चमोली में गुरुवार शाम को टनल अचानक ढह गई। तीन दिन पहले भी हादसा हुआ था। उत्तराखंड में सुरंगों के निर्माण ने हिमालय के ईको सिस्टम को बर्बाद कर दिया है। लेकिन मीडिया के लिए सीएम पुष्कर धामी का खुद राहत कार्यों पर नज़र बड़ी खबर है।
चमोली में सुरंग ढही, 7 मज़दूरों की मौत
उत्तराखंड का सीमांत जिला चमोली एक बार फिर भीषण हादसे और तबाही की खबर से दहल उठा है। पीपलकोटी स्थित टीएचडीसी (THDC) की निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजना की सुरंग में अचानक मलबा और पानी भरने से बड़ा हादसा हुआ। इस हादसे में 7 श्रमिकों की मृत्यु हो चुकी है, 14 घायल हैं और कई घंटों के राहत एवं बचाव अभियान के बाद भी कम से कम 2 मजदूर अब भी अंदर फंसे हुए हैं।
यह हादसा एक बार फिर यह गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर चमोली भारत के सबसे आपदा-संवेदनशील जिलों में से एक क्यों बना हुआ है?
पीपलकोटी टीएचडीसी टनल में क्या हुआ?
गुरुवार (13 अगस्त 2026) की शाम लगभग 6:45 बजे एचसीसी (HCC) द्वारा बनाई जा रही टीएचडीसी हाइड्रो प्रोजेक्ट की टनल में अचानक भारी मात्रा में मलबा और पानी घुस आया। उस वक्त पाली (शिफ्ट) में काम कर रहे करीब 22 मजदूर टनल के भीतर फंस गए।घटना की सूचना मिलते ही एनडीआरएफ (NDRF), एसडीआरएफ (SDRF), सेना, आईटीबीपी (ITBP), सीआईएसएफ (CISF) और स्थानीय पुलिस ने तुरंत मोर्चा संभाला। जलभराव और मलबे के कारण एसडीआरएफ की टीमों को ड्रम बोट्स (इंप्रोवाइज्ड नावों) का सहारा लेना पड़ा।टीवी मीडिया में फौरन खबर चलने लगी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटना पर गहरा दुख जताते हुए राहत कार्य युद्ध स्तर पर चलाने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री धामी स्वयं बचाव अभियान की निगरानी कर रहे हैं और उन्होंने झारखंड व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों से भी संपर्क कर वहां के प्रभावित श्रमिकों के बारे में जानकारी साझा की है। चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार के अनुसार, भारी मशीनों से पानी निकासी और मलबा हटाने का काम जारी है।
चमोली पर कुदरत की इतनी मार क्यों?
हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित चमोली जिले में 2013 की केदारनाथ त्रासदी के जलप्रलय के प्रभाव से लेकर फरवरी 2021 की ऋषिगंगा-धौलीगंगा त्रासदी और अब पीपलकोटी टनल हादसा तक प्राकृतिक और मानव-निर्मित आपदाओं की एक लंबी सूची है। भूवैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, चमोली में आपदाओं के बार-बार आने के चार मुख्य कारण हैं:भारी बारिश और बादल फटने पर शुरू होती है तबाही
हिमालय में एक छोटी सी अतिवृष्टि (Extreme Rainfall) या बादल फटने की घटना सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह हादसों की एक पूरी श्रृंखला शुरू कर देती है- बादल फटने पर पहले भूस्खलन होता है, नदियों का प्रवाह रुक जाता है, फिर पानी अपना रास्ता बनाता है, उसके साथ पहाड़ी ढलानों पर जमी ढीली चट्टानें और मलबा बारिश के पानी के साथ मिलकर जानलेवा 'मडफ्लो' बन जाता हैं। ये सबकुछ नीचे स्थित गांवों और बुनियादी ढांचों को तबाह कर देता है। आपदा दर आपदा यही कहानी दोहराई जाती है।
बेहद नाज़ुक और भूकंपीय क्षेत्रः चमोली जिला हिमालयी क्षेत्र के मुख्य मध्यवर्ती भ्रंश (Main Central Thrust - MCT) के करीब स्थित है। यह इलाका सिसमिक ज़ोन IV और V (उच्चतम भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्र) में आता है। यहाँ की चट्टानें कच्ची, भुरभुरी और अंदरूनी दबाव के कारण लगातार खिसकने वाली स्थिति में रहती हैं।
जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों का पिघलना
ग्लोबल वार्मिंग के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और ग्लेशियर की झीलें (Glacial Lakes) बन रही हैं। ये झीलें या बर्फ-चट्टान का अचानक टूटना (Avalanche) नीचे बहने वाली धौलीगंगा, ऋषिगंगा और अलकनंदा नदियों में क्षण भर में विकराल बाढ़ ला देता है।अंधाधुंध निर्माण और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए टनलिंग
चमोली की नाजुक पहाड़ियों पर बड़े पैमाने पर हो रहे टनलिंग (सुरंग निर्माण), पहाड़ों की कटाई और नदियों के प्रवाह को बांधने जैसे कार्य इस पारिस्थितिकी (Ecology) पर भारी दबाव डाल रहे हैं। बार-बार होने वाले हादसों (जैसे 2021 का तपोवन-विष्णुगाड हादसा और हालिया पीपलकोटी हादसा) ने यह साफ कर दिया है कि सुरक्षा मानकों और पर्यावरण-प्रभाव आकलन (EIA) की अनदेखी श्रमिकों और स्थानीय आबादी के लिए काल साबित हो रही है।चमोली की भौगोलिक स्थिति को बदला नहीं जा सकता, लेकिन आपदा के प्रभाव को सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पूर्व चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) के जरिए कम जरूर किया जा सकता है।
- सघन सीसमिक और हाइड्रो-मेटियोरोलॉजिकल नेटवर्क: ग्लेशियरों और नदी घाटियों में वास्तविक समय (Real-time) पर निगरानी करने वाले उपकरण लगाए जाएं।
- संवेदनशील विकास मॉडल: हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बांधों और सुरंगों के निर्माण से पहले पहाड़ों की वहन क्षमता (Carrying Capacity) का गहन वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है।
- कड़े सुरक्षा मानक: निर्माणाधीन सुरंगों और खदानों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए आपातकालीन निकासी और एस्केप टनल के सख्त नियम लागू किए जाने चाहिए।