सबको मालूम है कि नई पीढ़ी हठी होती है। जिस काम के लिए मना करो, वही करेगी। हम भी कभी जवान थे। हमसे भी कहा गया था कि चुपचाप नौकरी करो, शादी करो, बच्चे पैदा करो और दुनिया को उसकी हालत पर छोड़ दो। मगर हम नादान थे। हमें लगा था कि देश बदलना ज़रूरी काम है। अब बुढ़ापे में समझ आया कि देश बदलने से बेहतर काम देश के साथ बदल जाना है।
अगर उस समय थोड़ा दिमाग लगाया होता और सरकारी जेन जी बन गए होते तो आज किसी आयोग, निगम, प्राधिकरण या विश्वविद्यालय की कुर्सी पर पसरे होते। कुछ पगार से कमाते, कुछ उपहार से। कुछ नियमों से मिलता, कुछ नियमों को तोड़ने से। कमीशन इतना मिलता कि पोते-पोतियाँ भी ईमानदारी को एक पुरानी बीमारी समझते। ये जान लीजिए कि जीवन का पहला सूत्र है—सिद्धांत जेब में नहीं रखे जाते, सिद्धांतों से जेब खाली होती है।
मगर हमारी मति मारी गई थी। धरने-प्रदर्शन करते रहे, लाठी खाते रहे, ज्ञापन देते रहे। नतीजा ये हुआ कि आज ठनठन गोपाल हैं। बच्चे हमें उसी तरह देखते हैं जैसे कोई समझदार आदमी पुराने ग्रामोफोन को देखता है—सम्मान के साथ, मगर बेकार समझकर।
इसलिए जेन जी, मेरी बात ध्यान से सुनो और समझ से काम लो। ये जो जवानी का जोश है न ज़्यादा दिन नहीं रहने वाला। जब घर-गृहस्थी के चक्कर में पड़ोगे तो आटा-दाल का भाव याद आ जाएगा। अगर जेब में रुपल्ली न हुई तो कोई ढेले को न पूछेगा। तुम्हें लगता है कि बुड्ढा बकवास कर रहा है तो मैं तुमको मिसालें देकर बताता हूँ कि जो कुछ बोल रहा हूँ अपने और दूसरों के तज़ुर्बे से बोल रहा हूँ।
मेरा एक परिचित लड़का था। बड़ा होनहार। किताबें पढ़ता था, संविधान की बातें करता था, हर अन्याय पर उबल पड़ता था। एक दिन कॉलेज प्रशासन के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल हो गया। नतीजा यह हुआ कि जिन लोगों ने कॉलेज को बर्बाद किया वे तो प्रमोशन पाकर ऊपर चले गए और लड़का कॉलेज से बाहर कर दिया गया। आज भी जब कभी मिलता है तो उसकी डिग्री और निष्कासन आदेश दोनों एक ही फ़ाइल में रखे मिलते हैं।
एक दूसरा युवक था। उसे लगा कि नागरिक होने का फ़र्ज़ निभाना चाहिए। वह भी एक प्रदर्शन में चला गया। पुलिस ने ऐसा लोकतांत्रिक प्रेम बरसाया कि उसकी कई हड्डियाँ टूट गईं। आज भी चलता है तो लगता है जैसे देश का संविधान पैदल यात्रा पर निकल पड़ा हो—घायल, मगर किसी तरह आगे बढ़ता हुआ।
एक तीसरा लड़का था। पढ़ने में इतना तेज़ कि गाँव वाले उसे प्रोफेसर साहब कहकर बुलाते थे। पीएचडी की। शोध किया। लेख लिखे। मगर ग़लती से सत्ता से सवाल पूछ बैठा। उसका चरित्र प्रमाणपत्र, गोपनीय रिपोर्ट, सिफ़ारिश—सब कुछ ऐसा बिगाड़ा गया कि नौकरी का दरवाज़ा कभी खुला ही नहीं। आजकल पान की दुकान चलाता है। पान लगाते समय कभी-कभी फ़ूको, ग्राम्शी और आंबेडकर को याद कर लेता है।
इस देश में कई लोग इसलिए असफल नहीं होते कि वे अयोग्य होते हैं; वे इसलिए असफल होते हैं कि उन्होंने ग़लत समय पर सही सवाल पूछ लिया होता है।
और दूसरी तरफ़ उन लड़कों को देखो जिनकी सबसे बड़ी योग्यता यह है कि वे हर पाँच मिनट में एक नया नारा लगा सकते हैं। वे तरक्की की सीढ़ियाँ ऐसे चढ़ते हैं जैसे बंदर अमरूद के पेड़ पर चढ़ता है—तेज़ी से और बिना किसी इंट्रेस एग्जाम पास किए। इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि आदर्शों से सावधान रहो। आदर्श आदमी को सम्मान तो दिला सकते हैं, सुविधा नहीं।
व्यवस्था में दो तरह के लोग होते हैं—एक वे जो सवाल पूछते हैं और दूसरे वे जो सवाल पूछने वालों का पता बताते हैं। दूसरे वर्ग का भविष्य हमेशा उज्ज्वल रहता है। ध्यान रखो ये जो जवानी का जोश है न, ये भी बिजली विभाग की सप्लाई की तरह है। कभी भी जा सकता है। अभी तुम्हें क्रांति अच्छी लगती है। दस साल बाद ईएमआई अच्छी लगेगी। अभी तुम्हें संविधान याद है। बाद में बच्चों की स्कूल फीस याद रहेगी।
आदमी विचारों से नहीं, मकान, गाड़ी की किस्तों से परिपक्व होता है।
देखो, सच बात तो यह है कि अब सरकारी नौकरी क्या, कोई भी नौकरी दुर्लभ प्रजाति का पक्षी हो गई है। सरकार ने आत्मनिर्भरता का ऐसा इंतज़ाम किया है कि लाखों युवक घर बैठकर मोबाइल पर रील्स देख रहे हैं। अगर कोई नौकरी मिल भी गई तो गिग वर्कर, ओला ऊबर के ड्राइवर की। या फिर किसी सोसायटी के गेट पर खड़े होकर उन बेबी-बाबा को सलाम करोगे जिनके बापों को तुमसे कम नंबर आए थे।
इसलिए मैं कहता हूँ कि विपक्षी जेन जी बनने का जोखिम मत लो। सरकारी जेन जी बन जाओ। सरकारी जेन जी इस समय भारत का सबसे उभरता हुआ करियर है।
ज़रा चारों तरफ़ देखो। काँवड़ियों को देखो। महीने भर का आध्यात्मिक टूर पैकेज चल रहा है। रास्ते भर खाने-पीने और दम लगाने का इंतज़ाम। हैलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा। पुलिस अधिकारी पाँव दबाएंगे। समाज में प्रतिष्ठा बढ़ेगी, धर्मात्मा कहलाओगे। हमारे ज़माने में आंदोलनकारी सड़क पर बैठता था तो पुलिस डंडा मारती थी। आज जब ये लोग सड़क पर नाचते हैं तो पुलिस रास्ता साफ़ करती है। लोकतंत्र में सबसे सफल नागरिक वह है जिसे सरकार नागरिक नहीं, रिश्तेदार समझने लगे।
इसलिए जंतर-मंतर पर पैलेट गन के छर्रे खाने से अच्छा है काँवड़ यात्रा से करियर शुरू करो। एकाध महीने धर्म की इंटर्नशिप करो। फिर किसी नेता की दंगा ब्रिगेड में शामिल हो जाओ। चुनाव आए तो पोस्टर लगाओ, नारे लगाओ, विरोधियों को डराओ।
अगर हाथ-पाँव चला सकते हो तो अच्छा है। अगर दिमाग नहीं चलाते तो और भी अच्छा है क्योंकि आजकल कई क्षेत्रों में योग्यता से ज़्यादा उपयोगिता की माँग है। व्यवस्था को विचारक नहीं चाहिए, कार्यकर्ता चाहिए। और कार्यकर्ता भी ऐसा जो सोचने की गलती न करे।
हो सकता है कोई बड़ा नेता तुमसे खुश हो जाए। बड़ी ज़िम्मेदारी का मतलब समझते हो न? चुनाव का टिकट। किसी बोर्ड का अध्यक्ष पद। किसी विश्वविद्यालय का कुलपति पद। या फिर कोई ऐसा पद जहाँ राष्ट्रसेवा और स्वयंसेवा में अंतर करना मुश्किल हो जाए।
और अगर पढ़े-लिखे हो तो भी अवसर मिल सकते हैं। किसी नागपुर-झंडेवालान की पर्ची लेकर किसी विश्वविद्यालय में पहुँच जाओ। प्रोफेसर बन जाओ। छात्रों को ज्ञान कम, घृणा ज़्यादा बाँटो। उनका और देश दोनों का भविष्य बिगाड़ो। इतिहास को ऐसा पढ़ाओ कि इतिहासकार भी अपना सिर पकड़ लें।
व्यंग्य/उलटबाँसी से और खबरें
ध्यान रहे कि ज्ञान खतरनाक चीज़ है, इसलिए उसका प्रबंधन आवश्यक है। काँवड़ का मौसम बीत जाए तो चिंता मत करना। सरकारी जेन जी कभी बेरोज़गार नहीं होता। तुरंत किसी गौरक्षा दल में शामिल हो जाओ। कोई सेना बना लो। कोई मोर्चा बना लो। कोई मंच बना लो। भारत में संगठन बनाना सबसे आसान उद्योग है। दो झंडे, चार नारे और एक व्हाट्सऐप ग्रुप चाहिए। चार लठैत साथ में हो तो फिर बात ही क्या है।
शुरुआत गाँधी के बारे में अफ़वाह फैलाने से करो। नेहरू के बारे में अश्लील किस्से सुनाओ। विज्ञान को विदेशी षड्यंत्र बताओ। विपक्षी नेताओं को गरियाओ। जहाँ ज्ञान समाप्त होता है, वहाँ फ़ॉरवर्डेड मैसेज शुरू होता है। कॉलेज में हो तो पढ़ाई से समय निकालकर देश बचाओ। किसी छात्र संगठन के नाम पर मारपीट करो। कोई प्रोफेसर सवाल पूछे तो उसे राष्ट्रविरोधी घोषित कर दो। किसी पुस्तक को पढ़े बिना प्रतिबंधित करने की माँग करो। किसी फ़िल्म को देखे बिना उसका विरोध करो।
हमारे समय में किताबें पढ़कर राय बनाई जाती थी। अब राय बनाकर किताबें पढ़ी जाती हैं। और अगर कहीं कोई प्रेमी युगल दिखाई दे जाए तो संस्कृति रक्षा का अवसर हाथ से मत जाने देना। यह मत देखना कि वे पति-पत्नी हैं, भाई-बहन हैं या सिर्फ़ दोस्त। मत भूलो कि संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह हमेशा दूसरों के जीवन में ख़तरे में रहती है।
यदि लड़का दूसरे धर्म का हो तो फिर तुम्हारी पदोन्नति लगभग तय है। देश की सारी समस्याएँ छोड़कर तुम प्रेम की जाँच-पड़ताल में लग जाओ। क्योंकि बेरोज़गारी, महँगाई और शिक्षा जैसे विषय बहुत कठिन हैं। प्रेमियों को पकड़कर पीटना आसान है।
साथ में कुछ साइड बिजनेस भी कर सकते हो। वसूली। दलाली। ठेकेदारी। सुपारी। इन सबको सफल व्यवसायी कहा जा सकता है, बशर्ते सही लोग तुम्हारे साथ हों। पैसा आता है तो क्या घरवाले, क्या मोहल्ले वाले सब सम्मान की नज़रों से देखते हैं। थोड़ा चढ़ावा नेताओं को चढ़ाओ, थोड़ा मंदिरों में बस। राम जी भला करेंगे। घबराने की कोई ज़रूरत नहीं। पुलिस तुम्हारी सुरक्षा में रहेगी। प्रशासन तुम्हारी सेवा में रहेगा। अगर कभी गिरफ़्तार हो भी गए तो छूट जाओगे। और बाहर निकलोगे तो फूल-मालाएँ इंतज़ार करती मिलेंगी।
हमारे ज़माने में जेल जाना बदनामी थी। अब हत्यारे, बलात्कारी जेल से ऐसे लौटते हैं जैसे ओलंपिक का गोल्ड मेडल जीतकर आए हों। और यदि शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने की विलक्षण प्रतिभा रखते हो, तब तो भविष्य और भी उज्ज्वल है। कुलपति बन सकते हो। शैक्षणिक सलाहकार बन सकते हो। सिलेबस कमेटी जा सकते हो। आजकल योग्य लोगों की कमी नहीं है, मगर उपयोगी लोगों का अकाल है।
इसलिए जेन जी, आख़िरी सलाह सुन लो। लाठी खाना, गोली खाना, बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ लड़ना, संविधान बचाने की बातें करना—ये सब पुराने ज़माने के शौक़ हैं। समझदार बनो। सरकारी जेन जी बनो क्योंकि इस देश में आजकल सबसे सुरक्षित आदमी वह नहीं है जो क़ानून मानता है, बल्कि वह है जिसे यक़ीन हो कि क़ानून उस पर लागू नहीं होगा।