थोथा चना, बाजे घना : एक बार फिर यह कहावत याद आई जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत को सुना। जब जब आर एस एस के किसी पदाधिकारी को सुनता हूँ, अपने समाज के पारंपरिक विवेक का लोहा मानना पड़ता है जिसने इस तरह के लोगों को ठीक ठीक पहचानने और उसका वर्णन करने की भाषा हमें दी।
इस पारंपरिक मेधा की उपेक्षा करने वाले हमारे पढ़े लिखे तबके के लोगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति एक विचित्र प्रकार का मोह भाव है।वे उसके आडंबर के नीचे के खोखलेपन को पहचानते नहीं। वे उसके बारे कुछ कुछ ऐसे बात करते हैं जैसे वह सामाजिक नैतिकता का स्रोत हो या भारतीयों का पथ प्रदर्शक हो। किसी के आर एस एस का प्रमुख होते ही उसके बारे में कुछ इस कदर आदर से बात की जाने लगती है,मानो वह भारी दार्शनिक या विचारक हो। वह एक साथ धर्म शास्त्र का ज्ञाता, तत्त्वज्ञानी, राजनीति दर्शन का पंडित, शिक्षा शास्त्री,सब कुछ माना जाने लगता है। यहाँ तक कि भूगर्भ शास्त्र या अंतरिक्ष विज्ञान के बारे में भी उसकी टिप्पणियाँ विचारणीय मानी जाने लगती हैं। आर एस एस का प्रमुख होते ही वह हिंदू समाज का, और प्रकारांतर से भारत का सर्वोच्च उपदेशक बन बैठता है।हमारे शिक्षित समाज के भीतर उसके प्रति एक संभ्रम का भाव दिखलाई पड़ता है।
सच्चाई यह है कि आर एस एस के सारे प्रचारक और उसके प्रमुख सतहीपन के आचार्य होते हैं।थोथापन आर एस एस का स्वभाव है। आर एस एस के प्रमुख की शक्ति उसके ज्ञान,उसके किसी सामाजिक कार्य से नहीं आती। आर एस एस के किसी बड़े प्रचारक या प्रमुख के बारे में हम वैसे बात नहीं कर सकते जैसे बाबा आढव या बाबा आमटे या ठक्कर बापा जैसे लोगों के बारे में करते हैं।
आर एस एस इसका प्रतिकार करता है। वह हमें बतलाता है कि वह हिंदू समाज को जाग्रत करने का काम कर रहा है। वह उसका चरित्र निर्माण करने के महान कार्य में संलग्न है। क्या वास्तव में वह ऐसा कर रहा है?
हिंदू समाज के लिए काम करना बुरा नहीं है। उसे संगठित करने का इरादा भी तब तक ठीक माना जाएगा जब तक वह प्रयास उसमें ऐक्य भाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से किया जा रहा हो। क्या इसपर कोई बहस हो सकती है कि विश्व भर में हिंदू धर्म ही ऐसा धर्म है जिसका पालन करने वाले एक दूसरे में कोई सामान्य तत्त्व नहीं देखते? इतना विभाजित और स्तरीकृत समाज शायद ही कोई और हो! जाति हिंदू समाज और हिंदू जीवन को परिभाषित और संचालित करती है।
अभी भी मंदिर में दलितों का प्रवेश आसान नहीं। ब्राह्मण पुरोहितों के लिए वे मात्र दक्षिणा के स्रोत हैं। मंदिरों के लिए चढ़ावे की राशि में वृद्धि के साधन। उन्हें वे अपना क़तई नहीं मानते।सार्वजनिक तौर पर वे उल्लास व्यक्त करें तो भी ‘उच्च जाति’ की आँखों और कानों को खटकता है।आज भी स्कूलों में दलित समुदाय के लोगों का रसोइया होना कठिन है। अगर हो तो बाक़ी गाँव खाने का बहिष्कार करता है।
आज भी सार्वजनिक संस्थानों में नौकरी पाने में ‘पिछड़े’ या दलित समुदाय के सदस्यों को बाधा पहुँचानेवाला हिंदू ही होता है।यह सादा सच है कि अगर आज़ादी के बाद आर एस एस के लोग सत्ता में आते तो पिछड़े और दलित समुदाय के लोग कॉलेजों, सरकारी दफ़्तरों और अन्य संस्थानों में न दिखलाई पड़ते।
यह भी सच है कि अगर आर एस एस के लोग सत्तासीन होते तो हिंदू औरतों को जो अधिकार आज मिले हुए हैं, वे न मिलते। हिंदू कोड बिल पर उसकी प्रतिक्रिया को याद कर लीजिए। संविधान के बारे में ही उसकी राय को याद कीजिए।
आप कहेंगे कि वह तो बीती बात हुई। आज आर एस एस बदल गया है। लेकिन हम इसपर विचार नहीं करते कि आर एस एस को दलितों और औरतों के बारे में अपनी राय को अब ‘प्राइवेट’ कर देने पर बाध्य किया है कोई 60 साल के धर्मनिरपेक्ष शासन ने। संविधान और धर्मनिरपेक्ष राज्य ने( अपनी सारी सीमाओं के साथ) हिंदुओं में समानता के सिद्धांत को लागू किया।
भारत में एक लंबे धर्मनिरपेक्ष शासन और उसके द्वारा बनाए गई कानूनी व्यवस्था के कारण ही हिंदुओं के दमित समुदायों को साँस लेने का अवसर मिला। उन्हें राजनीतिक अधिकार मिले और सार्वजनिक स्थानों में उनकी उपस्थिति को मजबूरन ही सही, स्वीकृति मिली।
अगर हिंदू समाज के ‘वाणीविहीन’ समुदायों को आज आवाज़ मिली है तो उसमें आर एस एस का कोई योगदान नहीं है। बल्कि वह इसलिए मिल पाई कि 60 साल तक आर एस एस उतना प्रभावी न था जितना आज है। क़ानून बनाने और उसे लागू करने में उसकी कोई भूमिका न थी।वरना यह निश्चित है कि न तो आरक्षण होता, न औरतों को बराबर के अधिकार मिलते।
आर एस एस ने क्या ‘उच्च जातियों’ और ‘निम्न जातियों’ के बीच एकता का कोई प्रयास किया है? क्या उस संगठन के भीतर यह एकता या समानता है? एक ‘उच्च जाति’ के स्वयंसेवक ने अभी कुछ दिन पहले लिखा (नाम नहीं दे रहा): “मैं लंबे समय तक स्वयंसेवक रहने के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि आरएसएस के भीतर घोर जातिवाद है और ब्राह्मणवाद का दबदबा है। कथित निचली जातियों से आने वाले स्वयंसेवक और कार्यकर्ता यहाँ उन सब अपमान को शायद इसलिए सहते हैं कि ताकि राष्ट्रवाद की मुख्यधारा में उनको जगह मिले और हिन्दू कहलाने का हक।”
इन अनाम स्वयंसेवक ने लिखा कि आर एस एस हिंदुओं की एकता के झूठ को प्रचारित करता रहता है। अपनी शाखाओं, बैठकों, कार्यक्रमों में वह इस मंत्र का जाप करता है: "हिन्दवः सोदराः सर्वे,
न हिन्दूः पतितो भवेत्।
मम दीक्षा हिन्दू रक्षा,
मम मंत्रः समानता॥"
… जिसका अर्थ यह होता है कि सारे हिन्दू सहोदर भाई हैं, कोई भी हिन्दू पतित या नीच नहीं है, मेरी दीक्षा है हिंदुओ की रक्षा करना और मेरा मंत्र है कि सभी हिन्दू समान हैं। अर्थात कोई भी किसी भी स्तर का भेदभाव नहीं होने का दावा करना। मैंने लंबे समय तक इस मंत्र का पाठ किया और कराया भी एक संघ के स्वयंसेवक होने के नाते।” लेकिन मैंने देखा कि “संघ के भीतर घोर जातिवाद है, कथित निचली जातियों के कार्यकर्ता अथवा स्वयंसेवक को अक्सर कथित ऊंचे जाति के स्वयंसेवक या कार्यकर्ता के द्वारा अपमानित होना पड़ता है और भेद-भाव सहना पड़ता है। पर उन्हें राष्ट्रवाद की भावना उस अपमान को सहने पर मजबूर करती है। संघ में अब किस स्तर का प्रचारक कौन बनेगा इसमें भी घोर जातिगत राजनीति होती है। साथ ही इस स्तर पर घोर भेदभाव भी घटित होता है, जिसे मैंने लंबे समय तक अनुभव किया है।”
यह कितने आश्चर्य की बात है कि लाखों लाख स्वयंसेवक इस झूठ और पाखंड को बरसों बरस जीते रहते हैं! क्या इसलिए कि अपने अपमान से अधिक बलवान है मुसलमानों और ईसाइयों पर अपने वर्चस्व की लालसा?