10 अक्टूबर को इंडिया गठबंधन के दलों के साथ बैठक में राहुल गांधी ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 14 अगस्त 1947 को रात में दिए गए भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ का ज़िक्र किया जिसमें नेहरू कहते हैं कि “पूर्व में एक नए सितारे का उदय हो रहा है, स्वतंत्रता का सितारा। एक नई आशा जन्म ले रही है। एक ऐसा स्वप्न, जिसे हमने लंबे समय से संजोकर रखा था, अब साकार हो रहा है। काश, यह सितारा कभी अस्त न हो और यह आशा कभी विश्वासघात का शिकार न बने! …हम उस स्वतंत्रता का उत्सव मना रहे हैं, यद्यपि हमारे चारों ओर संकट के बादल छाए हुए हैं…।”
राहुल गांधी ने भाषण के इस अंश का ज़िक्र किया और कहा कि उनकी परवरिश के दौरान उन्हें यह सिखाया गया कि भारत की विविधता ही उसकी पूंजी है, भारत के हर व्यक्ति को उसकी भाषा, संस्कृति, क्षेत्र, धर्म या जाति की परवाह किए बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। 2014 के बाद से यह अभिव्यक्ति ख़तरे में है, इसे वापस लाना होगा। लेकिन यह तब तक नहीं होगा जबतक ज्ञानेश कुमार जैसे लोग नहीं जाएँगे। ज्ञानेश कुमार जाएँगे, मोदी सरकार जाएगी और तब शुरू होगी भारत के लोकतंत्र की मरम्मत!

ज्ञानेश कुमार क्या कर रहे हैं?

ज्ञानेश कुमार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC), को आज जो भी शक्ति प्राप्त है वह उसी संविधान सभा ने दी थी जिसमें जवाहरलाल नेहरू बोल रहे थे। चुनाव आयोग को शक्तियाँ इसलिए दी गई थीं जिससे भारत के लोगों की बदलती हुई राजनैतिक अभिव्यक्ति को संरक्षित किया जा सके और कोई एक ही दल हमेशा के लिए सत्ता पर काबिज ना हो जाये। लेकिन पहले राजीव कुमार और अब ज्ञानेश कुमार ने पूरी चुनाव प्रक्रिया को बीजेपी के खेलने का खिलौना बनाकर रख दिया है। विपक्ष ने जब भी ईवीएम, चुनाव आचार संहिता और SIR के मुद्दे पर आयोग से सवाल पूछे, आयोग ने उचित जवाब नहीं दिया। इसलिए ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए, उन पर लोकतांत्रिक दबाव डालने के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरा इंडिया गठबंधन पिछले कई दिनों से सड़क पर धरना दे रहा है, विरोध प्रदर्शन और मार्च कर रहा है।
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चुनाव आयोग, बीजेपी कर रहे वोट चोरी: राहुल

राहुल गांधी बहुत पहले से तमाम तथ्यों के माध्यम से यह साबित कर चुके हैं कि चुनाव आयोग बीजेपी को जिताने के लिए तमाम चुनावों में कई स्तरों पर धांधली कर रहा है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और खुलासे के बाद से अब पूरा देश इस बात को स्वीकार करने लगा है कि इस देश में पिछले कई चुनाव निष्पक्ष तरीके से नहीं करवाए गए हैं। यह भी नहीं पता कि हरियाणा, महाराष्ट्र, छतीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में बनी सरकारें वैध हैं भी या नहीं। जब चुनाव ही निष्पक्ष नहीं हुए हैं तो वहाँ बनी सरकारें कैसे वैध मानी जाएँ? राहुल गांधी तो एक क़दम बढ़ाकर यह भी कह रहे हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी मोदी सरकार अवैध है और मोदी एक अवैध प्रधानमंत्री हैं। यह सब आसमानी बातें नहीं हैं। यह साबित हो चुका है कि 3 सदस्यीय चुनाव आयोग में जो फैसले बहुमत से होने चाहिए थे, उन्हें ज्ञानेश कुमार ने अकेले करके असंवैधानिक काम किया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने बताया कि पिछले 10 महीनों में दोनों चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखविंदर संधु ने ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ 14 बार लिखित और आधिकारिक रूप से आपत्तियाँ दर्ज की हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र और गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों द्वारा की गई शिकायतों ने भी ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग में चल रही धांधलियों की पोल खोली है।

सांसदों पर पुलिस का दमन!

लेकिन जब राहुल गांधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, इस मुद्दे को लेकर सड़क पर उत्तर गए हैं तो उन्हें और उनके साथी सांसदों को, जो देश की 65% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनको पुलिस केंद्र के इशारे पर अपमानित कर रही है, उनके साथ धक्का-मुक्की कर रही है। प्रियंका गांधी जैसे देश की सबसे ताक़तवर महिला सांसद के कपड़े फाड़ने की कोशिश की जाती है उन्हें चोट पहुँचाई जाती है, नाखून मारे जाते हैं। महिला सांसद महुआ मोइत्रा को बुरी तरह चोटिल कर दिया जाता है, उनके चेहरे और उँगलियों को चोट पहुंचाई जाती है। जब विपक्ष के ये नेता राष्ट्रपति से मिलते हैं और बाहर आकर अपनी बात रखते हैं तो असंसदीय भाषा में बीजेपी के प्रवक्ता राहुल गांधी को ‘नालायक’ बोलते हैं। आखिर क्यों?
क्या किसी को मालूम नहीं कि लोकसभा में विपक्ष का नेता एक तरह से ‘शैडो’ प्रधानमंत्री होता है, लेकिन आज के भारत में जब भाजपा की सरकार है तो विपक्ष के नेता के ख़िलाफ़ बोलने के लिए दिन-रात टीवी बहसों को मच्छी-बाजार बनाने वाले प्रवक्ताओं को भेजा जाता है। ये प्रवक्ता अपनी मर्यादा तोड़कर असभ्य भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

क्या पीएम मोदी राहुल गांधी का जवाब देने नहीं आ सकते? क्या गृहमंत्री जवाब देने नहीं आ सकते? ये जवाब देने क्यों नहीं आते?

या तो इन दोनों को जवाब देना नहीं आता, या मीडिया के सामने क्या और कैसे बोला जाये यह नहीं आता या फिर इन दोनों में सत्ता का दंभ इतना अधिक हो गया है कि वो 65% जनता के प्रतिनिधियों को जवाब देना ज़रूरी नहीं समझते या फिर इनके हाथ सत्ता में बने रहने की कोई ऐसी कुंजी लग गयी है जिससे इनको यह भरोसा हो गया है कि अब वे कई हज़ार सालों तक सत्ता के मज़े लेते रहेंगे?

जेन ज़ी को प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं?

देश भर के सारे छात्र अब आंदोलित होकर सड़कों पर आ रहे हैं, वे दिल्ली पहुंचकर अपना विरोध दर्ज करना चाहते हैं लेकिन सरकार ने उन्हें प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। छात्र फिर भी आये। क्या मोदी सरकार इतने अधिक भय में है कि दिल्ली में छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए 43 हज़ार से अधिक पुलिस और पैरामिलिट्री के जवानों को तैनात किया गया है?

न्यायपालिका कहाँ खड़ी है?  

क्या न्यायपालिका अपनी भूमिका कभी नहीं निभाएगी? आखिरकार न्यायपालिका ने अपनी भूमिका क्यों नहीं निभाई? मैं तो कहती हूँ कि ये सारा फ़साद भारत के सर्वोच्च न्यायालय की वजह से ही है। सर्वोच्च न्यायालय को देश के हर कानून, नियम और आदेश को परखने की ताक़त है इसके बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के कानून को सुप्रीम कोर्ट में नहीं परखा गया, पूरे देश की चुनाव व्यवस्था, पूरे लोकतंत्र और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को एक व्यक्ति ज्ञानेश कुमार के विवेक पर छोड़ दिया गया। 65% आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला विपक्ष, प्रतिष्ठित न्यायविद, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज बोलते रहे, आगाह करते रहे लेकिन सर्वोच्च न्यायालय तमाशबीन बन कर बैठा रहा, नागरिकों के वोट करने के संवैधानिक अधिकार को लुटते देखता रहा और एक माननीय जज साहब तो यह तक कह गए कि SIR की वजह से जो इस बार वोट नहीं कर पाये वो लाखों लोग अगली बार वोट कर लेंगे। ये कैसे न्यायाधीश हैं? इन्होंने कौन सा संविधान पढ़ा है? क्या इन्होंने सार्वभौमिक मताधिकार के विचार की गहराई और लोकतंत्र में इसके महत्व को लेकर कुछ नहीं जाना और पढ़ा? या फिर यह सबकुछ जानबूझकर किया गया है?
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सर्वोच्च न्यायालय की क्या भूमिका?

निष्पक्ष चुनाव आयोग और सार्वभौमिक मताधिकार के साथ साथ रीढ़युक्त सर्वोच्च न्यायालय, भारत के नागरिकों के बाद यही वो संस्थाएं हैं जो इस देश को एक लोकतंत्र के रूप में बनाये रख सकती हैं और इस समय यह सबकुछ खतरे में हैं। बीजेपी के प्रवक्ता पूछ रहे हैं कि अगर राहुल गांधी के पास वोट चोरी के इतने पुख़्ता सबूत है तो वो सर्वोच्च न्यायालय क्यों नहीं चले जाते? दुष्यंत दवे जैसे प्रतिष्ठित न्यायविद यह बात कह रहे हैं कि न्यायपालिका ताकतवर लोगों के पक्ष में झुक गई है और लगातार ऐसी कार्यपालिका का समर्थन कर रही है जो और अधिक शक्तिशाली होती जा रही है। ऐसे में न्यायपालिका के पास जाना व्यर्थ लगता है। इसके बावजूद राहुल गांधी न्यायपालिका ही नहीं, हर उस संस्था के पास जा रहे हैं जिस पर भारत के संविधान ने भरोसा जताया है। वोट चोरी के ख़िलाफ़ अपने विरोध प्रदर्शनों में राहुल गांधी ने पहले चुनाव आयोग के पास जाने की कोशिश की, इसके बाद वो महात्मा गांधी की समाधि राजघाट गए फिर उन्होंने भारत के राष्ट्रपति से बात की और अब सोमवार को राहुल गांधी और और पूरा इंडिया गठबंधन भारत के मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकांत से मिलेंगे उन्हें अपनी बात बतायेंगे। बस सवाल यह है कि सर्वोच्च न्यायालय यह कब समझेगा कि भारत के लोकतंत्र की लुटती हुई अस्मिता में उसका योगदान लगातार अंकित हो रहा है और यह योगदान उस पर कभी न मिटने वाला धब्बा लगा देगा।

कौन सत्ता में बैठेगा, कौन चुनाव जीतेगा, कौन सरकार बनायेगा, इसे तय करने के काम में चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसका फैसला करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत के लोगों को दिया गया है। 

यदि जज और चुनाव आयोग अपने फैसले इस आधार पर करने लगें कि कौन सी विचारधारा अच्छी है कौन सी बुरी, कौन सा प्रधानमंत्री ‘जीनियस’ है कौन सा नहीं तो भारत का लोकतंत्र मुंह के बल गिरेगा।

मोदी सरकार लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बुरी तरह कुचल रही है और सर्वोच्च न्यायालय मूकदर्शक बना हुआ है। तमाम रिपोर्ट्स यह साबित कर रही हैं कि भारत में पिछले 12 सालों में हुए अनगिनत चुनाव असंवैधानिक और ग़ैर-कानूनी तरीके से कराए गए हैं, सरकार द्वारा अपने मनपसंद का चुनाव आयोग तैयार किया जा रहा है जो उसे बार बार चुनाव जीतने में मदद कर रहा है और बदले में उसे उम्र भर के लिए ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ की धारा-16 से
सुरक्षा प्रदान की जा रही है, ये सबकुछ बार बार यह साबित करता है कि चुनाव आयोग और पूरी चुनाव प्रक्रिया बीते कई वर्षों से अवैध तरीके से चल रही है। अपराध करवाओ, अपराध को पोषण दो और अपराधी की सुरक्षा करो, यह वो तरीका है जो मोदी सरकार अपना रही है। और जब यह बात पूरे देश के सामने आ गई और लोग इसके ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने लगे हैं तो उन्हें ‘अनुमति’ न देकर परेशान किया जा रहा है, और साथ ही सर्वोच्च न्यायालय भी कहता है कि बिना अनुमति के किया गया प्रदर्शन ग़ैर-कानूनी है!

संविधान में प्रदर्शन का अधिकार

यह कैसा मज़ाक है? सर्वोच्च न्यायालय यह बताए कि क्या कोई सरकार किसी ऐसे प्रदर्शन को करने की ‘अनुमति’ देगी जो उसकी सत्ता के लिए खतरा हो? दिल्ली पुलिस भारत के गृहमंत्री अमित शाह के अंतर्गत काम करती है आख़िर वो कैसे ऐसे प्रदर्शन को अनुमति दे सकती है जो अमित शाह की सत्ता को ही ख़त्म कर दे! जबतक कोई विरोध और प्रदर्शन देशविरोधी ना हो, और स्वभाव में अहिंसक हो और लोकतांत्रिक हो तबतक उसके लिए यह अनुमति भारत का संविधान खुद ही देता है। सरकार के इशारे पर पुलिस भारत के लोगों के मूल अधिकारों को वेंटिलेटर पर नहीं रख सकती और यदि ऐसा होता है तो सर्वोच्च न्यायालय की यह संवैधानिक ड्यूटी है कि वो ऐसा होने से रोके।
भारत का संविधान किसी सत्ताधारी पार्टी की सरकार चले जाने की असुरक्षा संबंधी बीमारी का इलाज करने के लिए नहीं है। भारत का संविधान भारत के लोगों के लिए है और अगर भारत के लोग शांतपूर्ण तरीके से विरोध और प्रदर्शन के माध्यम से सरकार पर दबाव डालना चाहते हैं, तो उसे रोकने का अधिकार किसी को नहीं है, भले ही विरोध के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त को इस्तीफ़ा देना पड़े या ख़ुद भारत के प्रधाननात्री नरेंद्र मोदी को। सत्ता में बने रहना या प्रधानमंत्री बने रहना कोई दैवीय अधिकार नहीं है, यह जनता द्वारा तय किया जाता है और कोई भी संस्थान चाहे वो कितना ही मजबूत क्यों ना हो अगर जनता के इस अधिकार का अतिक्रमण करता है या इसमें सहयोग करता है तो वह अपराध की श्रेणी में आता है। जिसकी सजा मिलनी ही चाहिए। जिससे लोकतंत्र की ‘मरम्मत’ शुरू हो सके।