जिस समाज में वीरता जब मात्र एक व्यक्ति का गुण बन कर रह जाए और हिंसा और कायरता सामूहिक स्वभाव हो, उस समाज के बारे में चिंता होनी चाहिए।समूह में जब मामूली इंसानियत की पहचान घट जाती  है, वीरता की ज़रूरत महसूस होने लगती है।एक अकेले वीर को पूरा कायर समाज घेरकर मार डालता है क्योंकि वह उसे उसकी अमानवीयता की याद दिलाता रहता है। पिछले दिनों उत्तराखंड के  कोटद्वार में हुई  दो घटनाएँ देख लें।पहली घटना वैसी ही थी, जैसी घटनाओं की खबर हम रोज़ाना पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं।भारत के तक़रीबन हर हिस्से से ऐसी खबर आती ही रहती है।
एक मुसलमान की दुकान पर बजरंग दल के झुंड ने धावा बोलता है। वह झुंड दुकानदार से पूछता है कि उसने दुकान के नाम में बाबा क्यों लगा रखा है जबकि वह मुसलमान है।एक लहीम शहीम शख़्स हस्तक्षेप करता है। वह हिंसक झुंड से पूछता है कि वे कौन होते हैं दुकान का नाम बदलवालेवाले।हमलावर पूछते हैं कि उसका नाम क्या है।मोहम्मद दीपक, वह जवाब देता है।उसके और उसकी काया के आगे बजरंग दल का झुंड टिक नहीं पाता।
मोहम्मद दीपक? क्या आज के भारत में किसी का ऐसा नाम हो सकता है? क्या अपना नाम इस तरह बताने वाले को आज के भारत में ज़िंदा रहने दिया जा सकता है?
उस वक्त तो दीपक के सामने से हिंसक झुंड को पीछे हटना पड़ता है। लेकिन वह आख़िर बजरंग दल का झुंड है। वह कैसे पीछे हट सकता है? किसी की इतनी हिम्मत कि वह उसे कदम वापस लेने को मजबूर करे? वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध संगठन है जिसे बरसों से सड़क पर हिंसा करते हुए हम देखते रहे हैं।इस बजरंग दल पर जब कॉंग्रेस पार्टी में कर्नाटक में पाबंदी लगाने की माँग की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसकी तरफ़ से बजरंग बली की जय का नारा लगाया।यानी यह सत्ता संरक्षित हिंसक समूह है।जो काम भारतीय जनता पार्टी या आर एस एस के सुशील स्वयंसेवक करते नहीं दीखना चाहते, वह बजरंग दल करता है।
बजरंग दल का दावा है कि वह हिंदू धर्म और समाज की तरफ़ से काम करता है। काम क्या है: मुसलमानों को डराना, धमकाना, मारना पीटना, ईसाइयों पर हमला करना।उनके भीतर आतंक पैदा करना।उसके ऐसे पुण्य सामाजिक कार्य पर शायद ही कभी कोई हिंदू सवाल उठाता है, उसे रोकना तो दूर की बात है। पुलिस शायद सोचती है कि जो वह क़ानूनी तरीक़े से नहीं कर सकती,बजरंग दल वह कर रहा है। ऐसे उदाहरण विरले हैं जब पुलिस ने बजरंग दल को हिंसा करने से सख्ती से  रोका हो।

कोटद्वार के दीपक कुमार

दीपक ने वह किया जो पुलिस को करना चाहिए था। आख़िर किसी भी गिरोह या झुंड को किसी के घर में, दुकान में घुसने और उसे डराने धमकाने की इजाज़त कैसे दी जा सकती है? लेकिन पुलिस यह सवाल प्रायः नहीं पूछती।वह इस हिंसक गिरोह की हाँ में हाँ मिलाती दिखलाई पड़ती है।लेकिन दीपक ने इस हिंसक गिरोह के सामने खड़े होकर उसे हिंसा करने से रोका। यह किसी भी इंसान का, किसी भी पड़ोसी का धर्म है। दीपक ने एक कदम आगे जाकर ख़ुद को मुसलमान दुकानदार से एक किया, अपना नाम मोहम्मद दीपक बतलाकर। आज यह साहस का काम है।

दीपक का कहना है कि उसने ऐसा इसलिए किया कि हिंदू हो या मुसलमान, सब इंसान ही हैं। दीपक कुमार मोहम्मद दीपक भी हो सकता है। लेकिन वह शायद भूल गए कि आज के भारत में मुसलमान के साथ खड़ा होना, अपनी और  उसकी इंसानियत को एक बतलाना एक भीषण आश्चर्य की बात है। बल्कि यह पाप है और जुर्म भी हो सकता है। इससे हिंदुत्ववादियों की भावना को चोट पहुँच सकती है।

ऐसी ही एक असाधारण घटना पिछले साल हुई थी।अप्रैल, 2025 में नैनीताल में एक और हिंदू, एक औरत शैला नेगी ने मुसलमानों पर हमला कर रही भीड़ का सामना किया। उन्हें रोका। शैला के पिता से पूछा गया कि वे कौन हैं और उन्होंने जवाब दिया कि वे मुसलमान हैं।शैला ने कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए कहा कि हिंदू हो या मुसलमान, दोनों इंसान ही हैं।वे मुसलमान ही होते तो क्या उनकी इंसानियत में कोई फ़र्क पड़ जाता? इस नेक काम के बदले शैला को हिंसा,बलात्कार और क़त्ल की धमकियाँ मिलने लगीं।फिर उन्होंने एक तरह से ख़ुद को गुमनाम कर लिया।

शैला नेगी

तब से वक्त गुजर चुका है। दीपक के सामने आने पर बजरंग दल के लोग पीछे हट गए लेकिन उन्होंने धमकी दी कि वे लौटेंगे। और वे लौटे।पुलिस ने उन्हें दीपक के जिम और घर तक आने दिया। वहाँ बजरंग दल के उस हिंसक गिरोह को रोका ज़रूर गया, दीपक को हिफ़ाज़त के लिए हटाया गया लेकिन पुलिस ने इस झुंड को पहले ही नहीं रोका।यह इतना भी मुश्किल न था। वह कोई इतनी बड़ी भीड़ न थी कि पुलिस पहले न रोक पाती।लेकिन हम जानते हैं कि आज के भारत में  हिंसक हिंदुत्ववादी समूहों को अपनी भावना व्यक्त करने की इजाज़त दी जाती है। उनकी गालियाँ, धमकियाँ, उनकी शारीरिक हिंसा उनकी भावनाओं की वाजिब अभिव्यक्ति हैं।वह तो दीपक को पुलिस का शक्रगुज़ार होन चाहिए कि उसने  उनपर हमला नहीं होने दिया। वरना वह हिंसा भी आज एक वाजिब हिंदुत्ववादी अभिव्यक्ति है।
शैला नेगी की तरह ही दीपक को तरह-तरह की धमकी दी जा रही है।पुलिस ने ज़रूर एक रिपोर्ट दर्ज की है जिसमें इस हिंसक समूह पर शांति भंग करने, पुलिस के काम में बाधा पहुँचाने जैसे अपराधों का आरोप है लेकिन दूसरी तरफ़ जो आशंका थी,वही हुआ।दीपक के ख़िलाफ़ भी पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की है।विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोगों ने दीपक पर हिंसा और धार्मिक वैमनस्य फैलाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि वे शांतिपूर्वक जनसंपर्क अभियान चला रहे थे और दीपक कुमार ने उन्हें जबरन रोका।उनके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती की। उनके पैसे छीन लिए। इससे बड़ा मज़ाक़ क्या हो सकता है?
दीपक को आशंका है कि उनके और उनके परिवार के साथ कुछ भी हो सकता है।कोई चाहे तो कह सकता है कि अब उनकी बहादुरी कहाँ गई। लेकिन हम सब जानते हैं कि सत्ता द्वारा संरक्षित संगठित गिरोह के आगे एक व्यक्ति बिलकुल अरक्षित है।
दीपक कुमार को यह सब झेलना पड़ रहा है क्योंकि उन्होंने एक मुसलमान के साथ सहानुभूति दिखलाई।दीपक ने एक हिंदुत्ववादी अभियान में अपनी मानवता से बाधा पहुँचाई।ऐसा करके उन्होंने बतलाया कि वे हिंदू हैं और हिंदुओं में अच्छाई, भलाई बाक़ी है और वह निष्क्रिय नहीं है। और आज ऐसा करना बड़ा अपराध है। दीपक ने क्यों एक हिंदुत्ववादी अभियान में बाधा पहुँचाईI
आर एस एस और उसके गिरोह हिंदुओं में अच्छाई, इंसानियत का कोई निशान देखते ही भड़क उठते हैं।किसी को वे यह इजाज़त नहीं दे सकते कि वह दिखलाए कि सहानुभूति व्यक्त करना, इंसाफ़ के लिए खड़ा होना इतना मुश्किल नहीं है। वे दीपक कुमार को अकेला कर देना चाहते हैं। क्या उनका समाज ऐसा होने देगा? क्या दीपक कुमार, शैली नेगी जैसों को कोई समाज अब हिंदुओं में बचा भी है?