वर्तमान भारत नाज़ी जर्मनी की ओर बढ़ता दिख रहा है, यदि किसी को मेरी बात पर शक है तो उसे दोबारा सोचना चाहिए। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा एक संवैधानिक पद पर होने के बावजूद अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ जिस तरह ज़हर उगल रहे हैं वह अब ‘संवैधानिक सहिष्णुता’ के दायरे से बाहर हो चुका है। डिगबोई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि मुसलमानों को परेशान करो जिससे वो भाग जाएँ। उन्होंने कहा कि "मियां मुसलमानों को किसी भी तरीक़े से परेशान करो। अगर वे परेशानी का सामना करेंगे, तो वे असम से चले जाएंगे। अगर मैं मियां को परेशान करना चाहता हूं, तो मैं रात 12 बजे जाता हूं। यह कोई मुद्दा नहीं है। हम सीधे मियां मुसलमानों के खिलाफ हैं। हम कुछ छिपा नहीं रहे; हम सीधे कहते हैं कि हम मियांओं के खिलाफ हैं।"
यह बहुत आश्चर्य करने वाली बात है कि एक मुख्यमंत्री ये आह्वान कर रहा है कि मियांं मुसलमानों के घरों पर रात में 12 बजे पहुँचो। इस बात का क्या मतलब है? इस बात का क्या क्या मतलब निकाला जाये? जिन लोगों को मुख्यमंत्री संबोधित करते हुए ये बातें कह रहे हैं वे इस बात से उन अल्पसंख्यकों को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं? ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री को बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा से कोई मतलब नहीं है, रात 12 बजे किसी के घर जाकर उनके बच्चों और महिलाओं को डराकर आप क्या दिखाना चाहते हैं, कि आप बहुत वीर हैं? मुख्यमंत्री सरमा की घृणा और गैरजिम्मेदाराना ज़बान यहीं नहीं रुकती वो आगे कहते हैं कि "अगर रिक्शा का किराया 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दो।"
सरमा ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं को फॉर्म 7 के माध्यम से चुनावी मतदाता सूची में शामिल “मियां” नामों पर आपत्तियाँ दर्ज करने का निर्देश दिया था, जिससे उन लोगों को इधर-उधर दौड़ना पड़े और उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़े। मैं यह सब सुनकर सोच में पड़ गयी हूँ, यह घृणा सामान्य नहीं है यह एक बीमारी है जिसका सामना यह विश्व पहले भी कर चुका है।
न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी क्या?
जो बात मुझे नहीं समझ आ रही है वो यह है कि भारत की न्यायपालिका यह सब कैसे बर्दाश्त कर रही है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद-163 राज्यों के लिए मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल की व्यवस्था करता है। अनुसूची-3 के तहत शपथ लेकर मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री अपना पद धारण करते हैं। यह शपथ मुख्यमंत्री को भारत के संविधान के अनुसार चलने, उसके प्रति सच्ची निष्ठा रखने और सभी के साथ न्याय के लिए बाध्य करती है। शपथ तोड़ने का मतलब है कि मुख्यमंत्री ने संविधान और कानून के साथ धोखा किया है और ऐसे व्यक्ति को पद पर नहीं रहने देना चाहिए। ऐसे व्यक्ति किसी भी हालत में माफ़ी योग्य नहीं हो सकते। CM सरमा जैसे लोग, कितने ही बड़े पद पर क्यों ना हों, यदि वे संविधान के साथ धोखा करते हैं तो न्यायपालिका को उनके साथ संवैधानिक सहिष्णुता का व्यवहार नहीं करना चाहिए। सरमा जैसों को जितनी जल्दी हो सके उनके पद से मुक्त करके कानून सम्मत कार्यवाही की जानी चाहिए।
अगर सुप्रीम कोर्ट, मुख्यमंत्री को कानून और संविधान का आईना दिखा दे तो आने वाले समय में ना कोई सीएम न पीएम, कोई भी इतनी हिम्मत नहीं कर सकेगा कि देश को बाँटने और भारतीय लोगों की गरिमा गिराने वाले काम करे।
यह बात इस देश में सभी को पता होनी चाहिए कि भारत आज अखंड इसलिए नहीं है क्योंकि यहाँ राम कृष्ण पैदा हुए या इसलिए कि यहाँ बड़े-बड़े धार्मिक स्थल बने हुए हैं। भारत सिर्फ़ इसलिए एक और अखंड बना हुआ है क्योंकि यहाँ का संविधान ऐसी खूबियाँ समेटे हुए है। लेकिन सरमा जैसे लोग इस संविधान को ठेंगा दिखा रहे हैं। सरमा जिस पद पर हैं उससे उनका आचरण मेल नहीं खा रहा है। सीएम सरमा की बयानबाजी ना चाहते हुए भी मुझे नाज़ी जर्मनी की ओर ले जा रही है।
हिटलर ने कैसी घृणा फैलाई थी?
लोगों को पढ़ना चाहिए कि किस तरह हिटलर ने नाज़ी नेताओं को आदेश दिया कि वे यहूदियों के प्रति निरंतर घृणा और उत्पीड़न को बढ़ावा दें, उन्हें ‘घुसपैठिए’ के रूप में देखें, और इसी तर्क के सहारे बहिष्कारों व हिंसा को जायज़ ठहराएँ जिससे उन्हें देश से बाहर खदेड़ा जा सके। हिटलर कहता था “तथाकथित ‘यहूदी प्रश्न’ को बार-बार, फिर बार-बार, और लगातार उठाया जाना चाहिए। भावनात्मक घृणा का हर रूप, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, निर्दयता से भुनाया जाना चाहिए।” मेरी नजर में यही काम स्पष्ट रूप से हिमंता बिस्वा सरमा कर रहे हैं। सिर्फ़ चुनाव जीतने के लिए लगातार मियां मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा का एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं, बहिष्कार को जायज़ ठहरा रहे हैं और आगे चलकर यही बात मियां मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा का कारण भी बन सकती है।क्या सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान लेगा?
सवाल यह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट सीएम हिमंता पर संज्ञान नहीं ले सकता तो किस मुद्दे पर लेगा। यदि हिमंता जैसे लोगों को न्यायालय ने नहीं रोका तो यह हर राज्य का मुख्यमंत्री करने लगेगा, हर राज्य में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा और बहिष्कार को चुनावी जीत के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। पहले यह स्पष्ट रूप से मुसलमानों के ख़िलाफ़ होगा और बाद में जब सवाल उठाए जाएँगे तो भाषा बदलकर ‘घुसपैठिए मुसलमानों’ की बात की जाने लगेगी। यह लगातार हो भी रहा है, बिहार चुनावों के दौरान ऐसे ही शोर मचाया गया लेकिन घुसपैठियों के नाम पर कोई नहीं मिला। हाँ, बीजेपी को सत्ता जरूर मिल गई। सत्ता की पुनरावृत्ति के लिए एक समुदाय के ख़िलाफ़ घृणा का बेइन्तेहाँ इस्तेमाल किया जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट भी चुप है। यह बात इतिहास में दर्ज होगी और न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयता खो देगी।
2024 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह खुलेआम भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांप्रदायिक भाषणबाजी की और चुनाव आयोग और न्यायालय चुप रहे, देश को बांटने दिया, वो ऐतिहासिक है। मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा का खुला प्रयोग उत्तराखंड से शुरू हुआ है जिसे एपीसीआर (एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स) की रिपोर्ट से समझा जा सकता है। न्यायपालिका जैसे काम कर रही है उससे लग रहा है कि प्रतिबद्धता संविधान और न्याय के प्रति नहीं बल्कि एक ‘विचारधारा’ के प्रति है जो देश की बहुलता को समाप्त करना चाहती है।
एपीसीआर ने हाल में जारी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि योजनागत तरीक़े से उत्तराखंड में किस तरह मुसलमानों के ख़िलाफ़ फ़ासिस्ट रवैया अपनाया गया।
धार्मिक नफ़रत की बाढ़ कैसे आई?
दिसंबर 2021 में हरिद्वार में धर्म संसद हुई उसके बाद उत्तराखंड में मुस्लिम-विरोधी बयानबाज़ी को एक नए और ख़तरनाक स्तर पर पहुँचा दिया गया। तीन दिन तक चले इस आयोजन में यति नरसिंहानंद, प्रबोधनंद गिरि, यतींद्रानंद गिरि, साध्वी अन्नपूर्णा (उर्फ़ पूजा शकुन पांडे), स्वामी आनंद स्वरूप और कालीचरण महाराज जैसे भगवाधारी नेताओं ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ जनसंहार, हिंसा और हथियारबंद कार्रवाई के लिए खुले तौर पर उकसाया। साध्वी अन्नपूर्णा ने सामूहिक हत्या का आह्वान करते हुए कहा कि हथियारों के बिना कुछ भी संभव नहीं है। प्रबोधनंद गिरि ने हिंदुओं से म्यांमार की तरह 2 लाख मुसलमानों को मारने की बात कही, जबकि यति नरसिंहानंद ने हिंदुओं से हथियार उठाकर प्रभाकरण या भिंडरावाले बनने का आह्वान किया। इस आयोजन का उद्देश्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना और इस्लाम व ईसाई धर्म को दबाना बताया गया। देश को बाँटने और मुसलमानों का नरसंहार करने की बात करने वाले इन लोगों पर UAPA क्यों नहीं लगाया गया? IPC की धारा 153A के तहत FIR तो दर्ज हुई लेकिन कोई सज़ा नहीं हुई। क्यों? इसका उत्तर इस देश की न्यायपालिका को देना चाहिए और उन हिंदुओं को भी, जिन्हें लगता है कि उमर ख़ालिद को 5 सालों से अधिक समय से जेल के भीतर रखना ठीक कदम है।
आगे की घटनाओं ने और न्यायपालिका की निष्क्रियता और तटस्थता ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत का ‘रूल ऑफ़ लॉ’ और संवैधानिक ढाँचा चंद लोगों की मुट्ठी में क़ैद हो चुका है।
हरिद्वार धर्म संसद
हरिद्वार धर्म संसद के बाद 2022 से घृणा भाषणों और हिंसा में तेज़ी आई। जनवरी 2022–23 के दौरान स्वामी प्रबोधनंद गिरि जैसे लोगों ने सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया के ज़रिये मुसलमानों को लगातार “देवभूमि” से निकालने की बात कही। वर्ष 2023 में पुरोला में झूठे “लव जिहाद” आरोपों के बाद सांप्रदायिक तनाव भड़क उठा। पोस्टर लगाए गए जिनमें मुसलमानों से शहर छोड़ने को कहा गया। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने कहा कि उत्तराखंड में लोग सत्यापन के बाद ही रह पाएँगे। धामी के इस बयान का निशाना मुसलमान ही थे। इस बयान के परिणामस्वरूप कई मुस्लिम परिवार वह इलाक़ा छोड़कर चले गए या अपनी संपत्तियाँ बेच दीं। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से शांति बहाल हुई और कुछ परिवार लगभग एक महीने बाद लौटे, लेकिन डर बना रहा।
अगस्त से अक्टूबर 2024 के बीच चौरास, कीर्तिनगर और गौचर जैसे इलाक़ों में “लव जिहाद” के आरोपों के बाद मुस्लिम दुकानदारों को निशाना बनाया गया। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसा हिटलर और गोरिंग के निर्देश पर नाज़ी जर्मनी में यहूदियों की दुकानों के साथ किया जा रहा था।
अगस्त–सितंबर 2024 में नंदा घाट में एक मुस्लिम नाई पर छेड़छाड़ के आरोप के बाद हिंसा भड़क उठी। हिंदुत्व नेता दर्शन भारती ने उकसाऊ भाषण दिए और “मुल्लों के दलालों को जूते मारो … को” जैसे नारे लगाए गए। हिंसा में मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़ और लूट हुई, लगभग चार लाख रुपये की चोरी हुई और एक अस्थायी मस्जिद को तोड़ दिया गया। इसके बाद लगभग पंद्रह मुस्लिम परिवार इलाक़ा छोड़कर चले गए।
अप्रैल 2024 में नैनीताल में मारपीट के आरोप के बाद हुए विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए। भीड़ ने मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़ की और मस्जिद पर पत्थर फेंके, साथ ही “मस्जिद जला दो” जैसे नारे लगाए गए। शिकायतों के बावजूद मस्जिद को पहुंचे नुक़सान के मामले में कोई FIR दर्ज नहीं की गई।
अप्रैल–मई 2025 और फिर नवंबर 2025 में हल्द्वानी में आर्थिक बहिष्कार और ज़बरदस्ती की घटनाएँ सामने आईं। बीजेपी नेता विपिन पांडे ने मुस्लिम दुकानदारों को अपनी धार्मिक पहचान बताने या “जय श्री राम” के नारे लगाने के लिए मजबूर किया। “थूक जिहाद” जैसे झूठे आरोप लगाए गए। 4 नवंबर 2025 को एक मुस्लिम मौलवी को नारे लगाने या नुकसान झेलने की धमकी दी गई। लेकिन उपद्रवियों पर कार्यवाही नहीं की गयी बल्कि मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि उत्तराखंड में लैंड जिहाद, लव जिहाद और थूक जिहाद के लिए ज़ीरो टॉलरेंस है। आर्थिक बहिष्कार का मियां मॉडल मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व वाले उत्तराखंड और सीएम सरमा के नेतृत्व वाले असम में बिना रोकटोक चल रहा है ऐसा ही कुछ मॉडल, हिटलर के आदेश से 1 अप्रैल 1933 को नाज़ी शासन में शुरू हुआ था, नाजियों ने पूरे जर्मनी में यहूदियों के स्वामित्व वाले व्यवसायों, डॉक्टरों, वकीलों आदि का बहिष्कार आयोजित किया था।
2024–25 के दौरान “मज़ार जिहाद” अभियान के तहत 300 से अधिक मुस्लिम धार्मिक स्थलों को गिराया गया। इन्हें सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण बताकर हटाया गया। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि कोई भी सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा नहीं कर सकता, लेकिन रिपोर्टों में बताया गया कि कार्रवाई चयनात्मक थी और कई हिंदू ढाँचों को छोड़ा गया। UMMEED पोर्टल पर पंजीकृत न होने वाली वक्फ संपत्तियों को विवादित घोषित किया गया जिससे उन पर क़ब्ज़ा किया जा सके।
छोटे और कमजोर किसी को नहीं छोड़ा गया। वन गुज्जर समुदाय, जो एक घुमंतू मुस्लिम पशुपालक समुदाय है, उसको भी 2021 के बाद लगातार निशाना बनाया गया और 2025 में ये सब और तेज़ होती गई। उनके पारंपरिक प्रवासन मार्ग रोके गए और ज़मीन पर क़ब्ज़े किए गए।
जिस तरह मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा और बहिष्कार का काम उत्तराखंड से लेकर असम तक ज़ोर-शोर से चल रहा है, जिस तरह इसमें राज्यों के मुख्यमंत्री पूरा सहयोग और आह्वान कर रहे हैं, जिस तरह न्यायालय मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों के प्रति, उनके घरों को गिराये जाने, कानूनों को मुसलमानों के विरुद्ध तैयार किए जाने, उनके पूजा स्थलों पर विवाद किए जाने आदि को लेकर उदासीन हैं; जिस तरह आम हिंदू समुदाय के लिए यह कोई मुद्दा नहीं रह गया है, जिस तरह केंद्र सरकार ऐसे मामलों को लेकर बगलें झाँकने लगती है और कोई भी कार्यवाही नहीं करती उससे सिर्फ़ और सिर्फ़ नाज़ी जर्मनी ही याद आता है। अन्तर बस इतना है कि नाज़ी जर्मनी में यह सब आधिकारिक घोषणाओं के साथ हो रहा था और आज CM सरमा और CM धामी जैसे लोग बयान बदलकर अपने को बचा ले रहे हैं लेकिन सच यही है कि इस देश में नाज़ियों का साया है जिसे जल्द से जल्द संबोधित करना होगा।