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बीएचयू में विवाद-  क़ुरान से ज़्यादा संस्कृत जानता हूँ: फ़िरोज़

क्या किसी विषय को पढ़ाने के लिए किसी ख़ास धर्म का होना ज़रूरी है? फिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू में एक मुसलिम फ़िरोज़ ख़ान के संस्कृत पढ़ाने का विवाद क्यों बढ़ता जा रहा है? योग्यता की रट लगाने वाले अब फ़िरोज़ की योग्यता के समर्थन में नहीं आ रहे हैं। बहुत संभव है कि हमेशा योग्यता की वकालत करने वाले ही फ़िरोज़ का विरोध कर रहे हों। फ़िरोज़ की योग्यता पर सवाल भी कैसे उठ सकते हैं, वह भी तब जब बीएचयू प्रशासन ने साफ़ किया है कि वह नियमों के तहत पूरी तरह योग्यता के आधार पर चुने गए हैं।

फ़िरोज़ मुसलिम हैं तो क्या, पूरी ज़िंदगी उन्होंने संस्कृत की ही पढ़ाई की है। दूसरी कक्षा से संस्कृत की पढ़ाई शुरू कर दी थी। इसके बाद वह कभी रुके नहीं। फ़िरोज़ ने शास्त्री (स्नातक), शिक्षा शास्त्री (बीएड), आचार्य यानी स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की और 2018 में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, जयपुर (डीम्ड यूनिवर्सिटी) से पीएचडी पूरी की।  उन्होंने नेट और जेआरएफ़ की परीक्षा भी पास की है। तीन साल तक संस्कृत के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर भी रहे हैं। फ़िरोज़ राजस्थान में संस्कृत युवा प्रतिभा सम्मान से सम्मानित हैं। फ़िरोज़ के पिता रमज़ान ख़ान भी संस्कृत में स्नातक हैं।

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हर तरफ़ कमज़ोर पड़ रही संस्कृत शिक्षा के बावजूद संस्कृत की विरासत को ढो रहे फ़िरोज़ पर कुछ लोग अब सवाल खड़े कर रहे हैं। पहले उनके साथ ऐसा नहीं हुआ। 'द इंडियन एक्सप्रेस' से बातचीत में फ़िरोज़ ख़ान ने कहा, 'मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी संस्कृत सीखी और मुझे इसका कभी भी महसूस नहीं होने दिया गया कि मैं एक मुसलिम हूँ। लेकिन अब जब मैं पढ़ाने की कोशिश में हूँ एकाएक यही एक मुद्दा बन गया है।'

अख़बार के अनुसार, फ़िरोज़ ने कहा, 'मैंने दूसरी कक्षा से ही संस्कृत की पढ़ाई शुरू कर दी थी। लेकिन बगरू के मेरे मोहल्ले में 30 फ़ीसदी मुसलिम होने के बावजूद किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाया था। न तो किसी स्थानीय मौलवी ने और न ही समाज ने।’ 

दरअसल, मैं जितना संस्कृत साहित्य को जानता हूँ उतना तो क़ुरान को भी नहीं जानता। मेरे क्षेत्र में प्रमुख हिंदू लोग मुसलिम होने के बावजूद संस्कृत और साहित्य में मेरे ज्ञान के लिए मेरी तारीफ़ करते रहे हैं।


फ़िरोज़ ख़ान, बीएचयू में चुने गए असिस्टेंट प्रोफ़ेसर

बीएचयू में फ़ैकल्टी के रूप में चुने जाने के उत्साह की तो बात ही दूर अब फ़िरोज़ यही तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें करना क्या है। यह पूछे जाने पर कि क्या बीएचयू में पढ़ाने के लिए लड़ाई लड़ेंगे, वह कहते हैं कि यदि समावेशी माहौल हो तो यह सवाल ही खड़ा नहीं होता है। वह कहते हैं, 'उनके दिल में जो कुछ भी है, काश मैं उनको बदल पाता।'

फ़िरोज़ ख़ान ने कहा, 'जो यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि कैसे एक मुसलिम हिंदुवाद पढ़ा सकता है, मैं उन छात्रों से कहना चाहता हूँ कि साहित्य विभाग में हमें संस्कृत साहित्य और अभिज्ञान शकुंतलम, उत्तर रामचरितम जैसे प्रसिद्ध नाटक व रघुवंश महाकाव्य, हर्षचरितम् जैसे महाकाव्य पढ़ना पड़ता है और इन सभी का धर्म से कोई लेना देना नहीं है। पहले जिनको बीएचयू में वंचित रखा गया वे अब आगे आ रहे हैं और अपनी क्षमता दिखा रहे हैं। यही बदलता भारत है- जो कोई भी सक्षम है वह बीएचयू में पढ़ाने का अधिकार रखता है। मुझे लगता है कि जो इसका विरोध कर रहे हैं उनके ख़िलाफ़ क़ानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।'

फ़िरोज़ ने कहा, 'कुछ हद तक मैं इससे सहमत हो सकता हूँ कि यदि मुझे वेद, धर्म शास्त्र या ज्योतिष पढ़ाना हो तो बेहतर है कि एक हिंदू हो, लेकिन संस्कृत साहित्य का इससे कोई लेना देना नहीं है। मुझे वही सब पढ़ाना है जो कुछ लिखा है।'

बता दें कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान यानी एसवीडीवी में संस्कृत में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में फ़िरोज़ की नियुक्ति का विरोध करने वाले क़रीब 20 छात्रों ने तो अब वाइस चांसलर के आवास के बाहर हवन कुंड भी किया है। वे क़रीब दस दिन से धरने पर हैं। उनका सिर्फ़ एक ही विरोध है कि संस्कृत पढ़ाने वाला मुसलिम कैसे हो सकता है। सात नवंबर को उनकी नियुक्ति के बाद से संस्कृत में एक भी कक्षा नहीं ली जा सकी है।

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे चार छात्रों में से एक और एसवीडीवी में शोध करने वाले कृष्णा कुमार कहते हैं कि यदि कोई हमारी संस्कृति और भावनाओं से जुड़ा हुआ नहीं हो तो वह कैसे हमें और हमारे धर्म को समझ सकता है। प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले तीन अन्य- शशिकांत मिश्रा, शुभम तिवारी और चक्रपाणि ओझा हैं। 

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प्रदर्शन के किसी राजनीतिक नेतृत्व से जुड़े होने के आरोपों को मिश्रा ने सिरे से खारिज कर दिया। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, मिश्रा ने दावा किया कि वह पहले कभी आरएसएस के सदस्य रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार ओझा एबीवीपी के सदस्य रहे थे और तिवारी एबीवीपी और केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के सदस्य रहे थे। 

कैसे तरक्की करेगी संस्कृत?

संस्कृत के मुसलिम शिक्षक होने का विरोध करने पर क्या वह भाषा के रूप में तरक्की कर पाएगी? वैश्विक भाषा बन चुकी अंग्रेज़ी के साथ यदि ऐसा ही बर्ताव किया जाता तो क्या अंग्रेज़ी इंग्लैंड से बाहर निकल पाती? क्या दुनिया की हर संस्कृति में अंग्रेज़ी का वैसा दबदबा रह पाता यदि अंग्रेज़ी को सिर्फ़ ईसाइयों या पादरियों की भाषा बना दिया जाता? शायद नहीं। शायद यह भाषा भी कुछ गिने-चुने लोगों तक सिमट कर रह जाती। माना जाता है कि संस्कृत जिस तरह से आज सिकुड़ती जा रही है उसमें ऐसे दक़ियानूसी विचारों का भी बहुत बड़ा हाथ है। हालाँकि भाषा के सिकुड़ने में कई और पक्षों का हाथ होता है, लेकिन इसे छोटा कारण नहीं माना जा सकता। 

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