नरेंद्र मोदी सरकार ग़लती पर ग़लती करती जा रही है। वो अपनी ज़िद में ये ग़लतियाँ कर रही है या फिर नासमझी में, फ़िलहाल कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि ये ग़लतियाँ उसे काफ़ी भारी पड़ने वाली हैं। मुझे ऐसा लगता है कि अन्ना के आंदोलन के समय जो ग़लतियाँ मनमोहन सरकार ने की थीं, वो ग़लतियाँ आज मोदी सरकार दोहरा रही है। 2014 में कांग्रेस को उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा था और उसे सत्ता से बाहर जाना पड़ा था।
2011 का आंदोलन
2011 में किसी भी राजनीतिक दल ने कोई आंदोलन नहीं किया था। वो आंदोलन सिविल सोसायटी के कुछ लोगों ने शुरू किया था। वो आंदोलन भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ शुरू हुआ था। भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये एक व्यवस्था की स्थापना के लिये लोग सड़कों पर आये थे। लोकपाल बिल को क़ानून बनाने की कहानी रची गई थी और उसके दायरे में प्रधानमंत्री को भी लाने की वकालत की गई थी। सरकार ने उस आंदोलन को हल्के में तो नहीं लिया था लेकिन वो ये समझ नहीं पाई कि जनआंदोलन से कैसे निपटे, लोगों के ग़ुस्से को कैसे शांत करे। इस जद्दोजहद में एक लोकपाल क़ानून बना लेकिन वो किसी काम का नहीं था। मोदी सरकार ने तो उस क़ानून को ऐसा भोथरा किया कि आज किसी को याद भी नहीं है कि देश में कोई लोकपाल भी है। और जो लोकपाल को लाने के लिये जेल गये थे, उनके ऊपर आज भ्रष्टाचार के बेहद गंभीर आरोप हैं। वो जेल की हवा खा रहे हैं। केजरीवाल और उनकी पार्टी को अब न तो लोकपाल की परवाह है और न ही भ्रष्टाचार उनके लिये कोई मुद्दा है।अब चुनावी प्रक्रिया पर संगीन आरोप
सवाल आज आर्थिक भ्रष्टाचार का नहीं है। आज मुद्दा उससे कहीं ज्यादा गंभीर है। पूरी चुनावी प्रक्रिया को भ्रष्ट कर के बीजेपी को चुनाव जिताने के बेहद संगीन आरोप चुनाव आयोग पर लग रहे हैं और लोग ये देखकर हैरान हैं कि बीजेपी और सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को पूरी ताक़त से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने SIR के ज़रिये ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश की है कि चुनाव कहीं भी हो, जीत बीजेपी की होनी चाहिये। तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्त ये आरोप लगा रहे हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ग़ैर क़ानूनी काम कर रहे हैं। वोटर लिस्ट को मनमाने तरह से जोड़ा घटाया जा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद लोगों का ग़ुस्सा आसमान पर है। कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दल सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं। सरकार उससे निपटने के लिये सत्ता के डंडे का बेजा इस्तेमाल कर रही है।
इंदिरा के आपातकाल को पीछे छोड़ा!
10 अक्टूबर को जिस तरह से पूरी दिल्ली को एक छावनी में तब्दील कर दिया गया, वो अभूतपूर्व है। उसने इंदिरा गांधी के आपातकाल को भी पीछे छोड़ दिया। इंदिरा ने जो कुछ किया वो आपातकाल लगा कर किया, अब जो हुआ वो आपातकाल से भी ज्यादा भयानक है। प्रभु चावला जैसे पत्रकार, जिन्होंने आपातकाल को देखा और भोगा था, उन्होंने मुझे बताया कि ऐसा सत्ता का दमन उन्होंने पहले नहीं देखा था। दिल्ली कभी भी ऐसी नहीं बनी थी कि लोगों का दो कदम चलना मुहाल हो जाये। 250 से अधिक ट्रेनों को कैंसिल कर दिया जाये, 45 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिये जाये, दिल्ली आने वाले 37 रास्तों को जाम कर दिया जाये, पूरी दिल्ली में 40 हज़ार के आसपास पुलिस और पैरा मिलिटरी के जवानों को तैनात कर दिया जाये, कदम कदम पर बैरिकेड लगा दिया जाये, आंदोलनकारियों को जबरन भेड़-बकरियों की तरह बसों में भर कर हिरासत में लिया जाये और पत्रकारों को भी न बख्शा जाये। मनमोहन सरकार ने इस तरह का पुलिसिया दमन नहीं किया था।अन्ना हजारे और रामदेव की टीम के साथ मनमोहन सरकार के लोग लगातार संपर्क में थे। रामदेव ने जब आंदोलन का ऐलान किया था तब तो उनसे मिलने के लिये कैबिनेट मंत्री एयरपोर्ट गये थे, उनको समझाने के लिये। जबकि मोदी सरकार आंदोलनकारियों से संपर्क साधने को अपनी कमजोरी मानती है।
इस कॉलम के लिखने तक किसी तरह का संपर्क कॉकरोच जनता पार्टी के साथ नहीं किया गया। दमन का आलम ये है कि अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को हवाई जहाज से उतरने नहीं दिया गया। उन्हें जहाज के अंदर ही जा कर हिरासत में ले लिया गया। जैसे वो कोई ख़ूँख़ार आतंकवादी हों। और हैरानी की बात ये है कि अगले दिन मजिस्ट्रेट के सामने पुलिस ये नहीं बता पाई कि क्यों उनको गिरफ्तार किया गया था और वो पुलिस की हिरासत से छूट गये।
सरकार की तीन बड़ी ग़लतियाँ
सरकार तीन बड़ी ग़लतियाँ कर रही है। एक, वो पूरे मामले को क़ानून और व्यवस्था की नज़र से देख रही है। और उसे लगता है कि पुलिस के डंडे से आंदोलन की हवा निकाल सकती है। वो ये भूल गई है कि आंदोलनों की तासीर डंडों से ठंडी नहीं होती। बातचीत ही एकमात्र रास्ता है। पुलिसिया दमन से अंदर ही अंदर शोला भड़कता रहता है और फिर एक दिन वो बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी बन फट जाता है और साथ ही सरकारों को जला कर स्वाहा कर देता है। ऐसा 1977 में देश ने देखा है।पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था कठघरे में
दो, ये मामला लोकतंत्र की मूल आत्मा से जुड़ा है। ये आरोप कि मुख्य चुनाव आयुक्त पूरी चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी कर बीजेपी को जिताने का काम कर रहे हैं, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर देता है। समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो लोगों का चुनाव पर से ही भरोसा उठ जायेगा। पहले भी चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगे कि बूथ लूट लिये गये, कमजोर तबके के लोगों को वोट नहीं देने दिया गया, वोटर लिस्ट से लोगों के नाम हटा दिये गये, इत्यादि लेकिन ये आरोप नहीं लगा कि चुनाव आयोग ही संगठित तरह से सत्ताधारी पार्टी को जिताने के लिये धाँधली कर रहा है। SIR को जैसे अंजाम दिया जा रहा है, पूरे देश में 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट से निकाले गये हैं, और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट आने के बाद इस बात की पुष्टि होती है कि ये सब ज्ञानेश कुमार की सरपरस्ती में हो रहा था, तो ये सामान्य घटना नहीं है। भारत में दूसरे देशों की तरह केंद्रीकृत तरह से चुनाव लूटने के आरोप पहले कभी नहीं लगे, जीत कर सरकार बनाने वालों की ईमानदारी पर शक नहीं किया गया था, लेकिन अब ये आरोप लग रहे हैं और सरकार जवाब देने की जगह लोगों को चुप कराने में लगी है।
ज्ञानेश कुमार के बचाव में बीजेपी
तीन, बीजेपी और सरकार में बैठे लोग जिस तरह से ज्ञानेश कुमार के बचाव में उतर आये हैं, वो हैरान करने वाला है। लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि आख़िर ये रिश्ता क्या कहलाता है। क्यों बीजेपी ज्ञानेश कुमार की रक्षा में उतर आयी है? उसकी क्या मजबूरी है? लोगों के गले ये बात नहीं उतर रही है कि सरकार संवैधानिक संस्था की मर्यादा की रक्षा करने के लिये मुख्य चुनाव आयुक्त का बचाव कर रही है। बीजेपी की मातृ संस्था आरएसएस को कभी भी संविधान में यक़ीन नहीं था, वो इसको बदल कर नये संविधान का बनाने की वकालत करती रही है। और जब बीजेपी विपक्ष में थी तो वो खुद संवैधानिक संस्थाओं पर तीखे हमले करती रही है। ऐसे में उसके तर्क विश्वास योग्य नहीं है। क़ायदे से बीजेपी को भी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद जाँच की मांग करनी चाहिये ताकि आयोग की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और ईमानदारी पर लग रहे दाग को धोया जा सके। पर वो ऐसा न कर इस शक को पुख्ता कर रही है कि कहीं वो मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ वाक़ई में तो नहीं मिली हुई है और चुनाव जीतने के लिये उसने एक बड़ी साज़िश रची है।ऐसा लगता है कि देश की राजनीति करवट बदल रही है। एक नई सुबह का आग़ाज़ हो रहा है। बेहतर हो बीजेपी अपनी ग़लतियों को सुधारे और कुछ बड़े क़दम उठा कर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के विश्वास को फिर से बहाल करे। उसे ये समझना चाहिये कि लोकतंत्र से ऊपर न दल हैं और न नेता। लोकतंत्र है तो बीजेपी है। लोकतंत्र नहीं होगा तो बीजेपी भी नहीं होगी। क्या वो ये समझेगी?