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पंजाब में चुनाव लड़ने के चढ़ूनी के सुझाव को किसान संगठनों ने किया खारिज़

पंजाब विधानसभा के चुनाव में क्या किसान संगठन भी उतर सकते हैं, इन दिनों किसानों के बीच यह मुद्दा गर्म है। पंजाब के चुनाव में उतरने की बात किसान आंदोलन में शामिल कई लोगों की ओर से छिटपुट रूप से आती रही है। उनका कहना है कि जब कोई हुक़ूमत उनकी आवाज़ नहीं सुन रही है तो उन्हें अपना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव के मैदान में उतरना चाहिए। 

इस आवाज़ को ताक़त दी है हरियाणा के किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने। चढ़ूनी ने हाल ही में कहा कि किसानों को ‘मिशन पंजाब’ के लिए जुटना चाहिए। लेकिन किसान संगठनों ने उनके इस सुझाव को व्यक्तिगत बताते हुए खारिज़ कर दिया है। 

पंजाब में सात महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं और किसान आंदोलन का इस बार वहां के चुनाव में ख़ासा असर रहेगा। 

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चढ़ूनी ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि आंदोलन में अब तक कई किसान शहीद हो चुके हैं और किसानों ने बहुत दर्द सहा है लेकिन हमारी बात किसी ने नहीं सुनी। उन्होंने कहा कि किसान अब ‘मिशन उत्तर प्रदेश’ में जुटने जा रहे हैं और इसके तहत 5 सितंबर को एक रैली रखी गई है। चढ़ूनी ने कहा कि हमें ‘मिशन उत्तर प्रदेश’ के बजाय ‘मिशन पंजाब’ की योजना बनानी चाहिए। 

किसान नेता चढ़ूनी ने कहा कि किसान आंदोलन में सक्रिय संगठन अगर पंजाब के विधानसभा चुनाव में उतर जाएं और वहां सरकार बना लें और वहां हालात बदलकर दिखा दें तो वह मॉडल पूरे देश में जा सकता है। 

Farmers organisation in Punjab polls 2022  - Satya Hindi

राजनीतिक एजेंडा नहीं 

लेकिन पंजाब के किसान नेताओं ने चढ़ूनी के इस सुझाव से किनारा कर लिया है। उन्होंने कहा है कि किसानों का मिशन केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए कृषि क़ानूनों को रद्द करना है और उनकी कोई राजनीतिक ख़्वाहिश नहीं है और न ही कोई राजनीतिक एजेंडा है। 

पंजाब के सीनियर किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने अंग्रेजी अख़बार टीओआई से कहा है कि लोग राजनेताओं के खोखले वादों से तंग आ चुके हैं और जिस तरह के हालात हैं, उसमें उन्होंने नेताओं पर भरोसा करना छोड़ दिया है लेकिन इसके बाद भी किसानों का चुनावी राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं है। 

बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि उन्होंने और किसी भी किसान संगठन ने इस मुद्दे पर बात नहीं की है और उनका फ़ोकस किसान आंदोलन को सफल बनाने पर है।

सात महीने से चल रहा आंदोलन

संयुक्त किसान मोर्चा के नेता दर्शन पाल का भी यही कहना है कि किसान संगठनों ने किसी भी बैठक में राजनीतिक एजेंडे पर कोई बात नहीं की है और उनकी ऐसी कोई ख़्वाहिश भी नहीं है। दर्शन पाल ने कहा कि पंजाब के किसी भी किसान संगठन ने पिछले सात महीने में इस बारे में एक भी शब्द नहीं कहा है। बता दें कि दिल्ली के बॉर्डर्स पर चल रहे किसान आंदोलन को 7 महीने का वक़्त पूरा हो चुका है। 

कृषि क़ानूनों को रद्द करवाना मक़सद

किसान संगठन (एकता उगराहां) भी चुनावी राजनीति में उतरने के हक़ में नहीं है। बड़े किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां ने पंजाब में चुनाव लड़ने के चढ़ूनी के सुझाव को खारिज़ किया है और कहा है कि उनका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है और न ही उन्होंने इसके बारे में कभी सोचा है। उगराहां ने कहा है कि उनका एक ही मिशन है कि उन्हें कृषि क़ानूनों को रद्द करवाना है। 

संसद के नज़दीक देंगे धरना 

केंद्र सरकार के कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे किसान अब अपने आंदोलन को रफ़्तार देने जा रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि 22 जुलाई से किसान संसद के नज़दीक धरना देना शुरू करेंगे। सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती है क्योंकि 19 जुलाई से संसद का सत्र शुरू हो रहा है।  

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‘मिशन यूपी-उत्तराखंड’!

किसानों की नज़र अब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनावों पर है। किसान ‘मिशन यूपी-उत्तराखंड’ में जुटने जा रहे हैं। इस मिशन के तहत किसान इन दोनों राज्यों में बीजेपी को हराने की अपील करेंगे। दोनों ही राज्यों में सात महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं और दोनों ही जगह बीजेपी की सरकार है। 

बता दें कि हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान भी किसानों ने इन चुनावी राज्यों का दौरा किया था और बीजेपी को वोट न देने की अपील की थी। किसान मोर्चा के नेता दर्शन पाल ने कहा है कि जिस तरह किसानों ने पंजाब और हरियाणा में बीजेपी के नेताओं का विरोध किया है ठीक उसी तरह हम उत्तर प्रदेश में भी करेंगे। 

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