सोनम वांगचुक अनशन पर हैं।

मोदी सरकार को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है।

  • उनके समर्थक अब अपील कर रहे हैं कि राहुल गांधी और अन्यों को उनके समर्थन में आना चाहिए।
  • कई सिर्फ़ इस बात से ख़ुश हैं कि गांधीवादी तौर-तरीकों की हार हो रही है।
  • कई ये कहने लगे हैं कि गांधीवादी अनशन और तरीक़े सिर्फ़ इसीलिए सफल हुए थे, क्योंकि ब्रिटिश उनके मित्र-विपक्ष थे। हिटलर के सामने गांधी फेल हो जाते।
  • और कई इस थ्योरी को फिर से पेश करने लगे हैं कि गांधी का इस्तेमाल ब्रिटिश ने सेफ्टी-वाल्व की तरह किया था, और क्रांतिकारियों की जगह ख़त्म करने के लिए गांधी को प्रमोट किया गया था।
इस में से हर एक बात ग़लत है।

सब से पहले तो ये जान लीजिए कि गांधी ने ब्रिटिश के ख़िलाफ़ कभी कोई अनशन किया ही नहीं था। वो इतने भोले नहीं थे, या इस मुग़ालते में कभी नहीं थे, कि वो अनशन करेंगे और ब्रिटिश झुक जाएँगे। तो फिर गांधी अनशन क्यों करते थे? इस बात पर बाद में आते हैं।

पहले, एक याद दिला दें कि पंद्रह साल पहले, इस देश के सामने गांधी के नाम पर एक फ्रॉड किया गया था। गांधी टोपी पहना कर, अनशन पर बैठा कर, अन्ना हज़ारे को ज़िंदा गांधी, नया गांधी बना कर पेश किया गया था।

लेकिन सिर्फ़ अनशन पर बैठ जाने से कोई गांधी नहीं हो जाता है। जैसे सिर्फ़ काला कोट पहना लेने से कोई वकील नहीं बन जाता है या गले में स्टेथोस्कोप टाँग लेने से कोई डॉक्टर नहीं बन जाता है।
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अन्ना से सोनम वांगचुक अलग हैं

अन्ना गांधी नहीं थे, अब पूरा देश जानता है। सोनम वांगचुक लेकिन अलग हैं। उनके संघर्षों, उनकी उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन तमाम उपलब्धियों के बावजूद वो भी गांधी के तौर-तरीकों के अतिसरलीकरण के शिकार हो गए हैं। इसलिए आज मोदी सरकार और RSS की संवेदनहीन दीवार से सिर्फ फोड़ रहे हैं, ग़ैर-राजनैतिक आंदोलन का दावा करते-करते, निष्पक्षता की चादर ओढ़ने के बावजूद फाइनली राहुल गांधी और अन्य राजनैतिक दलों से अपील भी करने लगे हैं, साथ-साथ उन्हें नैतिकता का पाठ भी पढ़ाने लगे हैं। गुड खाना चाहते हैं, गुलगुलों से परहेज़ करते नज़र आ रहे हैं।

अब वापस गांधीवादी तरीकों पर आते हैं। समझते हैं कि गाँधी ने क़रीब 17 बड़े अनशन किए, लेकिन इन में एक भी ब्रिटिश के ख़िलाफ़ अनशन क्यों नहीं था। यह कोई संयोग नहीं था। यह गांधी की गहरी समझ थी, जिसे भूलना नहीं चाहिए।

गांधी के अनशन का मतलब

गांधी का अनशन अंदर की ओर (Inward Looking) देखता था। वो अपने ही लोगों पर, अपनी ही अंतरात्मा पर, अपने ही समाज और साथियों पर टारगेट होता था। 1918 में अहमदाबाद में मिल मज़दूरों की हड़ताल कमज़ोर पड़ने लगी, तो गांधी अनशन पर बैठे। अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि डगमगाते मज़दूरों का हौसला बाँधने के लिए। 1947 में कलकत्ता जल रहा था, तो गांधी अनशन पर बैठे, किसी सरकार के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि अपने ही दंगाई देशवासियों की आत्मा झकझोरने के लिए। और वो मशहूर “आमरण अनशन”, 1932 का पूना पैक्ट, वो भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं था। आंबेडकर और सवर्ण हिंदुओं को अपनी बात मनवाने के लिए था और दोनों ने फाइनली बात मानी भी थी। अंग्रेज़ तो किनारे खड़े तमाशबीन थे।

यही अनशन का यंत्र है। अनशन उन पर असर करता है जो आपसे नैतिक रूप से जुड़े हैं, जो आपकी मौत का बोझ नहीं उठा सकते, यानी अपने लोग। दुश्मन सरकार, आत्मकेंद्रित सरकार, डिक्टेटर सरकार, जो आपसे कोई अपनापन महसूस ही नहीं करती, उस पर अनशन का ज़ोर नहीं चलता। इसलिए मोदी सरकार की बेरुख़ी गांधीवादी तरीके की हार नहीं है।

ये ग़लत जगह, ग़लत गांधीवादी अस्त्र चलाने का मामला है। अन्ना हज़ारे आंदोलन के वक़्त ये हथियार सफल हुआ था क्योंकि कांग्रेसनीत सरकार लोकतांत्रिक विरोध की स्पेस देती थी और मीडिया उनके साथ था। अब दोनों ही बातें नहीं है। इसलिए सोनम का अनशन मजबूरी की दास्तान दिखायी दे रहा है।

तो सत्ता के ख़िलाफ़ गांधी का हथियार क्या था?

पहला, सत्याग्रह और असहयोग, जो सीधे सत्ता पर, बाहर की ओर (outwards) वार करता था। इसकी बुनियादी समझ यह थी कि कोई हुकूमत तभी तक चलती है जब तक जनता उसके साथ सहयोग करती है। विदेशी कपड़ा मत ख़रीदो, नमक-कर मत भरो, अदालतों और दफ़्तरों को चलाना बंद कर दो और हुकूमत की पूरी मशीन जाम हो जाती है। सरकार पर दबाव ऐसे बनता है, जनता को साथ ले कर, न कि चुपचाप भूखे रहकर इस उम्मीद में कि सत्ता को दया आ जाएगी।

दूसरा, और इन सबको बाँधने वाली अहिंसा। अहिंसा सिर्फ मजबूरी में थोपा गया सपना नहीं थी, एक सिद्धांत था। फिलोसफी भी थी, और ठंडे दिमाग़ से रची गई रणनीति भी थी।

दार्शनिक रूप से, अहिंसा की नीति के पीछे तर्क था कि ग़लत रास्ते से कभी सही लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सकता है। गांधी मानते थे कि साधन और साध्य अलग नहीं किए जा सकते। अहिंसा हथियार भी थी। निहत्थे, प्रतिरोध न करते शरीर पर पड़ती हर लाठी नैतिक अधिकार को शासक से छीनकर शासित को सौंप देती थी, और जनमत को हिला देती थी। अहिंसा ढाँचा थी; अनशन और सत्याग्रह उसके भीतर के प्रैक्टिकल अस्त्र थे।

अब उन दो प्रोपेगंडा पर आइए जो आजकल ख़ूब परोसे जा रहे हैं।

क्या गांधी हिटलर के सामने फ़ेल हो जाते?

पहला कि गांधी हिटलर के सामने फ़ेल हो जाते। यह तर्क गांधी के अपने जीवन के अनुभव पर ही औंधे मुँह गिरता है। गांधी ख़ुद जानते थे कि सत्याग्रह विरोधी पर निर्भर करता है। यह उसकी कमज़ोरी नहीं, उसकी परिभाषा है। सही सवाल यह नहीं कि “गांधी हिटलर के सामने क्या करते।” सही सवाल यह है कि निर्दयी सत्ता के सामने सही हथियार कौन-सा है। गांधी ने कभी दावा नहीं किया कि हर विरोधी के लिए एक ही औज़ार चलेगा। हिटलर-गांधी का यह बचकाना द्वंद्व दरअसल गांधी को समझने की जगह उन्हें सिर्फ अनशन के एक नारे में समेट देने की एक सतही कोशिश का नतीजा है।

दूसरा “सेफ्टी-वाल्व” वाली थ्योरी, कि ब्रिटिश ने क्रांतिकारियों की जगह ख़त्म करने के लिए गांधी को बढ़ावा दिया, कि गांधीवादी आराम से आंदोलन करके सुरक्षित बच जाते थे, जबकि क्रांतिकारी मरते थे। यह सबसे घातक प्रोपेगंडा है और इसे पूरी तरह एक्सपोज़ करना ज़रूरी है।

अगर ब्रिटिश सत्ता अनशन को सचमुच “सेफ्टी-वाल्व” की तरह इस्तेमाल कर रही होती तो जतिनदास को न मरने देती। 1929 में लाहौर जेल में वो तिरसठ दिन भूखे रहे। जेल कमेटी ने रिहाई की सिफ़ारिश की, पर सरकार ने इनकार कर दिया, इसी डर से कि वो और लोकप्रिय न हो जाएँ। ज़बरन खिलाने में उनके फेफड़े तबाह हुए, और तिरसठवें दिन वो शहीद हो गए। पाँच लाख लोग उनकी शवयात्रा में उतरे। घबराई सरकार ने इसके बाद क्रांतिकारियों के शव परिवारों को सौंपना तक बंद कर दिया, इसी डर से कि ऐसी शवयात्राएँ न निकलें। जो सत्ता किसी को “सेफ्टी-वाल्व” की तरह सह रही होती, वह लाश से नहीं घबराती।

गांधी का आखिरी हमला

और यह मानना कि सिर्फ़ क्रांतिकारियों ने ख़ून दिया और गांधी के लोग सुरक्षित बचे रहे, यह इतिहास का सबसे बड़ा अपमान है। गांधीवादी रास्ता कोई सुरक्षित, आरामदेह रास्ता नहीं था। जब गांधी ने 1942 में “करो या मरो” के नारे के साथ अंग्रेज़ों पर आख़िरी हमला बोला, तो भारत छोड़ो आंदोलन में ब्रिटिश के अपने सरकारी आँकड़े के अनुसार 1,028 लोग पुलिस और सेना की गोलियों से मारे गए, 3,000 से ज़्यादा गंभीर रूप से घायल हुए। असल अनुमान इसे कहीं ऊँचा है। तब कांग्रेस का आकलन था कि क़रीब दस हज़ार लोग उस आंदोलन में शहीद हुए थे। एक लाख से ज़्यादा लोग जेल गए। महिलाओं को नहीं बख़्शा गया, गाँव जलाए गए, सार्वजनिक कोड़े बरसाए गए। यह “सेफ्टी-वाल्व” नहीं था। यह ख़ून था, कांग्रेस के हज़ारों साधारण कार्यकर्ताओं का ख़ून। जो कहते हैं कि कांग्रेस ने कभी लहू नहीं बहाया, वो या तो इतिहास नहीं जानते, या जानबूझकर झूठ फैला रहे हैं।

फ़र्क़ यह नहीं था कि कौन मरा और कौन बचा। फ़र्क़ यह था कि किसने सही अस्त्र सही जगह चलाया। क्रांतिकारियों ने अनशन तब किया जब वो जानते थे कि दया नहीं मिलेगी। उन्होंने सत्ता को थकाने और जान देने की तैयारी के साथ किया, बचाए जाने की आस में नहीं। गांधी ने सत्ता पर सामूहिक असहयोग से वार किया, और उस में भी हज़ारों ने जान दी।

यहीं इस अनशन की सबसे गहरी गुत्थी खुलती है। दूसरों से, साथियों, विरोधियों, सरकार से यह गुहार लगाना कि आकर अनशन ख़त्म करवाओ, बिल्कुल गांधीवादी नहीं है। यह पूरी तर्क-प्रणाली को उलट देता है। गांधीवादी रास्ता बलिदान माँगता है, चुपचाप दया की प्रतीक्षा नहीं; सामूहिक कार्रवाई माँगता है, एक अकेले शरीर की भूख नहीं; और निर्भयता माँगता है, दमन के सामने भी, और परिणाम के सामने भी।

इसीलिए गांधी या उनके साथियों द्वारा माफ़ी मांगने के कोई उदाहरण नहीं मिलते। गांधी के साथ आने की पहले शर्त ही त्याग थी, झूठ का त्याग, आराम का त्याग, जीवन की सुविधाओं का त्याग और जीवन का त्याग।

और एक आख़िरी शर्त, जो शायद सबसे अहम है, पारदर्शिता। गांधी का सत्याग्रह खुली किताब था। न उद्देश्य छिपा, न साधन, न अगला क़दम। वो पहले से ऐलान करते थे कि कौन-सा क़ानून तोड़ेंगे, और दिन के उजाले में तोड़ते थे। कोई छिपा एजेंडा नहीं, कोई पर्दे के पीछे का मक़सद नहीं। यह खुलापन ख़ुद एक ताक़त थी। इससे ब्रिटिश “सीक्रेट साज़िश” का आरोप कभी नहीं लगा सके, और आम आदमी के सामने उद्देश्य और उसे पाने की क़ीमत हमेशा साफ़ रही।

अन्ना आंदोलन का मक़सद

अन्ना आंदोलन यहीं ढह गया था। उसका असली मक़सद, उसके पीछे की ताक़तें, कभी पारदर्शी नहीं थीं। जब परतें खुलीं, तो अन्ना लोगों के ज़ेहन तक से विलुप्त हो गए और केजरीवाल एक रूटीन नेता बन कर रह गए।

CJP का आंदोलन आज उसी आंदोलन के धोखे का सलीब ढो रहा है। उसका उद्देश्य पारदर्शी नहीं। AAP के लोग फिर से छद्म नाम से सामने आने लगे। उसका समर्थन पारदर्शी नहीं है।
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“ग़ैर-राजनैतिक” और “निष्पक्ष” होने का दावा और कुछ नहीं RSS की भाषा है, जो लोकतांत्रिक राजनैतिक प्रक्रियाओं को डिसक्रेडिट करती है। जनता में राजनीति के प्रति वितृष्णा पैदा कर, उसे राजनीति से दूर करने की साजिश करती है। जब जनता ये मान लेती है कि राजनीति बुरी चीज़ है, तो वो लोकतंत्र से भी दूरी बना लेती है। यही RSS का दूरगामी एजेंडा है। CJP इसी को पुष्ट कर रही है, एक बार फिर।

वो राहुल गांधी से साथ की अपील भी कर रहे हैं तो इस अंदाज़ में कि ये राहुल की ड्यूटी है। साथ न देकर कर वो अपनी ड्यूटी पूरी नहीं कर रहे हैं। लेकिन राहुल जो NEET के सवाल पर आंदोलन खड़ा कर रहे हैं, कांग्रेस के छात्र और युवा संगठन जो सड़कों पर हैं, उसके समर्थन में ये एक शब्द नहीं कहेंगे।

इसीलिए पारदर्शिता की गांधीवादी कसौटी पर ये अनशन फेल हो जाता है। इसीलिए बहुत से लोग जो अन्ना आंदोलन के समर्थन के बाद ठगे गए महसूस कर रहे हैं, इस आंदोलन को संशय से देख रहे हैं। दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है। जब उद्देश्य धुंधला हो और साधन ढुलमुल, तो वह नैतिक स्पष्टता ही नहीं बचती जिसके सहारे जनता साथ देने का फ़ैसला करती है।

इसीलिए इस अनशन को गांधी का नाम देना, इसी गांधीवादी तरीकों की विफलता से जोड़ देना, ये एक चीटिंग है। गांधी का नाम लेना आसान है। यह समझना कि कौन-सा हथियार किसके लिए है, यही असली अनुशासन है। और यही अनुशासन इस अनशन से ग़ायब है। पारदर्शिता ग़ायब है, लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन जगाना ग़ायब है।
(गुरदीप सिंह सप्पल के फेसबुक पेज से साभार)