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मालदीव भी चीन के कर्ज-जाल में फँसेगा?

मालदीव की अब्दुल्ला यामीन सरकार के कार्यकाल के दौरान चीन और मालदीव के बीच नजदीकियां काफी बढ़ गई थीं और इसी दौरान मालदीव ने भारत के साथ राजनयिक और रक्षा सम्बन्धों का स्तर नीचा कर दिया था। मालदीव की सामरिक अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि चार लाख की आबादी वाले इस छोटे द्वीप देश का 2014 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दौरा किया था और इसके बाद से ही यामीन सरकार के भारत के प्रति तेवर काफी कड़े हो गए थे।

रंजीत कुमार

मालदीव में पिछली अब्दुल्ला यामीन सरकार के कार्यकाल (2013-2018) में चीन ने कई ढांचागत परियोजनाएं और बड़ी रिहायशी इमारतें बना कर मालदीव की जनता को खुश किया। लेकिन अब मालदीव की मौजूदा इब्राहिम मुहम्मद सालेह सरकार को चिंता सता रही है कि इन परियोजनाओं के लिये भारी ब्याज दर पर चीन के एक्सपोर्ट इम्पोर्ट बैंक ने मालदीव की सरकार और प्राइवेट कम्पनियों को जो भारी कर्ज दिया है, उसका भुगतान वह कैसे करेगी। 

मालदीव का सकल घरेलू उत्पाद करीब पांच अरब डॉलर का है। देश के पूर्व राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद के मुताबिक़ मालदीव पर चीन का करीब 3.1 अरब डॉलर का कर्ज चढ़ चुका है। कोरोना महामारी की वजह से मालदीव को पर्यटन से होने वाली एकमात्र आय में भारी कमी दर्ज की गई है।  इसलिये मालदीव की सरकार परेशान है कि अगर वह चीन को इन कर्जों का भुगतान वक्त पर नहीं करेगी तो चीन न जाने उसके साथ कैसे पेश आएगा।

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मालदीव के सबसे बड़े व्यापारी अहमद सियम को तब चीनी तेवर का सामना करना पड़ा जब एक चीनी बैंक ने उसकी कम्पनी को 12 करोड़ 75 लाख डॉलर के कर्ज में से वक्त के अंदर इसकी एक करोड़ डॉलर की पहली किस्त पिछले अगस्त माह तक चुकाने का नोटिस भेजा। जब अहमद सियम ने वक्त पर इसका जवाब नहीं दिया तो चीन की सरकार ने चेतावनी के लहजे में मालदीव सरकार को याद दिलाया कि उसने मालदीव की प्राइवेट कम्पनी के साथ अपने देश की सरकार की ओर से सम्प्रभु गारंटी दी है। 

चीन के बैंक ने मालदीव की कम्पनी को यह कर्ज एक निर्जन द्वीप पर लग्जरी रिजॉर्ट बनाने के लिए दिया था और इस रिजॉर्ट का निर्माण भी चीनी कम्पनियों ने ही किया। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद का कहना है कि चीनी कम्पनियों ने जायज लागत से कहीं ज्यादा कीमत वसूली है।

मालदीव की अब्दुल्ला यामीन सरकार के कार्यकाल के दौरान चीन और मालदीव के बीच नजदीकियां काफी बढ़ गई थीं और इसी दौरान मालदीव ने भारत के साथ राजनयिक और रक्षा सम्बन्धों का स्तर नीचा कर दिया था।

मालदीव की सामरिक अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि चार लाख की आबादी वाले इस छोटे द्वीप देश का 2014 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दौरा किया था और इसके बाद से ही यामीन सरकार के भारत के प्रति तेवर काफी कड़े हो गए थे।

श्रीलंका जैसा बर्ताव होगा?

अब मालदीव की सालेह सरकार को चिंता है कि कहीं श्रीलंका की तरह वह भी यदि चीन के सरकारी बैंक को कर्ज नहीं लौटा पाया तो चीन उसके साथ किस तरह पेश आएगा। गौरतलब है कि श्रीलंका में हमबनटोटा बंदरगाह के विकास पर चीन ने करीब डेढ़ अरब डॉलर का निवेश किया और जब श्रीलंका सरकार यह कर्ज लौटाने में लाचारी दिखाने लगी तो मजबूरन उसे हमबनटोटा बंदरगाह और इसके आसपास के बड़े इलाके को चीन को 99 साल की लीज पर सौंपने का समझौता करना पड़ा। 

इस तरह पूरे हमबनटोटा बंदरगाह और इसके पास की जमीन पर चीन सरकार का कब्जा हो गया है जो भारतीय सामरिक हलकों में चिंता पैदा कर रहा है। श्रीलंका के भीतर भी लोग सरकार से नाराजगी दिखा रहे हैं कि देश के भूभाग को चीन के हाथों गिरवी रखने के क्या नतीजे हो सकते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में सामरिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मालदीव में चीन ने लग्जरी रिजॉर्ट के विकास का ठेका इसी इरादे से लिया था। हालांकि मालदीव के व्यापारी ने चीन को कर्ज की पहली किस्त लौटा कर रिजॉर्ट को अपने अधिकार में रखा है लेकिन मालदीव में कई रिहायशी बहुमंजिली इमारतों और द्वीपों को जोड़ने वाले पुलों का निर्माण चीनी बैंक के निवेश से चीनी कम्पनियों द्वारा किया गया है जिसके लिये हासिल कर्ज को लौटाने का वक्त आ गया है।

कोलम्बो में भी किया निवेश 

गौरतलब है कि श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में चीन ने कई बड़ी बहुमंजिली रिहायशी इमारतों का निर्माण और अन्य ढांचागत विकास किये हैं। श्रीलंका की तरह मालदीव ने भी चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट में शामिल होने का एलान किया है। चीन बेल्ट एंड रोड के प्रोजेक्ट के तहत साझेदार देश में सड़क, पुल, बंदरगाह आदि का निर्माण अपने बैंक द्वारा दिये गए कर्ज और अपनी कम्पनियों द्वारा करवाता है। इस तरह चीन को दोतरफा लाभ होता है। 

चीन का एक्सपोर्ट इम्पोर्ट बैंक जिस दर पर ब्याज देता है वह अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक आदि से काफी अधिक होती है और इसके साथ शर्त यह भी होती है कि निर्माण का ठेका चीनी कम्पनियों को ही दिया जाएगा।

जिस तरह श्रीलंका की राजपक्षे सरकार को प्रभावित कर चीन ने श्रीलंका में बड़े ढांचागत प्रोजेक्टों में निवेश के समझौते किये, उसी तरह मालदीव में भी चीन ने पिछली यामीन सरकार को प्रभावित कर मालदीव में कई बड़े ढांचागत प्रोजेक्ट बनाने के समझौते अपने बैंकों से करवाए।  

2018 के चुनावों में पराजित पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के ख़िलाफ़ इन दिनों भ्रष्टाचार का मुकदमा चल रहा है और वह जेल में कैद हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने चीनी कम्पनियों के साथ हुए ढांचागत विकास ठेकों के लिये कमीशन लिया।

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सामरिक विस्तार में जुटा चीन

चीन न केवल श्रीलंका और मालदीव बल्कि भारत के अन्य पड़ोसी देशों- नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार को भी अपने बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट में शामिल कर वहां बड़े ढांचागत प्रोजेक्टों पर काम करने लगा है। चीन के लम्बे हाथ अफ्रीका और लातीन अमेरिका के छोटे गरीब मुल्कों तक पहुंच चुके हैं जहां वह ढांचागत प्रोजेक्टों के विकास के नाम पर अपना दबदबा बना रहा है और वहां के राजनीतिज्ञों को प्रभावित कर अपने सामरिक प्रभाव का विस्तार कर रहा है।

नई सरकार ने समझा खेल

मालदीव की नई सरकार चीन की इस चाल को समझ चुकी है इसीलिये उसने चीन के साथ नये ठेकों पर काम करना बंद कर दिया है। अब्दुल्ला यामीन सरकार को संकट से उबारने के इरादे से ही पिछले दो सालों में भारत ने मालदीव को करीब दो अरब डॉलर की वित्तीय सहायता विभिन्न मदों में दी है। 

दो सप्ताह पहले ही भारत ने जब मालदीव को 25 करोड़ डॉलर का वित्तीय अनुदान देने का एलान किया तो चीन के सामरिक हलकों में कहा गया कि चीन को काटने के लिये ही भारत मालदीव को वित्तीय मदद दे रहा है।

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