‘दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं।’ यह नारा दिल्ली की सड़कों पर फिर से सुनाई पड़ रहा है।लेकिन इस बार यह नारा लगाने वाले ख़ुद दिल्ली पुलिस की तरफ़ से लट्ठ चला रहे हैं। तो नारा दिल्ली पुलिस को लगाना चाहिए: “प्यारे गुंडों, लट्ठ चलो, दिल्ली पुलिस तुम्हारे साथ है।’
यह दिल्ली पुलिस के इतिहास का सबसे शर्मनाक दौर है। वह सरकार का विरोध करनेवालों का दमन करने के लिए गुंडों का सहारा ले रही है। उसकी निगरानी में और उसकी शह पर गुंडे प्रदर्शनकारियों पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पीट रहे हैं। गाड़ियों में डंडे, हथियार भर कर वे बीच सड़क पर घंटों तक खुलेआम प्रदर्शनकारियों को धमकी दे रहे हैं, उनपर डंडे चला रहे हैं और पुलिसवाले खामोशी से यह होने दे रही है।
देखा गया कि गुंडे पुलिसवालों से फुसफुसाकर बात कर रहे हैं; कोई किसी पुलिसवाले का पाँव छू रहा है और फिर वे प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ते हैं। वे पत्रकारों को भी घेर रहे हैं। उनसे उग्र तरीक़े से गाली-गलौज की ज़ुबान में सवाल-जवाब करते हैं और उन्हें धमकी देते हैं। कुछ गुंडे माइक लेकर ख़ुद पत्रकारों की शक्ल में घूम रहे हैं।
ताज़ा ख़बरें
ये गुंडे दावा कर रहे हैं कि वे बेचारी दिल्ली पुलिस की मदद करने के लिए आए हैं क्योंकि दिल्ली पुलिस के साथ नाइंसाफ़ी हो रही है, उसके जवानों के साथ हिंसा की जा रही है और उसे जनता की मदद की ज़रूरत है।
अब तक दिल्ली पुलिस ने इन गुंडों की निंदा नहीं की है। हमने उसका कोई बयान नहीं देखा जिसमें वह गुंडों की इस मदद को ठुकरा रही हो। क्या वह यह कहना चाहती है कि अगर जनता का एक हिस्सा उसकी सशस्त्र सहायता करना चाहता है तो उसे कोई एतराज नहीं है?
प्रदर्शनकारियों ने यह आरोप भी लगाया है कि पुलिस उन्हें बसों में भर कर कहें छोड़ रही है जहां लोग लाठियों और कीलों के साथ उनपर हमला कर रहे हैं। तो क्या यह पुलिस और गुंडों की मिली-जुली कार्रवाई है? क्या उनके बीच तालमेल है?
दिल्ली के केंद्रीय इलाक़ों में निषेधाज्ञा लागू है। चुनाव में धांधली के ख़िलाफ़ विरोध कर रहे लोग, ख़ासकर नौजवान इस निषेधाज्ञा को तोड़ कर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन हर कोई देख सकता है कि वे ख़ाली हाथ हैं, कि उनकी ज़ुबान पर सिर्फ़ सरकार विरोधी नारे हैं। वे पुलिस पर हमला नहीं कर रहे हैं। वे कोई तोड़फोड़ नहीं कर रहे। लेकिन पुलिस उन्हें क्रूरता से घसीटती है, नोंचती और पीटती है। वह उन्हें घंटों बसों में भरकर अलग-अलग जगह घुमाती है और मीलों दूर कहीं छोड़ती है।
यह पूछा जाना चाहिए कि यह क़ानून के किस प्रावधान के तहत किया जाता है। क्यों हम इसे सामान्य मानते हैं? अगर किसी किसी विशेष थाना क्षेत्र की पुलिस किसी को पकड़े तो वह उसे दूसरे थाना क्षेत्र में कैसे ले जा सकती है?
किस अधिकार से पुलिस किसी को पीट सकती है, उसे घायल कर सकती है? पुलिस को किसी को नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन पीटने का अधिकार कौन सा क़ानून देता है?
हम यह सवाल नहीं करते क्योंकि हमने मान लिया है कि पुलिस को क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर मनमानी करने की पूरी छूट है। कुछ लोग कह सकते हैं कि ये तो कुछ धिक ही बारीक बात हो गई। पुलिस से आप भद्रता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
इसलिए हम यह नहीं पूछते कि किस क़ानून के तहत पुलिस किसी के घर पहुँच कर अड्डी मारकर बैठ सकती है और उस घर से निकालने से रोक सकती है। किस क़ानून के तहत वह आपको बिना वारंट के उठा लेती है और घंटों ग़ायब रख सकती है?
हम इन सबको सामान्य मानते हैं। पुलिस और ज़्यादती का रिश्ता हमारे लिए स्वाभाविक है और हमने उसे सहते-सहते उचित भी मान लिया है।
लेकिन अब दिल्ली पुलिस इसके साथ नई छूट माँग रही है। वह हमें कह रही है कि उसे गुंडों के गिरोहों की सहायता स्वीकार करने की इजाज़त दी जाए।
पिछले 10 साल में हमने कई बार यह नारा सुना है, ‘दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं।’ हमें पुलिस और गुंडों का गठजोड़ भी देखा है। 2020 में नागरिकता के क़ानून में संशोधन वाले क़ानून का विरोध करनेवालों पर गुंडों के हमलों को लूलिस ने न सिर्फ़ बर्दाश्त किया, बल्कि उसे उचित भी ठहराया। पुलिस की मौजूदगी में कपिल मिश्रा ने हिंसा की धमकी दी और फिर हिंसा हुई। लेकिन पुलिस ने कोई एफआईआर नहीं की। सरकार ने बार बार एफ़ आई आर करने से इनकार किया।
गुंडों की हिंसा के प्रति पुलिस की सहनशीलता के साथ अदालतों के रवैये को भी देखा जाना चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी एकाधिक बार इस मामले में एफआईआर करने की याचिका को खारिज किया। यानी अदालत भी गुंडों की हिंसा को नाजायज़ या ग़ैरक़ानूनी नहीं मानती अगर वे ख़ुद को हिंदू कह दें।
2020 में ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घुसकर घंटों तक गुंडे उपद्रव करते रहे, विद्यार्थियों और अध्यापकों पर हमला करते रहे लेकिन पुलिस ने उन्हें रोकने को कुछ नहीं किया। सबने देखा था कि यह सब कुछ जब हो रहा था, पुलिस ने दखल देने से मना कर दिया।
वक़्त-बेवक़्त से और खबरें
क्या पुलिस नागरिकों को यह कह रही है कि वे गुंडों से ख़ुद निबटें? या यह कि ये गुंडे पुलिस के अनौपचारिक विस्तारित दस्ते हैं?
ये गुंडे ख़ुद को राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी बतलाते हैं। कोई हिंदू रक्षा दल है, कोई किसी हिंदू सेना का सिपाही है। पुलिस के साथ इनका हँसी-मज़ाक का रिश्ता है। इनके हाथ में पुलिस का डंडा और पाँव में पुलिस के बूट हैं।
तो क्या हम यह मान लें कि पुलिस अब हिंदुत्ववादी हिंसक गिरोहों का विस्तार बन गई है?