राजा से प्रश्न मत कीजिए, शंका मत कीजिए। जिस हाल में हैं खुश रहिए और रामराज्य कीस्थापना में अपना योगदान दीजिए। यह किसी धर्मग्रंथ की लाइन नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के उलटबांसी कॉलम में व्यंग्य को पढ़िए और समझिए इसके मायने।
प्रधानमंत्री आजकल बहुत दुखी हैं....
बड़े लोगों के दुख भी बड़े होते हैं। सामान्य आदमी महँगाई से दुखी होता है, बेरोज़गारी से दुखी होता है।
प्रधानमंत्री जनता की आध्यात्मिक दरिद्रता से दुखी हैं।
उन्हें लगता है कि देश रामराज्य के दरवाज़े तक तो पहुँच गया है, मगर जनता अभी भी लोकतंत्र के बरामदे में बैठी हुई है।
बारह वर्ष से वे उसे समझा रहे हैं। पहले संकेतों में उकसाते हुए समझाया। फिर भाषणों में फुसलाते हुए समझाया। फिर चुनावों में धमकी देकर समझाया। फिर मंदिर बनवाकर समझाया। मगर जनता है कि समझती ही नहीं। इस कलमुँहे लोकतंत्र ने जनता को बिगाड़ दिया है। इधर रामराज्य की तैयारी चल रही है मगर अभी भी वह सवाल पूछने में लगी है।
यही इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। हमारे यहाँ लोगों को श्रद्धा से ज़्यादा जिज्ञासा प्रिय है जबकि जिज्ञासा और भक्ति में वही संबंध है जो साँप और नेवला में होता है। एक साथ दोनों नहीं रह सकते।
भक्ति का पहला नियम है—जो समझ में न आए उसे और अधिक श्रद्धा से स्वीकार करो। जनता यह नियम भूल गई है। वह पूछ रही है कि प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते। और ये वो जनता कह रही है जो ख़ुद को हिंदू कहती है, सनातनी कहती है और रामभक्त बताती है।
जनता बार-बार कहती है कि देश में रामराज्य आना चाहिए है। ठीक है आ जाएगा, बल्कि आ ही गया है। प्रधानमंत्री इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इतालवी मशरूम खाते हुए, विदेश यात्राएं करते हुए, सेल्फी लेते हुए, रील बनाते हुए जुटे हुए हैं।
इन्हीं प्रयासों के बल पर तो वे राम लला को ले आए, उनका भव्य मंदिर भी बनवा दिया। चढ़ावा चोरी को भूल जाइए। वे और भी बहुत से पुण्य कार्य कर रहे हैं। लेकिन प्रजा क्या कर रही है? क्या वह रामराज्य की आदर्श प्रजा के रूप में ढल रही है? क्या वह रामराज्य की प्रजा कि तरह बर्ताव कर रही है?
नहीं कर रही है। अभी तक तो वह ऐसे बर्ताव करती है मानो लोकतंत्र में रह रही हो। अरे अगर वह चाहती है कि अयोध्या की तरह का रामराज्य भारत में भी अवतरित हो तो अयोध्या जैसी प्रजा भी तो बनना चाहिए न।
अब देखिए, जनता मांग कर रही है कि प्रधानमंत्री को प्रेस कांफ्रेंस करनी चाहिए। क्यों करनी चाहिए प्रेस कांफ्रेंस, बताइए ज़रा। रामायण उठाकर देखिए, राम चरित मानस बाँच लीजिए और बताइए कि क्या भगवान राम ने वनवास पर जाने से पहले प्रेस कांफ्रेंस की थी?
क्या उन्होंने पत्रकारों को बुलाकर बताया था कि राजमहल के अंदर क्या षड्यंत्र हुआ, कौन किसके पक्ष में था और आगे की रणनीति क्या होगी?
क्या उन्होंने पत्रकारों को बताया था कि रावण को आधिकारिक चेतावनी दे दी गई है कि सीता को वापस कर दो अन्यथा लंका पर सैन्य कार्रवाई की जाएगी?
अगर आपकी मानें तो शंबूक की हत्या करने के बाद उन्हें प्रेस कांफ्रेंस करके बताना चाहिए था कि एक निर्दोष विद्वान की हत्या उन्होंने किनकी सलाह पर की थी और इससे राज्य के कौन से हित सधेंगे, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
क्या लंका विजय के बाद उन्होंने पत्रकारों को ब्रीफिंग दी थी कि रिजीम चेंज कैसे हुई, विभीषण को किस प्रक्रिया से चुना गया, चयन समिति में कौन-कौन थे और सत्ता हस्तांतरण का रोडमैप क्या है? इस मामले में रामायण के 300 संस्करण और तुलसी का मानस, सब मौन है। और जहाँ शास्त्र मौन हो, वहाँ भक्त को भी मौन रहना चाहिए। श्रद्धा का दूसरा नियम यही है।
आज लोग कहते हैं कि पारदर्शिता होनी चाहिए और इसके लिए पत्रकार सम्मेलन ज़रूरी हैं।
मैं पूछता हूँ—इतनी पारदर्शिता भी क्या अच्छी? अगर सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगे तो श्रद्धा कहाँ बचेगी? आस्था हमेशा हल्के कोहरे में पनपती है। धुंध भक्ति की प्राकृतिक जलवायु है। लोकतंत्र धुंध हटाता है। रामराज्य धुंध को पवित्र मानता है।
व्यंग्य/उलटबाँसी से और खबरें
लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री को सवालों का सामना करना चाहिए। लेकिन प्रश्न क्या है? प्रश्न दरअसल संदेह का सभ्य रूप है। जो आदमी प्रश्न पूछ रहा है, वह कह रहा है कि उसे अभी पूरा विश्वास नहीं हुआ। अब बताइए, यह कैसी भक्ति हुई? सच्चा भक्त उत्तर नहीं चाहता। सच्चा भक्त उत्तरदायी भी नहीं चाहता। उसे केवल आश्वासन चाहिए। और आश्वासन जितना बड़ा हो, उतना ही अच्छा।
यही कारण है कि महान भक्तों ने कभी प्रेस कांफ्रेंस की मांग नहीं की। उन्होंने जय-जयकार की। प्रेस कांफ्रेंस का आविष्कार उन लोगों ने किया जिनके पास श्रद्धा की कमी थी और प्रश्नों की अधिकता। पत्रकार दरअसल वे प्राणी हैं जिन्हें भगवान ने उत्तर सुनने से पहले प्रश्न पूछने की बुरी आदत देकर भेजा है।
वे पूछते हैं—क्यों? जबकि भक्त पूछता है—अगला आदेश क्या है? दोनों में यही अंतर है। सत्ता को सबसे अधिक भय विपक्ष से नहीं, प्रश्नवाचक चिन्ह से होता है। और भक्ति का सबसे बड़ा शत्रु भी प्रश्नवाचक चिन्ह ही है। इसलिए प्रेस कांफ्रेंस की मांग करना केवल प्रधानमंत्री का अपमान नहीं है। यह रामराज्य की पूरी परंपरा पर अविश्वास व्यक्त करना है।
आज लोग पूछते हैं कि निर्णय कैसे लिए जाते हैं। कल पूछेंगे कि निर्णय सही भी हैं या नहीं। परसों पूछेंगे कि निर्णय लेने का अधिकार किसने दिया। और उसके अगले दिन लोकतंत्र वापस आ जाएगा। इसलिए सावधान रहना चाहिए।
रामराज्य और लोकतंत्र के बीच की दूरी उतनी नहीं है जितनी लोग समझते हैं। बस कुछ प्रश्नों की है। वे प्रश्न समाप्त हो जाएँ तो यात्रा आसान हो जाएगी।
आप चाहे रामायण ले लो, राम चरित मानस ले लो या रामायण के जो 300 संस्करण हैं, उनकी छानबीन कर लो। एक में भी आपको अगर पत्रकार सम्मेलन का संकेत मिल जाए तो मैं किसी भी चौराहे पर हाज़िर हो जाऊँगा, आपको जो करना है कर लेना।
वास्तव में प्रधानमंत्री से प्रेस कांफ्रेंस की मांग करना भगवान राम का अपमान है, उन पर संदेह करना है। सच्ची श्रद्धा और भक्ति तो एकनिष्ठ होती है, उसमें प्रश्न करना सर्वथा वर्जित है। अगर राजा के किसी आचरण को लेकर मन व्याकुल हो रहा है तो समझिए कि आपके भक्ति-भाव में, आपकी साधना में कोई कमी रह गई है।
ये तो आप जानते ही हैं कि प्रेस कांफ्रेंस का मतलब है प्रश्न करना और उत्तर की अपेक्षा करना। अब ये बताइए कि क्या ये आपको उचित लगता है कि भगवान राम प्रश्न पूछने वालों का जमावड़ा लगाएं और अपना क़ीमती वक्त ऊटपटांग सवालों के जवाब देने में ज़ाया करें।
और ये प्रश्नकर्ता हैं कौन, किनके प्रतिनिधि हैं, किन्होंने उन्हें अपना प्रतिनिधि बना दिया जो राम से प्रश्न पूछेंगे? असली जन प्रतिनिधि तो स्वयं राम हैं जो सबके मन में बसे हैं, सबकी इच्छाओं से परिचित हैं, सबके मनोरथ पूरा करते हैं।
शास्त्र गवाह हैं कि महान साम्राज्य सवालों से नहीं, जयघोषों से बने हैं।
पत्रकारों की एक और बुरी आदत है। वे याद रखते हैं..स्मृति लोकतंत्र का गुण है और भक्ति का शत्रु।
भक्त का आदर्श मन कंप्यूटर की हार्ड डिस्क नहीं, व्हाट्सऐप का स्टेटस होना चाहिए—चौबीस घंटे बाद सब अपने आप मिट जाए।
पत्रकार याद रखते हैं। उन्हें याद रहता है कि कल क्या कहा गया था और आज क्या कहा जा रहा है। यही कारण है कि वे बार-बार पुरानी बातें निकाल लाते हैं। जबकि सच्चा भक्त वर्तमान में जीता है।
भक्ति का ये तीसरा नियम है—कल के कथन की तुलना आज के कथन से मत करो। तुलना से तर्क पैदा होता है और तर्क से संकट। इसीलिए मैं कहता हूँ कि पत्रकारिता और भक्ति का मेल वैसा ही है जैसा घी और आग का। एक न एक दिन कुछ न कुछ जलकर रहेगा।
विज्ञान और मीडिया ने प्रजा के मन-मस्तिष्क को प्रदूषित कर दिया है। वे पहले जैसे श्रद्धालु नहीं रहे। वे शंकालु बन गए हैं। हर समय आशंकित रहना उनका स्वभाव बन गया है। इसके पीछे मीडिया के उपद्रवी वानरों का बहुत बड़ा हाथ है। वही उन्हें असत्य जानकारियाँ देकर भ्रमित करते हैं, उन्हें उत्तेजित करते रहते हैं।
हालाँकि प्रधानमंत्री ने इस दिशा में काफ़ी काम किया है। उन्होंने अनेक वानरों को साध लिया है। पहले जो इस पेड़ से उस पेड़ पर कूदते फिरते थे, अब एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो में कूदते हैं। पहले वे समाचार ढूँढ़ते थे, अब नरैटिव ढूँढ़ते हैं। पहले वे सवाल पूछते थे, अब सवाल पूछने वालों का चरित्र पूछते हैं।
यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे कम करके नहीं आँकना चाहिए। रामसेतु पत्थरों से बना था। आधुनिक रामसेतु टीवी डिबेटों से बन रहा है।
फिर भी कुछ वानर अब भी जंगलों में भटक रहे हैं। वे कभी किसी विश्वविद्यालय में दिखाई दे जाते हैं, कभी किसी अख़बार में, कभी किसी यूट्यूब चैनल में। राज्य उनकी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए है।
रामराज्य में सब पर नज़र रखना करुणा का ही एक रूप है। जिस राज्य को अपने नागरिकों पर संदेह न हो, वह राज्य अधिक दिन नहीं टिकता। और जिस नागरिक को राज्य पर संदेह हो, उसे टिकने नहीं दिया जाता। यह प्रशासन का सनातन सिद्धांत है।
सच कहूँ तो ये जो प्रश्नकर्ता हैं न, वे एक तरह के बिचौलिए हैं, दलाल हैं। उनका उद्देश्य तो राजा और प्रजा के बीच में भेद पैदा करना है, उनको आपस में लड़ाना है। वे राजा के गुणों और उनके द्वारा किए जा रहे असाधारण कार्यों को प्रचारित करने में रुचि नहीं रखते। इसके विपरीत प्रजा के मन में राजा की जो छवि अंकित है, उसे मलिन करना ही उनका एकमात्र एजेंडा है।
राजधर्म के पालन का अर्थ ये नहीं है कि ट्रम्प की तरह जब भी कोई माइक मुँह के आगे अड़ा दे तो बोल दो, कुछ भी बोल दो, भले ही उसका कोई सिर पैर न हो, उसकी कोई वैधता न हो और बाद में पलटना पड़ जाए। प्रधानमंत्री तो राम की तरह प्राण जाई पर वचन न जाई को मानने वाले हैं। तो प्रजा का दायित्व बनता है कि वह उन्हें संदेह से न देखे, बल्कि वह मानकर चले कि वे जो कर रहे हैं ज़रूर वह रामराज्य के लिए कर रहे होंगे।
प्रधानमंत्री ये दोष स्वीकार कर रहे हैं कि रामराज्य के लिए जनता को जिस तरह से तैयार किया जाना चाहिए था, हमने नहीं किया। हमारे संगठनों, प्रचारकों और स्वयंसेवकों ने वैसी दूरदृष्टि और लगन से काम नहीं लिया जैसा लिया जाना चाहिए था। वे भी चंदा चोरी, चढ़ावे की लूट में शामिल हो गए। उनको भी मौज-मज़ा करने की आदत लग गई।
उनके पतन का ही परिणाम है कि प्रजा अभी भी लोकतंत्र के चश्मे से रामराज्य को देख रही है। वह परिवर्तन की इस विराट प्रक्रिया को समझ नहीं पा रही है, जो लोकतंत्र को रामराज्य में तब्दील करेगी।
लब्बोलुआब ये है कि भारतवर्ष को रामराज्य में परिवर्तित करने के लिए प्रजा का पूर्ण समर्पण और सहयोग वाँछित है। लेकिन अगर वह प्रेस कांफ्रेंस का ही शोर मचाती रही तो ज़ाहिर है कि व्यवधान खड़े होंगे, प्रक्रिया धीमी गति से आगे बढ़ेगी। विरोधियों को अवसर मिल जाएगा। वे लोकतंत्र और संविधान के नाम पर रामराज्य की राह में रोड़े अटकाएंगे। बताइए रामभक्तों, क्या आप ऐसा होने देंगे?
मैं पार्टी और स्वयंसेवकों से एक निवेदन करना चाहता हूँ कि प्रजा को रामराज्य के बारे में शिक्षित करें। उन्हें बताएं कि प्रधानमंत्री स्वयं राजा राम के अवतार हैं और वे रामराज्य लाने के लिए कृत संकल्पित हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति में अगर वे सहयोग नहीं देंगे तो पाप के भागी कहलाएंगे। उन्हें महंगाई, बेरोज़गारी आदि की बात नहीं करनी चाहिए। एक बार रामराज्य स्थापित हो गया तो ये सब समस्याएं अपने आप ही हल हो जाएंगी।
तुलसी बाबा कह गए हैं-
जेहि विधि राखें राम ताही विधि रहिये।
हरष विषाद सुख दुःख कहि न कहिये॥
तुलसी की इन पंक्तियों में राम राज्य का सार है। राम जिस तरह से रखें वैसे ही रहिए। राजा से प्रश्न मत कीजिए, शंका मत कीजिए। जिस हाल में हैं खुश रहिए और रामराज्य की स्थापना में अपना योगदान दीजिए। यही सच्चे सनातनी होने का प्रमाण है। यही राम भक्ति है।