एनरोलमेंट बैन वापस लेने के बाद अब नालसार यूनिवर्सिटी के छात्र संघ और पूर्व छात्रों ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। पूर्व छात्रों ने खुला ख़त लिखकर मिश्रा के बयान की निंदा की है।
नालसार के छात्रों का बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा पर हमला।
बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा नालसार यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों के एनरोलमेंट पर लगाया गया प्रतिबंध वापस लेने के बाद भी विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा है। अब नालसार के छात्र संघ 'स्टूडेंट बार काउंसिल' और 400 से अधिक पूर्व छात्रों ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
छात्र संघ ने बीसीआई के पहले जारी किए गए आदेश की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि चेयरमैन को छात्रों और शिक्षकों के बारे में की गई 'आपत्तिजनक टिप्पणियों' के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। वहीं, पूर्व छात्रों ने एक खुला पत्र जारी कर बीसीआई के आदेश को 'असंवैधानिक, मनमाना और अमानवीय' बताया है।
पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब नालसार यूनिवर्सिटी के क़रीब 450 छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि 2026 के दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में न बुलाया जाए। छात्रों ने हाल की कुछ न्यायिक टिप्पणियों और जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े मामलों की सुनवाई का हवाला देते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने गुरुवार को आदेश जारी कर कहा कि नालसार के 2026 बैच के किसी भी छात्र का राज्य बार काउंसिलों में वकील के रूप में एनरोलमेंट अगली सूचना तक न किया जाए। हालाँकि, इस फैसले की चौतरफ़ा आलोचना होने के बाद कुछ ही घंटों में बीसीआई ने अपना आदेश वापस ले लिया।
सिर्फ आदेश वापस लेना काफी नहीं: छात्र संघ
नालसार के छात्र संघ ने शुक्रवार देर रात जारी अपने बयान में कहा कि भले ही बीसीआई ने अपना आदेश वापस ले लिया हो, लेकिन इससे पूरा मामला ख़त्म नहीं हो जाता। छात्र संघ ने कहा कि यह घटना चार स्तरों- कानूनी, संवैधानिक, लोकतांत्रिक मूल्य, और देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के स्तर पर गंभीर चिंता का विषय है। छात्रों ने कहा कि संविधान के प्रति निष्ठा का मतलब चुप रहना नहीं होता।
नालसार छात्र संघ के बयान में कहा गया कि लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद भी वैध और लोकतांत्रिक आलोचना से ऊपर नहीं हैं। न्यायपालिका की जवाबदेही, न्यायपालिका की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि उसका जरूरी हिस्सा है।
'विश्वविद्यालय सवाल पूछना सिखाते हैं'
छात्र संघ ने कहा कि विश्वविद्यालयों का काम स्वतंत्र सोच, आलोचनात्मक चिंतन और सत्ता से सवाल पूछने का साहस विकसित करना है। बयान में कहा गया कि यदि कोई विश्वविद्यालय असहमति की आवाज़ को जगह नहीं देता तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। इसी तरह यदि क़ानूनी पेशा आलोचना से डरने लगे तो वह संविधान की रक्षा नहीं कर सकता।
छात्र संघ ने अपने बयान में बीसीआई के पहले के आदेश पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बीसीआई ने उन सभी लोगों की पहचान बताने को कहा था जो इस अभियान से जुड़े थे, जैसे- अभियान शुरू करने वाले, पत्र तैयार करने वाले, सोशल मीडिया पर साझा करने वाले, छात्र नेताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों, पूर्व छात्रों और बाहरी समर्थकों तक की जानकारी मांगी गई।छात्रों का कहना है कि इस तरह की जानकारी मांगना छात्रों की निजता का गंभीर उल्लंघन है और इससे उनके भविष्य पर भी असर पड़ सकता है।
'ग्रुपबाजी और गंदी राजनीति' वाले आरोपों पर आपत्ति
छात्र संघ ने बीसीआई के पत्र में इस्तेमाल की गई भाषा पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पत्र में विश्वविद्यालय के भीतर 'ग्रुपबाजी', 'गंदी राजनीति' और शिक्षकों पर छात्रों को भड़काने जैसे आरोप लगाए गए थे। छात्रों ने कहा कि ये आरोप पूरी तरह निराधार, गैर-पेशेवर और दुर्भावनापूर्ण हैं। शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी राय रखने वाले छात्रों और शिक्षकों पर ऐसे आरोप लगाना ठीक नहीं है।
अभिव्यक्ति की आजादी
छात्रों ने कहा कि बीसीआई की कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ थी। छात्रों ने कहा कि नालसार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे तय करना है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करेगा या असहमति की आवाज को दबाने की कोशिशों के सामने झुक जाएगा।
400 से अधिक पूर्व छात्रों का खुला पत्र
उधर, नालसार के 400 से ज्यादा पूर्व छात्रों ने भी बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को खुला पत्र लिखा है। उन्होंने कहा कि बीसीआई का पहला आदेश असंवैधानिक, मनमाना और अमानवीय था। पूर्व छात्रों ने लिखा कि किसी भी व्यक्ति को छात्रों की राय से असहमति हो सकती है, लेकिन इसके आधार पर उनके अभिव्यक्ति के अधिकार को कुचलने की कोशिश नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि छात्रों ने केवल विश्वविद्यालय के कुलपति को अपनी राय भेजी थी और यह पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी।
'असहमति अपराध नहीं'
पूर्व छात्रों ने कहा कि बीसीआई के आदेश की भाषा बेहद आपत्तिजनक थी। उन्होंने आरोप लगाया कि आदेश में छात्रों और शिक्षकों को ऐसे पेश किया गया जैसे वे किसी आपराधिक साजिश में शामिल हों, जबकि उन्होंने केवल अपनी लोकतांत्रिक राय व्यक्त की थी। पत्र में कहा गया कि भारत में असहमति जताना कोई अपराध नहीं है।पूर्व छात्रों ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करना बार काउंसिल ऑफ इंडिया का अधिकार क्षेत्र नहीं है। उनके अनुसार बीसीआई की जिम्मेदारी केवल कानूनी शिक्षा के मानक तय करना और वकालत के पेशे का नियमन करना है, न कि छात्रों की राजनीतिक या वैचारिक अभिव्यक्ति पर निगरानी रखना।
छात्र संघ ने कहा कि बीसीआई द्वारा आदेश वापस लेना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन इससे पहले छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ लगाए गए आरोप खत्म नहीं हो जाते। इसलिए उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा से सार्वजनिक माफी की मांग की है और कहा है कि भविष्य में ऐसी कार्रवाई दोबारा नहीं होनी चाहिए, ताकि विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक माहौल और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके।