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राजस्थान: डॉक्टर क्यों कर रहे हैं राइट टू हेल्थ का विरोध

राजस्थान में हजारों डॉक्टर हड़ताल पर हैं, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बार-बार अपील कर रहे हैं कि डॉक्टर काम पर लौटें। मुख्यमंत्री की अपील के बाद बुधवार को निजी प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टरों के साथ राज्य के 19 हजार डॉक्टर भी हड़ताल में शामिल हो गये हैं। इसकी वजह से राज्य की स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग ठप पड़ी हुई हैं। हालाँकि इमरजेंसी सेवाओं में काम जारी है लेकिन ओपीडी पूरी तरह से बंद है। सरकार की तरफ से हड़ताल पर जाने वाले डॉक्टरों को चेतावनी भी दी गई थी लेकिन उसका बहुत असर नहीं हुआ।
डॉक्टरों की हड़ताल का कारण राज्य सरकार का ‘राइट टू हेल्थ’ बिल है। राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने बीते 21 मार्च को राइट टू हेल्थ प्रस्तावित किया है। इस बिल में प्रावधान किया गया है कि सरकार सभी नागरिकों को मुफ्त इलाज मुहैया कराएगी, इसके लिए उन्हें एक भी पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है। इस बिल में प्रावधान है कि कोई भी मरीज अगर इमरजेंसी में निजी अस्पताल में भी भर्ती होता है तो वह वहां भी अपना इलाज करा सकता है, और निजी अस्पताल पैसे के अभाव में उन मरीजों का इलाज करने से मना नहीं कर सकते हैं। अस्पताल का जो भी खर्च होगा वह सरकार वहन करेगी।
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राइट टू हेल्थ कानून लागू हो जाने के बाद अस्पतालों को बिना पैसे लिए ही इलाज शुरू करना पड़ेगा, पैसे बाद में मांगे जाएंगे, अभी के नियमों के मुताबिक अस्पताल इलाज से पहले ही पैसों की मांग करते हैं। यह नियम राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों, निजी अस्पतालों, और हेल्थ केयर सेंटरों पर भी लागू है। इसके बाद भी अगर कोई अस्पताल इलाज करने से मना करता है तो उस पर पहली बार में 10 हजार और दूसरी बार में 25 हजार के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
निजी अस्पताल और डॉक्टर इस बिल का विरोध कर रहे हैं, बुधवार को उन्हें राज्य के सरकारी डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं के कर्मचारियों का भी साथ मिल गया। विरोध कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि इस विधेयक में आपात स्थिति में निजी अस्पतालों को निशुल्क इलाज करने के लिए बाध्य किया गया है। लेकिन आपात स्थिति की परिभाषा और इसके दायरे को विधेयक में तय नहीं किया गया है। डॉक्टरों का कहना है कि ‘अगर हर मरीज अपनी बीमारी को आपात स्थिति में बताकर निशुल्क इलाज करवाएगा तो अस्पताल अपना खर्च कैसे चलाएंगे’। इसके अलावा मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए अन्य अस्पताल में उसे रेफर करने की व्यवस्था भी अस्पताल को ही करनी होगी।
डॉक्टरों का यह भी कहना है कि मरीजों के इलाज का भुगतान कौन करेगा और सरकार इलाज का खर्च वहन करेगी तो इसके लिए क्या प्रावधान हैं, यह भी बिल में स्पष्ट नहीं किया गया है, जो कि सबसे जरूरी चीज है।
बिल के विरोध में डॉक्टरों की यह हड़ताल 21 मार्च से चल रही है और सरकार तब से डॉक्टरों से बात करके मसले को हल करने का प्रयास कर रही है। लेकिन डॉक्टर केवल एक ही शर्त पर बात करने को तैयार हैं और शर्त है ‘बिल की वापसी’। सरकार की तरफ से इस मसले पर स्थिति साफ करते हुए कहा गया है कि बिल वापस नहीं लिया जाएगा।
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राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री प्रसादीलाल मीणा ने कहा है कि सरकार प्रदेशवासियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ देने के लिए प्रतिबद्ध है, और राइट टू हेल्थ अधिकार विधेयक उसी दिशा में उठाया गया कदम है। विधेयक के प्रस्ताव के अनुसार राज्य और जिला स्तर पर निजी अस्पतालों के महंगे इलाज और मरीजों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्राधिकरण का गठन प्रस्तावित किया गया है, जो इसकी निगरानी करेगा। किसी भी आपात स्थिति में इलाज का खर्च संबंधित मरीज द्वारा वहन नहीं किए जाने पर राज्य सरकार उसका भुगतान करेगी।
सरकार के आश्वासन के बाद भी डॉक्टर हड़ताल पर अड़े हुए हैं, और बिल वापसी की मांग कर रहे हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) राजस्थान के डॉक्टरों के समर्थन में है। उसने इस बिल के विरोध में एक देशव्यापी बंद का आह्वान किया था।
नागरिकों को ध्यान में रखते हुए बिल में प्रावधान किया गया है कि इमरजेंसी की हालात में किसी भी अस्पताल में पहुंचे मरीज के इलाज के लिए पैसे के अभाव में कोई भी अस्पताल इलाज से मना नहीं कर सकता।
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क़मर वहीद नक़वी
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