चर्चित हिंदी साप्ताहिक 'रविवार', 'आज तक' के संस्थापक संपादक और 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह (एसपी सिंह) का आज ही के दिन 27 जून को 29 वर्ष पहले निधन हुआ था। यदि वे आज हमारे बीच होते तो 78 वर्ष के होते।
ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आज की पत्रकारिता को देखकर वे क्या सोचते? क्या महसूस करते? और खुद को इस दौर में कहाँ पाते?
निश्चित रूप से इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं हो सकता। यह केवल अनुमान ही होगा। लेकिन उनके व्यक्तित्व, पत्रकारिता के मूल्यों और संपादकीय दृष्टिकोण को देखते हुए कुछ बातें कही जा सकती हैं।
नयी पीढ़ी एसपी सिंह को कितना जानता है?
दुर्भाग्यवश, पिछले तीन दशकों में पत्रकारिता में आई नई पीढ़ी के अनेक पत्रकार शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि एसपी सिंह यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह कौन थे। मीडिया संस्थानों से निकलकर आए इन पत्रकारों ने न तो उनके बारे में पढ़ा है और न ही सुना है। इसमें उनका कोई दोष भी नहीं है।
दोष उस पीढ़ी का है जो एसपी सिंह के साथ काम कर चुकी है और आज भी सक्रिय है, लेकिन उसने नई पीढ़ी को यह बताने का दायित्व नहीं निभाया कि एसपी सिंह कौन थे?
पत्रकारिता को लेकर उनकी दृष्टि क्या थी और उन्होंने खबर को सत्ता के सामने निर्भीकता से रखने की जो परंपरा स्थापित की, उसका अर्थ क्या था। हिंदी पत्रकारिता को जनसरोकार, विश्वसनीयता और बौद्धिक गंभीरता देने वाले एसपी सिंह आज धीरे-धीरे स्मृतियों से ओझल होते जा रहे हैं।एसपी सिंह उस पीढ़ी के पत्रकार थे, जिसके लिए पत्रकारिता का अर्थ सत्ता से सवाल पूछना, जनहित के मुद्दों को उठाना और खबर को मनोरंजन से अलग रखना था।
'रविवार' और बाद में 'आज तक' को उन्होंने जिस पहचान तक पहुँचाया, उसकी नींव निर्भीकता, विश्वसनीयता और सरल लेकिन प्रभावशाली भाषा पर टिकी थी।
आज के दौर में, जब मीडिया का बड़ा हिस्सा राजनीतिक ध्रुवीकरण, टीआरपी की प्रतिस्पर्धा, सनसनीखेज बहसों और सोशल मीडिया की तात्कालिकता से प्रभावित दिखाई देता है, संभव है कि एसपी सिंह कई प्रवृत्तियों को लेकर असहज होते। उन्हें यह देखकर चिंता होती कि अनेक बार खबर से अधिक महत्व शोर को, तथ्यों से अधिक महत्व प्रचार को और पत्रकारिता से अधिक महत्व पक्षधरता को मिल रहा है।
एसपी सिंह मूलतः आशावादी पत्रकार थे
लेकिन उन्हें केवल निराश व्यक्ति के रूप में देखना भी गलत होगा। एसपी सिंह मूलतः आशावादी पत्रकार थे। संभवतः उन्हें डिजिटल मीडिया के विस्तार, स्वतंत्र पत्रकारिता के नए प्रयोगों और उन युवा पत्रकारों में उम्मीद दिखाई देती, जो सीमित संसाधनों के बावजूद तथ्य आधारित और खोजी पत्रकारिता को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।शायद वे कहते कि तकनीक बदल गई है, माध्यम बदल गए हैं, खबर पहुँचाने के तरीके बदल गए हैं, लेकिन पत्रकारिता का मूल धर्म आज भी वही है—सत्ता से सवाल पूछना, जनता को सच बताना और उन लोगों की आवाज बनना, जिनकी आवाज अक्सर दबा दी जाती है।
पत्रकारिता लोकतंत्र के प्रति नैतिक ज़िम्मेदारी
यदि एसपी सिंह आज जीवित होते, तो संभवतः वे भीड़ में खोए हुए नहीं होते। अपनी विशिष्ट शैली, तीखे सवालों और स्वतंत्र सोच के साथ वे स्थापित धारणाओं को चुनौती देते हुए पत्रकारिता को उसके मूल उद्देश्य की याद दिला रहे होते। उनके लिए पत्रकारिता कभी केवल एक उद्योग नहीं थी; वह लोकतंत्र के प्रति एक नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी थी।
उनकी पुण्यतिथि पर शायद यही कहना सबसे उचित होगा कि आज पत्रकारिता को एसपी सिंह जैसे लोगों की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी उनके समय में थी। शायद कुछ अधिक।