ढंग से इस्तेमाल कर रहा था।
स्वतंत्र भारद्वाज मुद्दा
इसी बीच, स्वतंत्र भारद्वाज नामक एक अपराधी का इंटरव्यू वायरल हुआ जिसमें एक दलित आंदोलनकारी लड़की के पिता के सिर फोड़ने और कई भाजपाई नेताओं को अपना बड़ा भाई बताने के साथ नरेंद्र मोदी को अपना संरक्षक बताकर अपना बाल भी बांका न होने का दावा किया गया था। मजेदार बात यह है कि सरकार जेन जी से संवाद बढ़ा रही है और वह पट्ठा सरकारी जेन जी का उदाहरण होने का दावा कर रहा था। पकड़े जाने पर तो अपराधी बड़े बड़े नाम लिया करते हैं जिससे उन नामों के रोब से कुछ लाभ हो जाए। लेकिन कैमरे के सामने पूरे भरोसे और प्रमाण सहित अपने बचने बचाने के किस्सों और तस्वीरों से लैस इस कथा ने हंगामा मचा दिया। वह तो गिरफ्तार हुआ लेकिन कई सवाल उठे। एक तो टाइमिंग का ही सवाल था। दूसरे उसकी कई और करतूतें भी उसके दावों के अनुरूप लगीं। और तीसरा यह हुआ कि वह ब्राह्मण था जबकि उसका और ‘उसकी सरकार’ के तंत्र का शिकार एक दलित। कांग्रेस को यह मामला उठाने में देर नहीं लगी।जेल में बंद अपराधी जंतर-मंतर कैसे पहुँचे?
तभी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार ने एक और धमाका कर दिया। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जबाब में फेशियल पहचान वाहनों के जरिए 2873 अपराधियों की पहचान और जंतर मंतर पर 20 से 27 जुलाई के बीच उनके सशरीर उपस्थिति के वेरीफिकेशन का दावा किया। एक्सप्रेस के अनुसार सरकारी रिकार्डों के अनुसार ही उनमें से कम से कम 25 लोग जेलों में उपस्थित थे। अखबार ने बाजाप्ता नाम और अपराध गिनाते हुए पूरी सूची छाप दी। अब अगर जेल वाले अपराधी भी 20 से 26 जुलाई के बीच जंतर मंतर पर देखे गए तो साफ है कि उनको जेलों से निकालकर वहां पहुंचाया गया। यह काम आंदोलनकारियों के वश में नहीं है। 17 अगस्त को अदालत में दिए अपने जबाब में दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि 2402 को दिल्ली पुलिस के बायोमेट्रिक डाटाबेस और 471 को आपराधिक रिकार्ड के आधार पर पहचाना गया। फेशियल पहचान तकनीक के जानकार बताते हैं कि इसमें भूल-चूक का मामला 20 फीसदी तक हो सकता है। जाहिर है सरकार और दिल्ली पुलिस इस तर्क को आधार बनाएगी।लेकिन यह मामला अदालत को जबाब देने या किसी तकनीक के सही गलत हो सकने का नहीं है। यह एक बड़ा राजनैतिक विषय है जिसके आंदोलन की समाप्ति के बावजूद अभी भी सरकार का दम फूलना जारी है। यह कई तरह से उसे डराता है। और विपक्ष भी काफी समय बाद इसी के सहारे हमलावर हुआ है, उसका दांव लगता दिख रहा है। इसमें से स्वतंत्र भारद्वाज मामले में सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई तेज करके हाथ झाड़ सकती है लेकिन उसमें भी इस अपराधी द्वारा कुछ नई चीजें जाहिर करने का ख़तरा रहेगा। लेकिन इस प्रसंग का दलित और राजनीतिक एंगल कहीं नहीं जाएगा। पर आंदोलन स्थल पर अपराधियों की मौजूदगी और सक्रियता ऐसा सवाल बनकर सामने आ गई है जो पैलेट गन मामले की तरह ही सरकार के लिए सांसत बढ़ा सकता है।