प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन पर स्वाभाविक तौर पर भारतीय जनता पार्टी और उनकी सरकारों में उत्साह है। उन्होंने इस मौक़े पर पूरे देश में अधिक से अधिक संख्या में दीप प्रज्वलन किया और 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक एक महीने तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाने का निर्णय लिया है। इस अभियान में उनके चुनाव क्षेत्र वाराणसी से उनके जन्मस्थान बडनगर तक और बडनगर से वाराणसी तक पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं को मोटरसाइकिल यात्रा पर जाने का काम दिया गया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रसिद्ध बौद्धिक और इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष राम माधव ने अपनी एक टिप्पणी में मोदी के जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि मोदी एक ऐसे विचारधारा से आते हैं जिसमें कहा गया है किः---

पथ का अंतिम लक्ष्य नहीं है
सिंहासन चढ़ते जाना
सब समाज को लिए साथ में
आगे है बढ़ते जाना
सफल राष्ट्र का अनुपम वैभव
सभी शांति से है लाना


वे लिखते हैं कि शासन की भारतीय अवधारणा तो सेवा भाव है और मोदी सरकार उसी सिद्धांत पर चल रही है। क्योंकि हमारे देश में यूरोप से भिन्न यह सोच है कि नर सेवा नारायण सेवा। यानी पूरे भक्ति भाव से समाज की सेवा करनी है। उन्होंने महाभारत में भीष्म द्वारा बताए गए राजधर्म की व्याख्या करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि उसके तीन तत्त्व हैं—साहस, समवेदना और समृदृष्टि। कुल मिलाकर राम माधव ने श्रेष्ठ राजनीतिक मूल्यों के जितने फूल हो सकते हैं सभी की वर्षा करते हुए मोदी को उनके जन्मदिन की बधाई दी है। हालांकि उन्हें यह स्मरण नहीं रहा कि भारतीय परंपरा के वर्णाश्रम धर्म (वर्ण व्यवस्था नहीं) में वानप्रस्थ की भी व्यवस्था है और राजा को सलाह दी गई है कि एक अवस्था के उपरांत उसे अपने योग्य उत्तराधिकारी को राजपाट सौंप कर वन को प्रस्थान कर देना चाहिए।
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राम माधव और उनके जैसे संघी सिद्धांतकारों के सोच में कई किस्म का लोचा है। भला यह कहां कहा गया है कि समाज की सेवा आप तभी शुरू करते हैं जब आप मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनते हैं। इस देश में बहुत सारे साधु संत और फकीर रहे हैं जो कि कभी सत्ता में नहीं रहे हैं, बल्कि सत्ता में रहने की कौन कहे वे तो सत्ता से बहुत दूर रहे हैं। फिर भी उन्होंने समाज की भरपूर सेवा की है। जिस महाभारत ग्रंथ से भीष्म का उल्लेख करते हुए राम माधव देश को राजधर्म बता रहे हैं उस महाभारत की रचना वेद व्यास नाम के एक ऐसे ऋषि ने की है जो कि राजभवन से दूर वनों में रहते थे। जबकि उनके वंशज महलों में निवास करते थे। महर्षि वाल्मीकि भी कभी अयोध्या से महल में नहीं रहे और न ही सत्ता में रहे। बल्कि अगर देखा जाए तो उन्होंने रामायण की रचना करने के साथ अपने शिष्य लव और कुश के माध्यम से राजसत्ता के अन्याय को चुनौती दे डाली। 

जिन कौटिल्य का संघ के विद्वान बार बार उल्लेख करते हैं वे कौटिल्य क्या राजमहल में रहते थे? बल्कि कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट बताया है कि राजा के निजी कार्य और शासकीय कार्य में फर्क होता है और शासकीय मदों को निजी कार्य में व्यय नहीं करना चाहिए। वे स्वयं ऐसा उदाहरण पेश करते थे। जिस तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ को संघ के लोग उद्धृत करते हुए नहीं थकते वे तुलसीदास किस राजमहल में रहे। अगर उन्होंने राम के आदर्श को समाज के समक्ष रखा तो अपनी आजीविका के लिए भिक्षाटन की वृत्ति अपनाई। बुद्ध और महावीर जैसे महान विचारक और पैगम्बर भला कौन सी सत्ता पर बैठकर देश और समाज की सेवा करते थे। उन्होंने तो राजपाट छोड़कर वनों में अपने भीतर दीप जलाए और मनुष्य को दुखों से मुक्त होने की राह बताई। 

झोपड़ी में रह कर स्वाधीनता संग्राम करने वाले महात्मा गांधी भी उसी राह के राही थे। वास्तव में गांधी के पथ का अंतिम लक्ष्य सिंहासन चढ़ते जाना नहीं था बल्कि सिंहासन से दूर जाना था और समाज में सिंहासन की आवश्यकता को ही समाप्त कर देने का था।


भारतीय परंपरा में राजा मंत्रिमंडल के सुझावों से सख्ती से बंधा होता था। क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भी ऐसा दृष्टांत प्रस्तुत किया जिससे लगे कि उन्होंने अपनी किसी भी स्वार्थ और राजकीय जिद के आगे मंत्रिमंडल की सलाह मानी। वे तो तब भी नहीं माने जब स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म की सलाह दी थी। नोटबंदी, लॉकडाउन ऐसे तमाम उदाहरण हैं जहां पर प्रधानमंत्री मोदी मंत्रिमंडल और तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं की सलाह को दरकिनार करते हुए या उनसे बिना सलाह लिए कार्रवाई करते दिखते हैं। सवाल उठता है कि अगर मोदी सत्ता में बैठकर ही समाज की सेवा कर रहे हैं तो क्या सन 2002 में हुए गुजरात के दंगे देश की सेवा थे? अगर किसी को वह सेवा लगता है तो उससे बड़ा राष्ट्र के उत्थान का विरोधी भला कौन हो सकता है।

दीप जलाना अच्छी बात है और अगर दीप जलाने का उद्देश्य सचमुच बड़ा हो तो उस महान कार्य में पूरे देश को जुट जाना चाहिए। बुद्ध ने दीप को ज्ञान का प्रतीक बताया है और कहा है कि ‘आप्तदीवो भव’। यानी कोई आप का गुरु नहीं है बल्कि आप अपने दीपक स्वयं हैं। यह उक्ति यह दर्शन भारतीय ज्ञान परंपरा की विश्व को बड़ी देन है। लेकिन क्या संघ और बीजेपी ने कभी इस तरह के सोच का प्रदर्शन किया है। उल्टे संघ परिवार के लोग यह मानते हैं कि सोचने का काम हमारे जिम्मे छोड़ दो और आप वही करो जो हम कहें। हम जिस तरह से समाज को परिभाषित करें उसे मान लो, हम जिस तरह से राष्ट्र को परिभाषित करें, उसे राष्ट्र मान लो और हम जिस तरह से युवाओं को परिभाषित करें उसे युवा मान लें। उन्होंने धर्म, विज्ञान और राजनीति, संस्कृति को परिभाषित करने का ठेका तो बहुत पहले से ले रखा है। आजकल भारत को एकतरफा ढंग से परिभाषित कर रहे हैं। इस तरह की सोच में अपने दीपक आप बनने की संभावना कहां है।
वास्तव में दीप ज्ञान का प्रतीक है। लेकिन जब ज्ञान की कोई नई धारा या संघ के सोच से भिन्न धारा पनपने की कोशिश करे तो उसे फूहड़, अश्लील और क्रूर ढंग से दबा देने की कोशिशें हो रही हैं। सेंटर फार स्टडीज इन डेवलपिंग सोसायटीज नाम के संस्थान को बंद करने की तैयारी सरकार ने कर ली है। रजनी कोठारी, धीरूभाई सेठ, आशीष नंदी, आदित्य निगम, योगेंद्र यादव, अभय कुमार दुबे जैसे जाने माने समाजशास्त्रियों को जन्म देने वाले इस संस्थान की भूमिका से देश और दुनिया अच्छी तरह से परिचित है। लेकिन बीजेपी और उसकी सरकार को यह नहीं सोहाता कि देश में ज्ञान का कोई ऐसा दीपक जलता रहे जिसकी लौ का रंग कुछ और हो। उसे तो देशवासियों की आत्मा को दीप्त करने वाला दीपक नहीं चाहिए बल्कि चेतना को सुला देने वाला दीपक चाहिए जो कि उजाले से अधिक अंधकार उत्पन्न करे। ऐसी ही स्थिति के लिए दुष्यंत कुमार ने कहा हैः-

कहां तो तय था चरागॉं हर एक घर के लिए
कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए


अयोध्या से लेकर देश के दूसरे कोनों में जब चिराग जलाकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड तोड़ने की कोशिशें होती हैं और बाद में जब लोग दीए से तेल निकाल कर खाना पकाने के लिए ले जाते हैं तो पता चलता है कि यह चिराग कितने घरों को वास्तव में मयस्सर हैं।
विचार से और
दीप प्रज्वलन के बारे में गोपाल दास नीरज का गीत एक बड़े दर्शन की ओर संकेत करता है और संभवतः वही विश्व बंधुत्व का दर्शन है जिसका दावा हमारे शासक बहुत करते हैं लेकिन जिसकी परवाह कम से कम करते हैं। वह गीत कुछ इस प्रकार है---

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए…
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी
चलेगा सदा नाश का खेल यूं ही
भले ही दिवाली यहां रोज आए


निश्चित तौर पर नीरज की यह चेतावनी किसी एक शासक के लिए नहीं बल्कि सारी दुनिया के शासक वर्ग के लिए है। अपनी सत्ता कायम रखने यानी सिंहासन चढ़ते जाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप, बेंजामिन नेतन्याहू, व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग सभी एक ही तरह का खेल खेल रहे हैं। हमारे शासक भी उनसे भिन्न नहीं हैं।