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पानी के लिए हाहाकार, अब ट्रेन से जाएगा पीने का पानी

क्या देश के बड़े हिस्से में ज़मीन के अंदर पानी का स्तर इस तरह नीचे गिर चुका है कि पीने के लिए पानी वहाँ से नहीं निकाला जा सकता? क्या अब पानी भी प्राकृतिक रूप से सब जगह मिलने वाली चीज नहीं रहेगी, बल्कि तेल, दूध या कोयले की तरह उसे एक जगह से दूसरी जगह ट्रेन से भेजा जाएगा? यह भविष्य की भयावह तसवीर नहीं रही, सच्चाई बन चुकी है। 

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शुक्रवार की सुबह तमिलनाडु के जोलारपेट स्टेशन पर 50 वैगनों की एक ट्रेन को हरी झंडी दिखाई गई। 1 करोड़ लीटर पानी लेकर यह ट्रेन अगले दिन चेन्नई पहुँचेगी। रोज़ाना ऐसी दो ट्रेनें चलाई जाएँगी जिसमे 2.25 करोड़ लीटर पानी होगा। यह पानी सामान्य पाइपलाइन के ज़रिए चेन्नई के लोगों तक पहुँचाया जाएगा। तमिलनाडु वॉटर एंड ड्रेनेज बोर्ड ने यह व्यवस्था की है। इसके प्रबंध निदेशक सी. एन. महेश्वरन ने जोलारपेट में ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। 

मुख्यमंत्री ई. के. पलानीस्वामी ने जोलारपेट से चेन्नई तक ट्रेन से पानी ले जाने की परियोजना को जून में मंजूरी दी और इसके लिए 65 करोड़ रुपए भी दिए। 

लेकिन सवाल यह है कि दूध और तेल की तरह पानी की ट्रेन एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की वजह क्या है। यह ऐसा सवाल है, जिससे कई सवाल जुड़े हुए हैं। ये सवाल पर्यावरण की स्थिति की ओर इशारा करते हैं और यह भी बताते हैं कि आने वाला समय कितना भयावह होने वाला है। 

तमिलनाडु का जल संकट

भारत को आने वाले कुछ सालों में भयंकर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। हालात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई लिस्ट में देश के लगभग 17% शहर और कस्बे ऐसे हैं, जो गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। जल संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाला राज्य तमिलनाडु है और उसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश के इलाक़े शामिल हैं। 
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि कि 2020 तक देश के 21 प्रमुख शहरों में ज़मीन के नीचे का पानी ख़त्म हो जाएगा। पानी की कमी के चलते करोड़ों लोग प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि पूरे देश के कई हिस्सों में ऐसी स्थिति है।
नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट में 2020 तक इन शहरों में पानी के संकट को लेकर चेताया गया है। हालाँकि 2019 में ही ऐसी स्थिति बनती दिखने लगी है। करोड़ों लोग सिर्फ़ उन शहरों में ही प्रभावित नहीं हो रहे हैं, बल्कि पूरे देश के कई हिस्सों में ऐसी स्थिति है। भारत में कुछ स्थानों पर आपदा पहले ही आ चुकी है। देश के छठे सबसे बड़े शहर चेन्नई में पानी आपूर्ति करने वाले चार जलाशय लगभग सूखे हैं। 
बता दें कि मानसून देश के केवल कुछ ही हिस्सों में पहुँचा है। जहाँ यह पहुँचा भी है उनमें से अधिकतर जगहों पर देरी हुई है और औसत से काफ़ी कम बारिश हुई है। अधिकतर जलाशय सूख चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जल संकट को दूर करने के लिए सिर्फ़ मानसून पर ही निर्भर रहना काफ़ी होगा? जल प्रबंधन के लिए सरकारी प्रयास कितने कारगर रहे हैं?

'पाइप ड्रीम' साबित होगा पाइप्ड वाटर प्रोजक्ट?

नरेंद्र मोदी सरकार ने 'हर घर नल जल' परियोजना के तहत हर घर तक पाइप से पीने का पानी पहुँचाने की परियोजना पर जल्द ही काम शुरु करने का एलान किया है। पर पहले की कोशिशों का नतीजा बहुत अच्छा नहीं रहा है। केंद्र सरकार ने अप्रैल 2009 में नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम (एनआरडीडब्ल्यूपी) लॉन्च किया था। अंग्रेज़ी अख़बार ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, एनआरडीडब्ल्यूपी पर सीएजी की रिपोर्ट थी कि 2017 तक 35% ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन देना था, लेकिन वास्तव में 2018-19 के अंत तक मुश्किल से 18.3% ग्रामीण परिवारों को ही नल कनेक्शन दिया गया। 

2014-15 में भारत के 17.8 करोड़ ग्रामीण परिवारों यानी 13.3 फ़ीसदी परिवारों को ही नल कनेक्शन दिया गया था। रिपोर्ट में बताया गया है कि हर साल नए कनेक्शनों की संख्या में गिरावट आई है। 2014-15 में 17 लाख से अधिक नए कनेक्शन दिए गए थे। 2017-18 में यह कम होकर सिर्फ़ 6.3 लाख नए कनेक्शन तक पहुँच गया और 2018-19 में 9.7 लाख नये कनेक्शन दिये गये। सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2012 से 2017 के बीच इस कार्यक्रम पर 81,168 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए थे और फिर भी यह मुश्किल से आधा लक्ष्य हासिल कर सका।
आज़ादी के बाद से ग्रामीण भारत को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न योजनाओं के तहत 2.4 लाख करोड़ रुपये ख़र्च किये गये। फिर भी 80% से अधिक ग्रामीण घरों में नल का कनेक्शन नहीं है।
ऐसे में सवाल यह है कि एक करोड़ लीटर पानी क्या ऊंटी के मुँह में जीरा साबित नहीं होगा? क्या इससे चेन्नई के लोगों की प्यास बुझेगी या क्या यह समस्या का स्थायी समाधाना है? इसका उत्तर है, नहीं। नीति निर्धारकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जमीन के नीचे पानी का स्तार हल हाल में बढ़ाया जाए ताकि पीने का पानी वहाँ से निकाला जाए और लोगों को किसी पानी की रेल यानी वॉटर ट्रेन पर निर्भर नहीं रहना पड़े। 
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