केंद्र के ट्रांसजेंडर बिल की संवैधानिक वैधता पर बहस तेज़। हाई कोर्ट ने जेंडर अधिकारों को लेकर अहम टिप्पणी की है। जानिए क्या हैं कानूनी पहलू और इसके सामाजिक असर।
ट्रांसजेंडर अधिकार। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
केंद्र सरकार ने हाल ही में जिस ट्रांसजेंडर बिल को पास किया है क्या वह संविधान के ख़िलाफ़ है? कम से कम राजस्थान हाई कोर्ट ने तो ऐसा ही संकेत दिया है। इसने कहा कि केंद्र सरकार का नया ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) अमेंडमेंट बिल 2026 संविधान की मूल भावना से अलग है। यह पहला मौक़ा है जब कोई हाईकोर्ट इस नए बिल पर अपनी राय दे रहा है।
यह बिल 13 मार्च 2026 को संसद में पेश हुआ था। लोकसभा ने 24 मार्च और राज्यसभा ने 25 मार्च को इसे पास कर दिया। अब इसको राष्ट्रपति ने मंजूरी भी दे दी है। बिल में ट्रांसजेंडर लोगों की जेंडर पहचान को चुनने की छूट नहीं होगी। पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर व्यक्ति खुद अपनी जेंडर पहचान चुन सकता है। लेकिन नया बिल कहता है कि जेंडर पहचान अब सरकारी सर्टिफिकेट, जांच या एडमिनिस्ट्रेटिव मंजूरी पर ही मिलेगी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट के जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित और जस्टिस अरुण मोंगा की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। जस्टिस मोंगा ने फ़ैसले के बाद लिखे गए एपिलॉग यानी अतिरिक्त टिप्पणी में साफ़ कहा, 'जो चीज सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की अनिवार्य पहचान मानी थी, उसे अब सरकारी मंजूरी पर निर्भर कर दिया जा रहा है। सेल्फहुड (यानी खुद की पहचान) कोई एहसान नहीं है, यह अधिकार है।'
कोर्ट ने चेतावनी दी कि यह बिल ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकार को सरकारी एंटाइटलमेंट यानी सरकार की दया पर निर्भर बना रहा है। कोर्ट ने राजस्थान सरकार को चेतावनी दी कि नया कानून आने के बाद भी जेंडर की सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन यानी खुद की पहचान को जितना हो सके बचाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि कोई भी कानून या नीति सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक विवेक पर भी खरा उतरना चाहिए।
ट्रांसजेंडर समुदाय क्यों नाराज़?
समुदाय खुद इस बिल के ख़िलाफ़ है। नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स के कई सदस्य इस्तीफ़ा दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें बिल के बारे में पहले बताया ही नहीं गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक एडवाइजरी पैनल ने भी केंद्र सरकार से बिल वापस लेने की मांग की है। पैनल का कहना है कि बिना ट्रांसजेंडर लोगों से बात किए यह बिल लाया गया और सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन का अधिकार छीन लिया गया।
हाई कोर्ट में मामला क्या था?
हाई कोर्ट का यह फैसला गंगा कुमारी नाम की ट्रांसजेंडर महिला की याचिका पर आया। गंगा कुमारी ने 2014 के सुप्रीम कोर्ट के एनएएलएसए फैसले के अधिकारों को लागू करने की मांग की थी। राजस्थान सरकार ने 12 जनवरी 2023 को एक नोटिफिकेशन जारी किया था। इसमें ट्रांसजेंडर लोगों को ओबीसी लिस्ट में नंबर 92 पर रख दिया गया। लेकिन अलग से हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन नहीं दिया गया। गंगा कुमारी ने कहा कि सिर्फ ओबीसी में नाम डालना खोखला भ्रम है। एससी/एसटी परिवार के ट्रांसजेंडर व्यक्ति को जन्म का कोटा या ट्रांसजेंडर कोटा में से एक चुनना पड़ता है। इससे जेंडर आइडेंटिटी का कोई फायदा नहीं मिलता। इस पर कोर्ट ने पूरी तरह सहमति जताई। बेंच ने कहा कि यह नोटिफिकेशन 'मात्र दिखावा और आंखों में धूल झोंकने वाला' है। इसमें असली रिजर्वेशन नहीं दिया गया, सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के शब्द दोहराए गए।
कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि राजस्थान में ट्रांसजेंडर आबादी बहुत कम है- सिर्फ 0.024 प्रतिशत। बिना अलग हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन के सीटें इतनी देर से खाली होंगी कि रिजर्वेशन सिर्फ 'सांकेतिक' रहेगा, असल फायदा नहीं होगा।
कोर्ट ने तुरंत राहत दी
कोर्ट ने गंगा कुमारी को तुरंत राहत दी। जब तक राजस्थान सरकार कोई स्थायी नीति नहीं बनाती, तब तक ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को सरकारी नौकरी और शिक्षा संस्थानों में अधिकतम अंकों में 3 प्रतिशत अतिरिक्त वेटेज मिलेगा। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि सोशल वेलफेयर विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई जाए। यह कमिटी ट्रांसजेंडर लोगों की गहरी मार्जिनलाइजेशन की जांच करे और सच्ची समानता के लिए ठोस सुझाव दे।
हिंदू धर्म और ट्रांसजेंडर
कोर्ट ने भारतीय सभ्यता की जड़ों की भी बात की। कोर्ट ने कहा कि हमारी सभ्यता बेहद धार्मिक है। हिंदू शास्त्र और पौराणिक कथाएं ट्रांसजेंडर लोगों को बहुत महत्व देती हैं। कोर्ट ने इसके लिए कई मिसालें दीं- मोहिनी– भगवान विष्णु का स्त्री अवतार, इला/सुद्युम्न– राजा जो लिंग बदलते थे, अर्जुन– वनवास में ब्रिहन्नला (नपुंसक नर्तकी) के रूप में, अर्धनारीश्वर– शिव और पार्वती का आधा पुरुष-आधा स्त्री रूप।कोर्ट ने कहा कि ये शास्त्र सिर्फ जेंडर विविधता को मानते ही नहीं, बल्कि उसे अपनाते और पूजते हैं। ये लिंग की सीमाओं से ऊपर उठकर पहचान सिखाते हैं। कोर्ट ने सवाल किया– 'जिस समाज की आध्यात्मिक कल्पना में जेंडर विविधता का इतना सम्मान है, वह वास्तविक जीवन में उन्हीं लोगों को कैसे बाहर रख सकता है?'
राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ट्रांसजेंडर बिल 2026 संविधान की भावना से हट रहा है। कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कि सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन एक अधिकार है, एहसान नहीं। साथ ही ट्रांसजेंडर लोगों को असली आरक्षण और समानता देने के लिए ठोस कदम उठाने को कहा।