गीत वंदे मातरम को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
‘वंदे मातरम’ पूरा गाया जाए या नहीं? कांग्रेस पार्टी में इस सवाल पर दुविधा है। इसका प्रमाण स्वाधीनता दिवस पर कांग्रेस सेवा दल के कार्यक्रम में इसे गाए जाते समय के दृश्य से मिलता है। पहले दो छंदों के बाद का अंश जब गाया जाने लगा तब सोनिया गांधी ने गानेवालों को कुछ इशारा किया। राहुल गांधी का ध्यान भी विचलित हुआ। सोनिया और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बीच कुछ बातचीत होती दीखी। गीत चलता रहा। सोनिया गांधी जाहिरा तौर पर असहज दिखलाई पड़ रही हैं। ‘वंदे मातरम’ पूरा गाया जाता है।
सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर इस दृश्य का वीडियो प्रसारित हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी के लोग इसे दिखलाकर आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस राष्ट्र विरोधी है। नेहरू-गांधी परिवार राष्ट्र विरोधी है क्योंकि वह ‘वंदे मातरम’ को बर्दाश्त नहीं कर सकता। सोनिया गांधी और कांग्रेस ने राष्ट्र की आत्मा का अपमान किया है।
दूसरी तरफ़, कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने सफ़ाई दी है कि गीत पूरा गाया गया, सोनिया जी दरअसल खड़गेजी के लिए कुर्सी लाने को कह रही थीं क्योंकि वे बहुत देर से खड़े थे।वीडियो में आवाज़ें साफ़ नहीं हैं, इसलिए भाजपा के आरोप और जयराम रमेश की सफ़ाई में कौन सही है, तय करना मुश्किल है।
अगर इस प्रसंग को छोड़ दें तो भी राज्यों में कांग्रेस सरकारों का रवैया इस गीत को लेकर एक नहीं रहा है। कर्नाटक और तेलंगाना में यह पूरा गाया गया,लेकिन केरल में नहीं। अख़बारों के मुताबिक़ केरल सरकार का कहना है कि यह गीत गाया जाना अनिवार्य नहीं है। संघीय सरकार ने निर्देश दिया कि स्वाधीनता दिवस कार्यक्रमों में पहले ‘वंदे मातरम’ के सारे छंद गाए जाएँगे। फिर राष्ट्र गान ‘जान-गण-मन’ गया जाएगा। केरल सरकार का कहना है कि यह मात्र सुझाव है, बाध्यकारी नहीं।लेकिन कांग्रेस की ही दूसरी सरकारों के कार्यक्रमों में और दिल्ली में कांग्रेस सेवा दल ने इसे पूरा गाया। सेवा दल का एक कार्यकर्ता एक पत्रकार को बतलाता दीख रहा है कि हमारी नेता तो रोकना चाहती थीं लेकिन हमने इसे पूरा गाया।
दुविधा स्पष्ट है। लेकिन क्या इस गीत को लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की असहजता ग़लत है? आख़िर सोनिया गांधी और राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं और आज उसके सबसे बड़े नेताओं में शुमार किए जाते हैं। कांग्रेस के विचार के प्रति उनकी ज़िम्मेवारी है। इसलिए यह बिलकुल मुनासिब है कि वे अपनी पार्टी के लोगों को अपनी पार्टी के ही उस प्रस्ताव और निर्णय की याद दिलाएँ जो 1937 में सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था। उस प्रस्ताव के अनुसार ‘वंदे मातरम’ के आरंभिक दो अंशों को ही सार्वजनिक अवसरों पर गाया जाना है। यह निर्णय अब तक पार्टी के किसी अधिवेशन में बदला नहीं गया है। इसलिए इसे पूरा गाना पार्टी के इस संबंध में पार्टी के निर्णय का उल्लंघन है।
कांग्रेस सेवा दल का जो सदस्य गर्व से कह रहा है कि सोनिया गांधी के मना किए जाने के बावजूद इसे पूरा गाया गया, वह अपनी पार्टी के इतिहास से परिचित नहीं है। लेकिन क्या कांग्रेस पार्टी में और नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के अलावा और कोई नहीं बचा जो बतला सके कि क्यों ‘वंदे मातरम’ पूरा गाया जाना उस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ है जिसे विकसित करने में कांग्रेस पार्टी की बड़ी भूमिका थी? यह धर्मनिरपेक्षता मात्र एक राजकीय नीति नहीं हो सकती। इसे सारे भारतीयों को भावनात्मक तौर पर जोड़ने का काम भी करना है। राष्ट्र जिन रूपों में व्यक्त किया जाएगा, उनमें समाज के हर तबके को अपनी अभिव्यक्ति नज़र आनी चाहिए। वे ऐसी तो नहीं ही हो सकतीं जिनसे कोई तबका अलगाव महसूस करे।
आज तक अशोक चक्र, सारनाथ की लाट पर किसी धार्मिक समुदाय ने कोई एतराज नहीं किया। हाँ! भाजपा ने ज़रूर तिरंगे के बीच धर्म चक्र को सांप्रदायिक कहा था क्योंकि वह बौद्ध परंपरा का अंग है। जिन आप्त वाक्यों को भारत के संस्थानों ने अपनाया है, उन पर भी किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया है। इसीलिए जब किसी एक प्रतीक को लेकर कोई समुदाय असुविधा महसूस करता है तो उस पर विचार करना आवश्यक है। यह इसलिए कि भारत के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है सारे तबकों को भावनात्मक और सांस्कृतिक इत्मीनान का अहसास दिलाना।
‘वंदे मातरम’ नारे या गीत से मुसलमानों को दो कारणों से एतराज है। एक तो यह कि इसमें जो भारत माता है, वह सिर्फ़ मादरे-वतन नहीं।माता या माँ इस गीत में देवी के लिए इस्तेमाल किया गया है जो इस गीत के दूसरे अंश के बाद स्पष्ट हो जाता है। वे शस्त्रधारिणी हैं,रिपुदलवारिणी हैं, दुर्गा और कमला हैं जिनकी प्रतिमा मंदिर-मंदिर में गढ़ी जानी है।
रिपु या शत्रु कौन है? कौन हैं जो माता के इस रूप की पूजा कर रहे हैं? बंकिमचंद्र चटर्जी ने इसे अस्पष्ट नहीं छोड़ा। यह गीत उन्होंने लिखा तो था स्वतंत्र रूप में लेकिन बाद में अपने उपन्यास ‘आनंद मठ’ में इसे शामिल कर लिया। ‘आनंद मठ’ 18वीं सदी के अकाल के समय हुए फ़क़ीर-संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में लिखा गया था। लेकिन बंकिम बाबू ने अपने उपन्यास में फ़क़ीरों को ग़ायब कर दिया और उसे मात्र संन्यासियों के विद्रोह में बदल दिया। इसका मतलब साफ़ है। बंकिम बाबू कम से कम इस उपन्यास में यह स्वीकार नहीं करते कि हिंदू मुसलमान साथ मिलकर एक हित के लिए काम कर सकते हैं। हिंदुओं को मुसलमानों से बिलकुल पृथक करके एक सामूहिकता की कल्पना इस उपन्यास में की जा रही है। बात सिर्फ़ दोनों को एक दूसरे से अलग करने की नहीं है। बंकिम बाबू के इस उपन्यास के अनुसार हिंदुओं का कर्तव्य है मुसलमानों का संपूर्ण संहार। संतान मुसलमानों के रक्त के प्यासे इन हिंदुओं के अगुआ दस्ता हैं।संतान कहते हैं, मात्र मुसलमान नवाबों के ख़िलाफ़ नहीं लड़ रहे, उनका उद्देश्य है, सारे मुसलमानों का संपूर्ण उच्छेद।
मुसलमानों के जनसंहार के युद्ध में जो संन्यासी या संतान लगे हैं, वे ही माता के इस रूप की कल्पना, रचना और अर्चना करते हैं।माता के इस रूप की अर्चना के लिए बंकिम बाबू ने ‘वंदे मातरम’ गीत को अपने उपन्यास में इस्तेमाल किया।
यह सब जानने के बाद क्या किसी मुसलमान से यह अपेक्षा करना किसी भी तरह उचित है कि वह इस अर्चना को यह संदर्भ भूल कर गाए? मेरे संहार के लिए शक्ति प्राप्त करने को जो आराधना या प्रार्थना लिखी गई है, क्या मैं उसे गा सकता हूँ?
यह सच है कि ‘वंदे मातरम’ नारा 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ आंदोलनों का एक लोकप्रिय नारा था।लेकिन 20वीं सदी में हिंदू-मुसलमान दंगे बढ़ने लगे। दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ने लगा।और तब इसे लेकर सावधानी भी बढ़ने लगी कि भारतीय राष्ट्रीयता को किस भाषा में परिभाषित किया जा रहा है। यही वक्त है जब मुसलमान ‘वंदे मातरम’ नारे और गीत के सांप्रदायिक और मुसलमान विरोधी संदर्भ की तरफ़ कांग्रेस के नेताओं का ध्यान खींचते हैं। तब तक गांधी या नेहरू तक को इसका अहसास नहीं है कि इस गीत से मुसलमानों को असुविधा हो सकती है।यहाँ तक कि टैगोर को भी इसे संगीतबद्ध करते वक्त इसका अहसास नहीं।
जब यह अहसास उन्हें होता है तब कांग्रेस इस प्रश्न पर विचार करती है और निर्णय करती है कि इस गीत के पहले दो अंशों में देश की प्राकृतिक सुंदरता और वैभव का वर्णन है, उसके मधुर स्वभाव की कल्पना है, इसलिए वह सहज ही सबको स्वीकार्य होनी चाहिए। कांग्रेस ने अपने प्रस्ताव में राष्ट्रीय आंदोलन में इस गीत के महत्त्व के इतिहास पर विचार किया और एक सुचिंतित विचार पेश किया: “अपने अतीत से जुड़े संबंधों, स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए उसके साथ जुड़े लोगों के लंबे संघर्ष और कष्ट सहने के इतिहास, तथा उसके व्यापक लोक-प्रचलन ने इस गीत के पहले दो अंतरों को हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का जीवंत और अविभाज्य अंग बना दिया है। इसलिए इन अंतरों के प्रति हमारे मन में स्नेह और सम्मान होना चाहिए। इन अंतरों में ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर किसी को आपत्ति हो सकती है।
गीत के शेष अंतरे बहुत कम जाने जाते हैं और लगभग कभी गाए भी नहीं जाते। उनमें कुछ ऐसे संकेत और एक ऐसी धार्मिक विचारधारा है जो भारत के अन्य धार्मिक समुदायों की विचारधारा के अनुरूप नहीं भी हो सकती है।
समिति मुस्लिम मित्रों द्वारा गीत के कुछ अंशों को लेकर उठाई गई आपत्ति की वैधता को स्वीकार करती है। समिति ने जहाँ तक इन आपत्तियों का अपना स्वतंत्र महत्त्व है, उन्हें ध्यान में रखा है। लेकिन समिति यह भी स्पष्ट करना चाहती है कि राष्ट्रीय जीवन के एक अंग के रूप में इस गीत के प्रयोग का आधुनिक विकास, उस ऐतिहासिक उपन्यास में इसके मूल संदर्भ की तुलना में, कहीं अधिक महत्त्व रखता है—विशेषकर इसलिए कि वह उपन्यास उस समय लिखा गया था जब राष्ट्रीय आंदोलन ने अभी अपना वर्तमान स्वरूप ग्रहण भी नहीं किया था।”
इस प्रस्ताव को पढ़ने से साफ़ हो जाता है कि इस गीत के के दो छंद या अंतरे ही लोकप्रिय थे और गाए जाते थे। कांग्रेस ने मुसलमानों की आपत्ति को जायज़ पाया। लेकिन उसने अनुरोध किया कि इस गीत और नारे को राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में देखना चाहिए।
‘वंदे मातरम’ के दो अंशों को गाए जाने पर मुसलमानों ने एतराज नहीं किया। लेकिन यह तो कहना ही होगा कि जैसे जैसे हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का प्रभाव बढ़ने लगा, इस गीत का वह संदर्भ अधिक प्रबल होने लगा जो ‘आंनद मठ’ उपन्यास का है।
राष्ट्रीय आंदोलन ने ‘वंदे मातरम’ को आनंद मठ के सांप्रदायिक और मुसलमान विरोधी आशय से मुक्त किया था। लेकिन पिछले 30 सालों में हिंदुत्ववाद के बढ़ते प्रभाव ने ‘वंदे मातरम’ को मुसलमान विरोधी घोष में बदल दिया है। ‘वंदे मातरम’ ने स्वाधीनता के भाव से जुड़कर अपना गौरव हासिल किया था। वह गौरव उसने खो दिया जब उसे हिंदुत्ववादी वर्चस्व के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
इसलिए ‘वंदे मातरम’ उसी भारत का राष्ट्र गीत हो सकता है जो धर्मनिरपेक्ष नहीं है। बल्कि जिसकी संगठनकारी विचारधारा मुसलमान विरोधी है। इसे दुहराना ज़रूरी है क्योंकि ‘वंदे मातरम’ पूरा गाए जाने के ख़िलाफ़ लचर तर्क दिए जा रहे हैं। यह कहना कि भाजपा या आर एस एस के लोग इसे पूरा नहीं गा सकते, कोई तर्क नहीं है।यह कहना ठीक है कि 3 मिनट तक सावधान की मुद्रा बनाए रखना और एकाग्रता कठिन है, लेकिन इसके गायन के ख़िलाफ़ यह कोई बहुत पुख़्ता तर्क नहीं है।
‘वंदे मातरम’ क्यों अनिवार्य नहीं होना चाहिए, इसका कारण स्पष्ट है। “भारत में रहना है तो ‘वंदे मातरम’ कहना होगा”: इस धमकी में ही इसका कारण छिपा है कि क्यों इसे नहीं गाना चाहिए। भारत के किसी भी व्यक्ति पर भारतीय होने के लिए कोई बाहरी शर्त नहीं लगाई जा सकती। कभी किसी को यह धमकी नहीं दी गई कि भारत में रहना है तो ‘जन-गण-मन’ गाना होगा। इस धमकी का अर्थ ही है कि एक जनसमूह है जो दूसरे पर अपने प्रतीक लादने की ज़बरदस्ती कर रहा है। भारत में किसी भी समुदाय को इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती कि वह दूसरे समुदायों पर अपनी इच्छा थोपे।
‘वंदे मातरम’ को पूरा गाए जाने पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की असहजता को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वे कांग्रेस के इतिहास और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीयता के प्रति सजग और संवेदनशील हैं। प्रश्न यह है कि शेष कांग्रेसजन क्यों धर्मनिरपेक्षता के मूल्य के प्रति उतने सजग और संवेदनशील नहीं हैं? अभी भी क्यों उन्हें अपनी भूमिका को लेकर दुविधा है?