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ख़बरों का चरित्र बिगाड़ता टीआरपी का खेल 

पिछले डेढ़ दशकों से चैनलों के ‘एक –दूसरे को बर्बाद करने की नयी होड़’ में जनता को पता चला कि चैनल अनैतिक रूप से लोगों को पैसे दे कर टीआरपी बढ़वाते हैं। अभी दो चैनलों और एक ही बड़े शहर पर शक है, पर अगर सत्ता और बड़े चैनलों ने इसे अपनी शक्ति से दबाया नहीं तो आने वाले दिनों में यह एक देश-व्यापी रैकेट के रूप में उजागर होगा।
एन.के. सिंह

टीवी चैनल या अख़बार के लिए विज्ञापन आर्थिक सांस की नली है। विज्ञापनदाता उस समाज तक पहुँचना चाहता है जो पैसा खर्च कर उसका सामान खरीदे, जबकि अच्छी पत्रकारिता के अस्तित्व की पहली शर्त है-जनोपदेय और समाज के कल्याण के आधार पर ख़बर देना।
ज़ाहिर है, एक ग़रीब देश में अच्छी पत्रकारिता के मायने वे खबरें जिनमें रोटी की समस्या, बेरोज़गारी, सरकारी उनींदापन और भ्रष्टाचार  पर चेतना विकसित हो, होनी चाहिए न कि महीनों तक कोरोना-संकट काल में भी सुशांत-रिया संबंधों को लेकर गला-फाड़ एंकर-उवाच। लेकिन पिछले 20 वर्षों में हुआ ठीक इसके उल्टा। 
टीवी की दुनिया में दो तरह की अनैतिकताएँ होती हैं- एक ख़बर में अर्ध-सत्य, झूठ, वितंडा और भांडपन दिखाकर और दूसरी टीआरपी को ‘पैसे दे कर बढ़ा कर’। पहले तरह की अनैतिकता पर समाज क्रुद्ध तो हो सकता है, पर क़ानूनी रूप से कुछ कर नहीं सकता। दूसरी अनैतिकता पर आपराधिक मामला सिद्ध करना लगभग नामुमकिन है।
लेकिन दोनों अनैतिकताओं में दर्शकरूपी जनता के पास एक हथियार है- वह झूठ और सच, सतही और गंभीर, लफ्फाजी और जनोपदेय ख़बरों में फर्क करना और पहले किस्म की खबर देने वाले  चैनलों को ख़ारिज करना सीखे।

बदल गई खबरें

मसलन सुशांत-रिया रोज़ाना कुछ मिनटों की ख़बर दो-चार दिन ले लिए तो हो सकता था, लेकिन कोरोना पर जनचेतना जगाना, सरकारी कमियों को बताना या कोरोना-योद्धाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शन ताकि अन्य भी आगे आयें, प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा, किसानों का संकट या बाढ़ और बेरोज़गारी का सुरसा-मुंह  हमेशा नए रूप में दिखाया जाना चाहिए था, ताकि सत्ता के परकोटे में बैठे लोगों के कानों तक आवाज़ जाये।
जनता को अपने हित में ऐसा न करने वाले चैनलों को ख़ारिज करना शुरू करना चाहिए था। लेकिन शायद रिया का नशा पेट पर जाने-अनजाने में भारी पड़ता गया और न्यूज़ का पूरा चरित्र ही बदल गया।

पत्रकारिता का चीर-हरण    

विज्ञापन न हो तो अख़बार या टीवी चैनलों का आर्थिक रूप से खड़ा रहना असम्भव होगा। उद्योग अपने उत्पाद को जनता तक पहुँचाने के लिए विज्ञापन देते हैं, यह पता करने के बाद कि उसके उत्पाद किस माध्यम या किस अख़बार-टीवी चैनल के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोग तक पहुँचेंगे। 

अख़बार की लोकप्रियता उसकी बिकने वाली प्रतियों का आकलन करके एक स्वतंत्र संस्था एबीसी द्वारा दी जाती है, जबकि टीवी की टीआरपी (टेली रेटिंग पॉइंट) बार्क (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल) नामक एक संस्था द्वारा। यह मुख्य रूप से चैनल मालिकों की संस्था इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फेडरेशन (आइबीएफ़) और विज्ञापनदाताओं, विज्ञापन एजेंसियों आदि की संस्थाओं द्वारा बनायी गयी है। साल 2014 के पहले रेटिंग एजेंसी - ‘टैम’ हुआ करती थी।  
परन्तु पिछले डेढ़ दशकों से चैनलों के ‘एक-दूसरे को बर्बाद करने की नयी होड़’ में जनता को पता चला कि चैनल अनैतिक रूप से लोगों को पैसे दे कर टीआरपी बढ़वाते हैं। 
अभी दो चैनलों और एक ही बड़े शहर पर शक है, पर अगर सत्ता और बड़े चैनलों ने इसे अपनी शक्ति से नहीं दबाया, तो आने वाले दिनों में यह एक देश-व्यापी रैकेट के रूप में उजागर होगा ।

पानी पर चलता आदमी

साल 2006-2010 के बीच की बात है, शाम के प्राइम-टाइम में कोई चैनल ‘पानी पर चलता आदमी’ और कोई चैनल ‘एलियन (दूसरे ग्रह की जीव) भारत में गाय उठा ले जाते हैं’ शीर्षक ख़बरें दिखा कर समाज में पत्रकारिता के सम्मान को रसातल पहुँचा रहे थे।
दरअसल न तो कोई पानी पर चल सकता है, न ही कोई किसी एलियन की भारतीय गायों में दिलचस्पी है (क्योंकि वे अगर हैं भी तो वर्तमान दौर में हमारे अति-उत्साही गौ-रक्षक उनसे निपट लेंगे)। केवल हमारे एडिटर नैतिक रूप से कमज़ोर हो कर फ़र्जी ख़बरें चल कर टीआरपी की होड़ में अपने को जिंदा रखने और अपनी मोटी पगार सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे थे।
दोनों खबरें ‘ऑप्टिकल इल्यूजन’ और दर्शकों को धोखे में रख कर ‘आई बाल्स’ आकर्षित करने याने व्यूअरशिप बढ़ाने का कुत्सित प्रयास था, जिसे तकनीकी शब्दों में टीआरपी कहते हैं। चैनल ने अगले 6 घंटों के लिए टीआरपी लूट ली। पानी पर चलने वाला खेल दरअसल एक ग्लास की मजबूत लेकिन पतली लेयर पर किया गया था।
ये चैनल जनता के लिए नहीं, टीआरपी लूट कर विज्ञापन से कमाई के लिए भांडों जैसा काम कर रहे थे। कुछ संपादकों को पत्रकारिता के बाज़ार में ‘टीआरपीबाज’ के रूप में जाना जाने लगा। इनकी मार्केट-वैल्यू बढ़ी और तनख्वाहें मुंहमाँगी मिलने लगीं।

टीआरपी

अब तसवीर का दूसरा पहलू देखें। तब भी और आज भी टीआरपी (टेली रेटिंग पॉइंट जो अब बार-ओ-मीटर के नाम से जाना जाता है) बताती है कि किस चैनल का व्यूअरशिप किस काल-खंड में किस प्रोग्राम में किन आयु-वर्गों और किन भौगोलिक क्षेत्रों में कितना रही। 

चूंकि विज्ञापनदाता और चैनल मालिकों का हित उस वर्ग में था, जिसके पास ग़ैर-ज़रूरी उपभोग के लिए पैसा हो, लिहाज़ा ख़बरिया चैनलों के शुरुआत से ही ये मीटर ग़रीब या ग्रामीण इलाक़ों या राज्यों में नहीं लगाये गए। मसलन सन 2010 तक देश के 120 करोड़ दर्शकों की अभिरुचि का आकलन मात्र 8,000 टैम मीटरों से किया जाता था, लेकिन इनमें से 6200 केवल 5 बड़े शहरों में लगे थे याने 5 करोड़ के लिए 6200 और 115 करोड़ के लिए 1800।
टीआरपी के खेल को एक और आँकड़े से समझें। अहमदाबाद की आबादी 35 लाख पर 165 मीटर, लेकिन ग़रीब बिहार की 11 करोड़ पर एक भी मीटर नहीं।

जनता की आवाज़ दब गई

चूंकि चैनल और उसके संपादक का परफॉर्मेंस (और भविष्य) टीआरपी से तय होता था, लिहाज़ा मुंबई में पानी बरसा तो बड़ी ख़बर होती थी, लेकिन बिहार की बाढ़ की विभीषिका या बुंदेलखंड की भुखमरी ख़बर नहीं बन पाती थी। दिल्ली के बलात्कार और चंपारण के बलात्कार में फर्क होने लगा। प्रेमचंद की झुनिया और गोबर दीपिका-रणवीर और अनुष्का-विराट शादी में दब गए। 

रिपोर्टर का हाँफ कर ऊँची आवाज में बताना कि ‘यही है वो बँगला जिसमें फलां हिरोइन और फलां हीरो अपनी सुहागरात मनायेंगे’ और उसके बाद एंकर का कहना कि उसका चैनल सबसे पहले आपको सुहागरात मनाने की जगह बता रहा है, पत्रकारिता का ‘न्यू नार्मल’ हो गया। सत्ता में बैठे लोगों को राहत मिली, क्योंकि ओबी-लाइवव्यू अब प्रवासी मजदूर की पत्नी का 100 किलोमीटर दूर हाईवे पर घिसटते हुए बच्चा जनना या उसके पति का ऐन वक़्त रास्ते में दम तोड़ना ख़बर नहीं रही। 

आज ज़रूरी है कि एडिटर का कार्यकाल तय हो और उसके लिए भी ख़बरों का मानक एक स्वतंत्र, ताक़तवर और सर्वमान्य संस्था द्वारा बनाया जाये। मीटर आबादी के हिसाब से लगें न कि विज्ञापन के नज़रिये से।                           

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एन.के. सिंह
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