Rahul Gandhi aggressive political strategy- राहुल गांधी ने कांग्रेस की विपक्षी राजनीति को आक्रामक रणनीति में बदल दिया है। छात्र आंदोलनों, युवाओं, Gen Z और महिलाओं के मुद्दों को उठाकर वह नई राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। क्या कांग्रेस इस रास्ते पर चलेगी?
जनहित के मुद्दों पर राहुल गांधी का राजनीतिक रुख आक्रामक होता जा रहा है
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की राजनीति में कुछ समय से एक स्पष्ट बदलाव दिखाई दे रहा है। यह बदलाव केवल भाषणों के तेवर में नहीं, बल्कि मुद्दे चुनने, आंदोलन के केंद्र में पहुंचने और सत्ता को सीधे चुनौती देने के तरीके में भी दिखाई देता है। 21 अगस्त को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में पैलेट गन से घायल युवक के साथ धरने पर बैठना इसी बदली हुई रणनीति का ताजा उदाहरण है। बात छोटी सी है लेकिन मोदी सरकार की ज़िद से वो बात बड़ी हो गई है। राहुल गांधी और पीड़ित युवक चाहता है कि उसे पैलेट गन के जो छर्रे लगे हैं, उसकी एफआईआर दर्ज की जाए। दिल्ली पुलिस ने साफ मना कर दिया कि एफआईआर नहीं होगी, क्योंकि ऊपर से आदेश है। मोदी सरकार के मंत्री जंतर मंतर पर इस तरह की घटनाओं से ही इंकार कर रहे हैं।
20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों और देश के कोने कोने से आये युवकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप लगा था। इस कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की बात सामने आई। राहुल गांधी ने इस मामले को सिर्फ एक छात्र आंदोलन की घटना के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे युवा अधिकार, पुलिस जवाबदेही और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार से जोड़ दिया। 21 अगस्त को वह घायल छात्र साहिल लोचव के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन पहुंचे और एफआईआर दर्ज करने की मांग की। पुलिस के साफ मना करने पर वो वहीं धरने पर बैठ गए।
राहुल गांधी का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी अब केवल संसद में सरकार को घेरने या बड़ी रैलियों में भाषण देने तक सीमित नहीं रहना चाहते। वह ऐसे मुद्दों को चुन रहे हैं जिनसे सीधे युवा, छात्र, नौकरी की तैयारी करने वाले लोग और महिलाएं जुड़ते हैं। पैलेट गन से घायल होने वाले सारे युवक हैं। दिल्ली पुलिस किसी भी पीड़ित का अपराध नहीं बता सकी कि आखिर उन निहत्थे लोगों पर पैलेट गन किसने और क्यों चलाई।
मोदी सरकार का संसद में इंकार, अदालत में इंकार, मीडिया में इंकार
जंतर-मंतर की घटना में पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से इनकार किया है और सुप्रीम कोर्ट में भी दिल्ली पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शन के दौरान अधिकतम संयम बरता गया तथा जरूरत के मुताबिक ही बल का इस्तेमाल हुआ। किरण रिजिजू ने यही बात संसद में कही और मीडिया में भी इसे दोहराया। 20 जुलाई की घटना के असंख्य वीडियो और फोटो को एक झटके में झुठला दिया गया। यही वजह है कि राहुल गांधी ने इस मामले को राजनीतिक रूप से छोड़ने के बजाय पीड़ित छात्र के साथ खड़े होने का फैसला किया। यही उनकी मौजूदा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिसने किसी छोटे या सीमित दायरे के विवाद को व्यापक राजनीतिक सवाल में बदल दिया है।
उनका संदेश यह है कि यदि किसी युवा प्रदर्शनकारी के खिलाफ पुलिस बल का इस्तेमाल हुआ और उसकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं होती, तो विपक्ष का नेता, कांग्रेस का स्थानीय नेता उसके साथ पुलिस स्टेशन तक जाएगा। यानी राहुल गांधी अब केवल यह नहीं कह रहे कि सरकार गलत है; वह यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस उस व्यक्ति के साथ खड़ी है जिसे व्यवस्था से शिकायत है। यही वह जगह है जहां उनकी राजनीति अधिक आक्रामक दिखाई देती है।
मोदी सरकार का बचकानापनः पैलेट गन फायरिंग से पीड़ित साहिल लोचव यही तो मांग कर रहे हैं कि इस मामले की एफआईआर दर्ज की जाए। लेकिन पुलिस इंकार कर रही है। इस घटनाक्रम को सिलसिलेवार समझिए। 14 अगस्त को साहिल लोचव अपने वकीलों के साथ दिल्ली पुलिस के संसद मार्ग थाने में गए और लिखित शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने उन्हें जांच अधिकारी का नंबर देने से इनकार कर दिया। 17 अगस्त को ईमेल और फोन के जरिए भी दोबारा संसद मार्ग पुलिस स्टेशन से संपर्क किया गया। फिर भी किसी जांच अधिकारी का नंबर नहीं दिया गया। शिकायत की पुष्टि भी नहीं की गई। 21 अगस्त को राहुल गांधी पीड़ित साहिल लोचव के साथ थाने पहुंच गए और मामले पर जोर दिया। पुलिस अधिकारी फिर से केस ऑफिसर और जांच अधिकारी का नंबर नहीं दे रहे हैं। चूंकि यह एक संज्ञेय अपराध है, इसलिए एफआईआर भी दर्ज होनी चाहिए, लेकिन दिल्ली पुलिस ऐसा नहीं कर रही है।
अमित शाह के खिलाफ सीधी राजनीतिक रेखा
जंतर-मंतर की घटना ने राहुल गांधी और गृह मंत्री अमित शाह के बीच टकराव को भी नया आधार दिया है। विपक्ष पहले ही इस मामले में जवाबदेही की मांग कर चुका है। अब राहुल गांधी स्वयं घायल छात्र को लेकर पुलिस स्टेशन पहुंच गए हैं। इसका राजनीतिक संदेश साफ है- यदि सरकार संसद और मीडिया में इस घटना को छोटा बताती है, तो विपक्ष उसे जमीन पर बड़ा मुद्दा बनाएगा।यही कारण है कि पैलेट गन का सवाल अब केवल पुलिस कार्रवाई की जांच का मुद्दा नहीं रह गया है। राहुल गांधी इसे युवाओं के अधिकार और सरकार की जवाबदेही के सवाल से जोड़ रहे हैं। हालांकि इस पूरे मामले में आरोपों और सरकारी दावों के बीच जांच की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। दिल्ली पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से इनकार किया है और जांच अभी राजनीतिक बहस का विषय बनी हुई है।
राहुल गांधी की रणनीति में आखिर बदलाव क्या है?
राहुल गांधी की मौजूदा राजनीति को अगर कुछ शब्दों में समझना हो तो वह है- सड़क, संसद और सोशल मीडिया को एक ही राजनीतिक अभियान में जोड़ना। पहले उनकी राजनीति का बड़ा हिस्सा बड़ी रैलियों, संसद में भाषणों और सरकार पर व्यापक राजनीतिक आरोपों के इर्द-गिर्द दिखाई देता था। अब वह किसी छात्र के साथ पुलिस स्टेशन में बैठ रहे हैं, किसी परीक्षा अभ्यर्थी की समस्या सुन रहे हैं, महिलाओं से सीधे संवाद कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर उसी बातचीत को छोटे-छोटे डिजिटल फॉर्मेट में आगे बढ़ा रहे हैं। यह रणनीति काम कर रही है। तमाम आंदोलनों में उनका जिक्र युवक खुद से कर रहे हैं।क्या कांग्रेस और बाकी विपक्ष राहुल की रणनीति को पसंद करेगा
कांग्रेस में बहुत सारे राहुल गांधी की रणनीति से सहमत नहीं हैं लेकिन वे खुलकर बयान देने से परहेज़ करते हैं। जैसे वंदेमातरम पर कांग्रेस में दो विचार दिखाई पड़ रहे हैं। एक समूह इसे पूरा गाने के पक्ष में है। दूसरा समूह इसे दो ही छंद गाने के पक्ष में है, क्योंकि कांग्रेस के बड़े नेताओं ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1937 में प्रस्ताव पास करके इसे स्वीकार किया था। राहुल गांधी ने पार्टी से आग्रह किया पुराने नेता ही अपनी जगह सही थे और उनके ही रास्ते पर चलना चाहिए। इसके बाद हाल ही में हुई कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) ने प्रस्ताव पास करके इसे साफ कर दिया। छात्रों के मुद्दे उठाकर राहुल ने पूरी पार्टी को संदेश दिया कि जहां सड़क पर उतरना ज़रूरी है, वहां ज़रूर उतरें। पिछले दिनों प्रयागराज में छात्रों की गूंज कार्यक्रम तमाम बाधाओं के बाद हुआ, कार्यक्रम स्थल पर सीवर का गंदा पानी छोड़ने के बावजूद युवक पहुंचे। कांग्रेस के बाद विपक्ष में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है। सपा अभी तक राहुल गांधी की नीतियों को आगे बढ़ा रही है, उसने किसी मुद्दे पर राहुल से अलग होकर बयान नहीं दिया है।
क्या यह रणनीति चुनावी राजनीति में सफल होगी?
इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है। किसी आंदोलन में युवाओं की मौजूदगी अपने आप में चुनावी वोट में तब्दील नहीं होती। ‘छात्रों की गूंज’ जैसे कार्यक्रमों को लगातार राजनीतिक संगठन, स्थानीय नेतृत्व और ठोस नीतिगत प्रस्तावों से जोड़ना होगा। इसी तरह महिलाओं के साथ संवाद भी तभी राजनीतिक लाभ में बदल सकता है जब कांग्रेस उनके सवालों पर लगातार काम और स्पष्ट नीतियां पेश करे। लेकिन एक बात स्पष्ट है- राहुल गांधी अब सिर्फ सरकार की गलतियां गिनाने वाली विपक्षी राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते। वह युवाओं की बेचैनी, छात्रों की नाराजगी, महिलाओं की असुरक्षा और पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।21 अगस्त का पुलिस स्टेशन धरना इस रणनीति का सबसे आक्रामक दृश्य है। एक तरफ सत्ता का तंत्र है, दूसरी तरफ घायल छात्र के साथ बैठे नेता प्रतिपक्ष। बीजेपी बेशक राहुल गांधी को अराजक बताने में जुटी है लेकिन देश का बड़ा युवा वर्ग इस सारे घटनाक्रम को देख रहा है। राहुल गांधी शायद यही राजनीतिक तस्वीर बनाना चाहते हैं- संसद में विपक्ष की आवाज और सड़क पर आंदोलनकारी युवाओं की आवाज, दोनों एक ही राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा हैं।
यही वजह है कि उनकी मौजूदा राजनीति को केवल ‘आक्रामक’ कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह मुद्दों, जनसमूहों और राजनीतिक मंचों को नए तरीके से जोड़ने की कोशिश भी है। आने वाले महीनों में इसकी असली परीक्षा यही होगी कि क्या यह रणनीति युवाओं की नाराजगी को कांग्रेस के पक्ष में स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदल पाती है।