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सुशांत की मौत: डिप्रेशन का दंश मैंने भी झेला है!

कोरोना वायरस के कारण मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी देश में तेजी से उभरकर आया है! लॉकडाउन ने लोगों की आदतें तो ज़रूर बदल दी हैं लेकिन एक बड़ा तबक़ा तनाव के बीच जिंदगी जी रहा है। यह तनाव बीमारी और भविष्य की चिंता को लेकर है। 

कोरोना से बचने के लिए लोग घरों में तो हैं लेकिन कहीं ना कहीं उन्हें इस बीमारी की चिंता लगी रहती है और वह दिमाग के किसी कोने में मौजूद रहती है जिसकी वजह से इंसान की सोच पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। लॉकडाउन ही नहीं उसके बाद की भी चिंता से लोग ग्रसित हैं क्योंकि कई लोगों के सामने रोजगार, नौकरी और वित्तीय संकट की समस्या पैदा हो चुकी है। 

फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का जाना ज्यादा तगड़ा झटका इसलिए भी लग रहा है क्योंकि वह हमारी ही उम्र के थे। लेकिन हमारी उम्र के होने के बावजूद कामयाबी के शीर्ष पर थे।

जहाँ हमारी जिंदगी में करियर और जीवन का संघर्ष लगातार जारी है, शायद, सुशांत के जीवन का संघर्ष अलग तरह का रहा होगा। लेकिन, इस दौर में जबकि दुनिया एक भयंकर महामारी की चपेट में है। देश के हालात भी बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते। उस पर भी कुछ स्थानों के हालात बद से बदतर होते नजर आ रहे हैं। 

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भविष्य अथाह आर्थिक अनिश्चितता की ओर जाता दिखाई पड़ रहा है। किसी को भी जीवन में स्थिरता नज़र नहीं आ रही है। ख़बरें सकारात्मकता से कोसों दूर हैं। घरों में कैद होकर डिप्रेशन कई गुना बढ़ रहा है। ऐसे में स्वयं को सामान्य बनाये रख पाना निश्चित ही किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

मैं स्वयं भी जीवन के बड़े उतार-चढ़ावों से जूझ रही हूँ और जानती हूँ कि मेरे जैसे अधिकांश युवाओं की कमोबेश ऐसी ही हालत है। मैं भी डिप्रेशन का दंश झेल चुकी हूँ। ऐसी स्थिति में इंसान को अपने जीने-खाने तक की ख़बर नहीं होती। लेकिन, अपनी ही कोशिशों के दम पर उससे बाहर भी आई हूँ, बिना दवाइयों के क्योंकि जिन्हें कारण और निवारण मालूम है उनके लिए थोड़ा आसान होता है, इससे बाहर निकलना। 

लेकिन अधिकांश लोग इसके लक्षण और कारण, समझ ही नहीं पाते और तब इलाज में भी देरी हो जाती है। फिर समाज का रवैया भी ऐसा होता है कि आपको बीमार नहीं, बल्कि पागल घोषित कर दिया जाएगा। तब ज़रूरी हो जाता है कि स्वयं को किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से दूर रखा जाए और परिजनों से भी अपील है कि अपनों का ख़याल रखें।

अकेलापन अपने आप में एक बड़ी त्रासदी है। इसलिए खुद को उस अकेलेपन से बचाने का प्रयास करें। जीवन में जो भी है जितना भी है उतने में ही संतुष्ट रहना सीखना होगा। अपनी खुशी अपने भीतर ही तलाशनी होगी। किसी के साथ या फिर किसी के बगैर भी।

आत्महत्या जैसी घटना को अंजाम देने के लिए कुछ पल ही काफी होते हैं किसी भी व्यक्ति के लिए, इसलिए हम सबको ऐसे पलों के साथ डील करना सीखना होगा। आपके किसी मित्र, किसी परिजन, किसी जानने वाले की कॉल आये तो नज़रअंदाज मत कीजिये। सम्भव है यह उस व्यक्ति के जीवन के वही कठिन पल हों और आपसे बात कर लेने से उसकी जिंदगी बच सके।

दरअसल, लॉकडाउन लगने और उसके बढ़ने से दो तरह के मुद्दे सामने आ रहे हैं। पहला, लोग लगातार घर पर रह रहे हैं और ऐसे में अंतर्वैयक्तिक संबंध जैसे कि घरेलू हिंसा और बच्चों को संभालने को लेकर विवाद बढ़ा है क्योंकि सभी लोग अपने दैनिक रूटीन से कट चुके हैं। दूसरा, लोग लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। जैसे कि अपनी आर्थिक स्थिति और आजीविका। कई अन्य बीमारियों की तरह इस बार भी सबसे निचले स्तर के लोग इससे प्रभावित हैं। 

मौजूदा हालात और भविष्य की चिंता ना केवल ग़रीबों को सता रही है बल्कि उन्हें भी परेशान कर रही है जो समृद्ध परिवार से आते हैं। दूसरे शहरों में काम करने वाले प्रवासी अपने शहर और गांव जाने को लेकर चिंतित हैं। उन्हें आने वाले दिनों में रोजगार नहीं मिलने का भी डर है। 

जो लोग अपने गांव पहुंच भी रहे हैं उन्हें भी गांव में अपनापन नहीं मिल रहा है। गांव वाले उन्हें शक की नज़र से देख रहे हैं। गांवों में लोगों पर शक किया जा रहा है कि कहीं वे कोरोना से संक्रमित तो नहीं हैं। 

कोरोना के साथ आया दिमागी खौफ भारत जैसे बड़े देश में कमोबेश सबकी स्थिति एक समान बना रहा है। भले ही अधिकांश लोग मानसिक तौर पर पीड़ित नहीं हों लेकिन एक बड़ा तबक़ा है जिसे भविष्य की चिंता है। वे अपने बच्चों के भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।

हालांकि तनाव तो सभी को है। किसी को लॉकडाउन के ख़त्म होने का तनाव है तो किसी को वित्तीय स्थिति ठीक करने का तनाव। घर पर नहीं रहने की आदत वालों को जल्द आज़ाद घूमने का तनाव है। इसे सामूहिक तनाव भी कह सकते हैं। 

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मनोचिकित्सकों का कहना है कि लोगों को लॉकडाउन जैसे हालात से निपटने के लिए समय का सही इस्तेमाल करना चाहिए। उनके मुताबिक़, जिन विषयों में रूचि है उन पर किताबें पढ़नी चाहिए, घर में पेड़ और पौधों से भी सकारात्मकता का एहसास हो सकता है। 

साथ ही सोशल मीडिया और वॉट्सऐप पर आने वाली नकारात्मक चीजों को नजरअंदाज कर सकारात्मक चीजों को ही अपनाना चाहिए। मनोचिकित्सकों का कहना है कि लोग शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को स्वस्थ रखें ताकि समय आने पर वे चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहें। 

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प्रियंका सौरभ
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