यूपी में पिछले क़रीब पाँच महीने में 23 लोगों को फाँसी की सज़ा सुनाने वाले मुजफ्फरनगर में तैनात एडीजे रवि कुमार दिवाकर ने अब एनकाउंटर, संपत्ति जब्त करने और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA में हिरासत की नीति की तारीफ़ की है। उन्होंने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार की इस अपराध नियंत्रण नीति की वजह से राज्य में अपराध कम हुए हैं। इसी फ़ैसले में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि माफिया और अपराधियों को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से उनके कोर्ट से गंभीर मामलों की फाइलें वापस ली गईं। धड़ाधड़ फाँसी की सजा सुनाने के बाद पिछले महीने उनकी अदालत से हत्या व गंभीर अपराध के 97 मामले वापस ले लिए गए थे। ये जज रवि दिवाकर वही हैं जिन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का आदेश देने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे।

जज दिवाकर ने सोमवार को पत्नी की हत्या के दोषी नदीम को फांसी की सजा सुनाते हुए 38 पन्नों के फ़ैसले में ये बातें लिखी हैं। उनकी यह टिप्पणी उस फ़ैसले का हिस्सा है, जिसमें अदालत ने नदीम नामक व्यक्ति को अपनी पत्नी शहजादी पर मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जलाने के मामले में दोषी ठहराते हुए इसे 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' श्रेणी का अपराध माना और फांसी की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि यह हत्या बेहद क्रूर और अमानवीय थी।

फ़ैसले के दौरान सरकारी पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि कभी मुजफ्फरनगर गैंगवार, रंगदारी, अपहरण और संगठित अपराध के लिए बदनाम था, लेकिन सरकार द्वारा अपराधियों के खिलाफ एनकाउंटर, संपत्ति जब्त करने और NSA के तहत कार्रवाई जैसी नीतियों के कारण हालात बदले हैं। जज रवि दिवाकर ने अपने फ़ैसले में इन दलीलों से सहमति जताई।
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'कभी यूपी की क्राइम कैपिटल कहा जाता था मुजफ्फरनगर'

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार अपने फ़ैसले में जज ने लिखा कि एक समय मीडिया में मुजफ्फरनगर को 'उत्तर प्रदेश की क्राइम कैपिटल' कहा जाता था। जिले में गैंगवार, फिरौती के लिए अपहरण, अवैध हथियारों का कारोबार और सुपारी लेकर हत्या जैसी घटनाएँ आम थीं। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई सक्रिय गैंगों का इस इलाके में प्रभाव था। जज ने अपने फैसले में 2015 में मुजफ्फरनगर कोर्ट परिसर के भीतर गैंगस्टर विक्की त्यागी की हत्या का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि यह घटना दिखाती है कि उस समय अपराधियों में कानून और अदालत का कोई डर नहीं था।

अंकित बालियान हत्याकांड का भी जिक्र

जज दिवाकर ने हाल ही में हरियाणवी गायक अंकित बालियान की हत्या का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या आपराधिक न्याय व्यवस्था केवल आरोपियों के अधिकारों की चिंता करे, या फिर पीड़ित और उनके परिवार के अधिकारों को भी समान महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि हत्या के मामलों में पीड़ित परिवार के हितों को भी न्यायिक प्रक्रिया में गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
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'कानून का राज सबसे ज़रूरी'

हालाँकि, जज दिवाकर ने राज्य सरकार की अपराध नियंत्रण नीति का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने यह भी साफ़ किया कि एनकाउंटर या अन्य सख्त क़दम क़ानून के शासन का विकल्प नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि गरीब और कमजोर लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है, जब व्यवस्था ईमानदारी और कानून के अनुसार काम नहीं करती। उन्होंने अपने फ़ैसले में लिखा, 'आज दुनिया में दान की बजाय न्याय की ज्यादा जरूरत है। न्याय की गैरहाजिरी में स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता।'

'ज्ञानवापी फ़ैसले से मिलीं धमकियाँ'

फ़ैसले में जज दिवाकर ने दावा किया कि ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के बाद उन्हें और उनके परिवार को कई बार जान से मारने की धमकियाँ मिलीं, जिनमें विदेश से आए फोन कॉल भी शामिल थे। उन्होंने आरोप लगाया कि इतनी गंभीर धमकियों के बावजूद उनकी सुरक्षा कम कर दी गई। 

जज रवि दिवाकर ने धनबाद के अतिरिक्त जिला जज उत्तम आनंद की हत्या का ज़िक्र करते हुए कहा कि गंभीर मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश अपराधियों के आसान निशाने बन सकते हैं।

धड़ाधड़ फाँसी देने के बाद जज से केस हटाए गए

जज रवि दिवाकर द्वारा धड़ाधड़ फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी बेंच के सामने पहले से तय केसों को दूसरी बेंचों को ट्रांसफ़र किया गया। जज दिवाकर पिछले 5 महीनों में 11 मामलों में 23 लोगों को मौत की सज़ा सुनाने की वजह से चर्चा में रहे हैं। इसके चलते पिछले महीने उनकी अदालत से हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े 97 लंबित मामले वापस ले लिए गए थे।

जज रवि दिवाकर ने फ़ैसले में आरोप लगाया कि उनके कोर्ट से कई गंभीर मामलों को वापस लिया गया ताकि माफिया, गैंगस्टर और अपराधियों को फायदा मिल सके। उन्होंने कहा कि इस घटनाक्रम से उन्हें गहरा दुख पहुंचा। उन्होंने लिखा कि उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक माफिया के जरिए संदेश भेजा गया कि यदि उन्होंने इस मामले पर ज्यादा टिप्पणी की तो उनका कोर्ट बदलवा दिया जाएगा या उनका तबादला करा दिया जाएगा। जज ने यह भी कहा कि प्रदेश के कई बड़े माफियाओं को जातीय और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।

'डरपोक जज कहलाने से बेहतर मरना पसंद करूंगा'

अपने फ़ैसले में जज दिवाकर ने कहा कि उनके माता-पिता ने बचपन से उन्हें केवल भगवान से डरना सिखाया है, किसी व्यक्ति से नहीं। उन्होंने लिखा, 'मैं डरपोक जज कहलाने से बेहतर मरना पसंद करूंगा। जब तक अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकूंगा, न्यायिक सेवा में रहूंगा, अन्यथा इस्तीफा दे दूंगा।' उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता बेहद ज़रूरी है और यदि न्यायाधीश अपराधियों या बाहुबलियों के दबाव में आ जाएँ तो क़ानून का राज कमजोर हो जाएगा।

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

रवि कुमार दिवाकर नवंबर 2025 से मुजफ्फरनगर में एडीजे के रूप में तैनात हैं। इससे पहले वे 2022 में वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का आदेश देने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे।

मार्च 2024 में जज दिवाकर फिर चर्चा में तब आए जब उन्होंने राज्य में सत्ता के पद पर बैठे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक 'धार्मिक व्यक्ति' का बेहतरीन उदाहरण बताया ता। उन्होंने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तुलना प्लेटो द्वारा उनकी Socratic dialogue वाली किताब 'रिपब्लिक' में बताए गए 'फिलॉसफर किंग' के विचार से भी की।