2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में आरोपी बीजेपी नेता और मंत्री, विधायक, सांसद पर केस हटाने को विशेष कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। इस दंगे ने पश्चिमी यूपी के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया था। बीजेपी फायदे में रही।
2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के आरोपियों पर मुकदमा वापसी की मंज़ूरी। फाइल फोटो
वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े एक मामले में विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने 25 भाजपा नेताओं और हिंदू कार्यकर्ताओं के खिलाफ दायर मुकदमा वापस लेने की अभियोजन पक्ष (प्रॉसीक्यूशन) की याचिका को स्वीकार कर लिया है। 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में बीजेपी के लिए गेम चेंजर माना जाता है। इस दंगे के बाद पश्चिमी यूपी में किसान राजनीति के सबसे अहम फैक्टर जाट-मुस्लिम एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत सिंह आज बीजेपी के साथ हैं।
मुजफ्फरनगर की विशेष एमपी-एमएलए अदालत के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) देवेंद्र कुमार फौजदार ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर केस वापसी की अर्जी को मंजूरी दी। अभियोजन अधिकारी राहुल सिंह ने इस फैसले की पुष्टि की।
यह मामला 31 जुलाई 2013 को मुजफ्फरनगर के नंगला मंदोर गांव में आयोजित एक महापंचायत से संबंधित है। आरोपियों पर आरोप था कि उन्होंने: निषेधाज्ञा (धारा 144) का उल्लंघन किया, सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा पहुंचाई और महापंचायत में भड़काऊ भाषण देकर सांप्रदायिक तनाव भड़काया।
सरकार का फैसला और अदालत का आदेश
अभियोजन अधिकारी राहुल सिंह के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले को जनहित और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत वापस लेने का निर्णय लिया था, जिसके बाद अभियोजन पक्ष ने अदालत में केस वापस लेने की अर्जी दाखिल की थी। अदालत ने मामले के तथ्यों और राज्य सरकार की याचिका पर विचार करते हुए केस वापसी की अनुमति दे दी।वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और 40,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए थे।
राहत पाने वाले दिग्गज नाम
केस से राहत पाने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हैं: कपिल देव अग्रवाल (उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री), संजीव बालियान (पूर्व केंद्रीय मंत्री),
सुरेश राणा (पूर्व राज्य मंत्री), अशोक कटारिया (पूर्व राज्य मंत्री), भारतेन्दु सिंह और सोहनवीर सिंह (पूर्व बीजेपी सांसद). अशोक कंसल और उमेश मलिक (पूर्व बीजेपी विधायक), साध्वी प्राची (विश्व हिंदू परिषद की नेता) और यति नरसिंहानंद (प्रमुख डासना शिव मंदिर)। इसमें यति नरसिंहानंद ही बीजेपी में नहीं है। लेकिन उनकी गतिविधियां, बयानबाज़ी बीजेपी और आरएसएस के माफिक है।
मुजफ्फरनगर दंगा छेड़छाड़ की मामूली घटना से शुरू हुआ था
2013 में मुजफ्फरनगर दंगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इतिहास की सबसे दर्दनाक हिंसात्मक घटनाओं में से एक है। विवाद मामूली छेड़छाड़ की घटना से हुआ, जिसने फर्जी खबरों, राजनीतिक ध्रुवीकरण और प्रशासनिक लापरवाही के कारण बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया। 27 अगस्त 2013 को मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में लड़की से छेड़छाड़ के विवाद को लेकर हिंसा हुई। लड़की के गांव के दो युवकों गौरव और सचिन (जाट समुदाय) की शाहनवाज नाम के युवक (मुस्लिम समुदाय) से झड़प हो गई। इस झड़प में तीनों युवकों की मौत हो गई।
फर्जी वीडियो का प्रसार और अफवाहेंः 28 - 30 अगस्त 2013 के बीच सोशल मीडिया पर पाकिस्तान का एक पुराना वीडियो वायरल कर यह दावा किया गया कि कवाल में युवकों की बर्बरता से हत्या की गई है। इस फर्जी वीडियो ने इलाके में भारी आक्रोश पैदा कर दिया और दोनों समुदायों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। पाकिस्तान के वीडियो में जिस तरह हत्या दिखाई गई थी, उसे गौरव और सचिन के साथ हुई घटना बताकर प्रचारित किया गया।
महापंचायतें और भड़काऊ भाषणः 31 अगस्त को नगला मंदोर में स्थानीय बीजेपी-आरएसएस नेताओं ने पहली महापंचायत बुलाई। 7 सितंबर को फिर "बहु-बेटी सम्मान महापंचायत" बुलाई गई। जिसमें हजारों की संख्या में लोग पहुंचे। महापंचायत से लौट रहे लोगों पर रास्ते में कथित तौर पर हमला हुआ, जिसके बाद हिंसा बेकाबू हो गई और आगजनी व हत्याएं शुरू हो गईं।
सेना की तैनाती और कर्फ्यूः 8 सितंबर 2013 और उसके बाद दंगे मुजफ्फरनगर से फैलकर शामली, बागपत, मेरठ और सहारनपुर जैसे पड़ोसी जिलों में भी फैल गए। स्थिति पर काबू पाने के लिए सेना को तैनात किया गया और कर्फ्यू लगाया गया।
राजनीतिक साजिश
राज्य में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। सपा ने आरोप लगाया कि आरएसएस और बीजेपी नेताओं ने भड़काऊ बयान देकर इसे हिन्दू-मुस्लिम नफरत में बदल दिया। इसका फायदा 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उठाया। सरकार का कहना है कि इस दंगे में 60 लोग मारे गए थे। उस समय पलायन करने वाले जिन मुस्लिम परिवारों को कैंप में शरण दी गई थी, वे आज भी कैंपों में ही रह रहे हैं।
दंगे ने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तोड़ दिएः पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति दशकों से 'अजगर' (अहीर/यादव, जाट, गुर्जर, और राजपूत) और मुस्लिम मतदाताओं के सामाजिक-आर्थिक मेलजोल पर टिकी थी। चौधरी चरण सिंह और अजीत सिंह (राष्ट्रीय लोकदल) के समय से जाट और मुस्लिम किसान समुदाय एक मजबूत वोट बैंक माने जाते थे। 2013 के दंगों ने इस ग्रामीण सौहार्द को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। इससे जाट और मुस्लिम मतों के विभाजन के कारण राष्ट्रीय लोकदल (RLD) और समाजवादी पार्टी (SP) का पारंपरिक जनाधार पूरी तरह से दरक गया।
2014 के लोकसभा चुनावों पर सीधा असर
2014 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीतकर ऐतिहासिक सफलता हासिल की। दंगों ने इस जीत में अहम भूमिका निभाई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी मुख्य सीटों (मुजफ्फरनगर, कैराना, बागपत, मेरठ, बिजनौर आदि) पर बीजेपी उम्मीदवारों को एकतरफा जीत मिली। RLD प्रमुख अजीत सिंह (बागपत) और उनके बेटे जयंत चौधरी (मथुरा) अपनी सीटें हार गए। दंगों के बाद पैदा हुए ध्रुवीकरण ने जातिगत सीमाओं (जाट, गुर्जर, दलित, सैनी, गैर-यादव ओबीसी) से ऊपर उठकर हिंदू मतदाताओं को बीजेपी के पक्ष में एकजुट कर दिया। यह अलग बात है कि जयंत चौधरी और उनकी आरएलडी आज बीजेपी के साथ हैं और एनडीए में हैं। जयंत चौधरी भी केंद्र में मंत्री हैं।2017 के विधानसभा चुनाव पर असर
मुजफ्फरनगर दंगों का राजनीतिक असर 2014 तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर भी इसका गहरा प्रभाव देखा गया। तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार पर "प्रशासनिक विफलता" और "तुष्टिकरण" के आरोप लगे। जाट समुदाय में सपा सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश था, जिसका नुकसान सपा को 2017 के चुनावों में भुगतना पड़ा और बीजेपी ने 300 से अधिक सीटें हासिल कीं। इसके बाद से ही उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था, अपराध पर नियंत्रण और सांप्रदायिक तनाव की रोकथाम राज्य की राजनीति के सबसे बड़े केंद्र बिंदु बन गए।2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दशकों पुरानी किसान राजनीति को समाप्त कर तीव्र सांप्रदायिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण की नींव रखी। इसी ध्रुवीकरण ने बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में एक मजबूत और लंबे समय तक टिकने वाले राजनीतिक गढ़ का निर्माण किया।