‘नहीं, सर। हम यह नाटक नहीं कर पाएँगे।’

‘यह क्या,सरकारी निर्देश(जो है)…’

‘नाटक क्या अपने विश्वास को छोड़कर किया जा सकता है?’

‘ तुम तो अभिनेता हो, इसमें विश्वास की क्या दरकार?’

‘यह तो प्रोपेगंडा है, कोई तैयार नहीं।’

‘कौन, नाम बताओ…’
बांग्ला अख़बार आनंद बाज़ार पत्रिका की एक खबर इस संवाद से शुरू होती है। अख़बार ने लिखा कि यह संवाद काल्पनिक नहीं है। कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज के विद्यार्थियों और उनके अध्यापकों के बीच हुई बातचीत का एक हिस्सा ही उसने उद्धृत किया है। अध्यापक या अधिकारी कॉलेज की ड्रामा सोसाइटी के सदस्यों पर दबाव डाल रहे थे कि वे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मोत्सव माह के मौक़े पर यह नाटक करें। और विद्यार्थी मना कर रहे थे क्योंकि जो जिस ‘नाटक’ में उन्हें अभिनय करने को कहा जा रहा था, वह नाटक नहीं, प्रचार था। 
उसमें उन्हें दर्शकों को ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने को कहना था। यह भी कहना था कि ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान में डायपरों की बिक्री बढ़ गई थी। उन्होंने ठीक ही समझा कि यह नाटक के भेस में नरेंद्र मोदी का प्रचार है। यह किसी भी अभिनेता को नहीं करना चाहिए। सो, उन्होंने मना कर दिया।
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विद्यार्थियों को नाटक न करने की हालत में आंतरिक मूल्यांकन में ग्रेड ख़राब करने से लेकर दूसरे दंड तक की धमकी दे गई लेकिन वे नहीं डिगे। जब यह बात सोशल मीडिया पर उजागर हो गई, तो कॉलेज की प्राचार्या ने कहा कि किसी पर कोई दबाव नहीं था।लेकिन क्या यह नाटक बिना दबाव के किया जा रहा था? क्या यह नाटक ख़ुद ड्रामा सोसाइटी ने चुना था? यह कैसे हुआ कि एक ही नाटक बंगाल के कई कॉलेजों में एक ही महीने में खेला जा रहा है और वह महीना मोदी के जन्मोत्सव का महीना है?
विद्यार्थी अपने अध्यापकों को, जो अध्यापक से ज़्यादा अधिकारी हो जाते हैं लेकिन अपने अधिकार की रक्षा भी नहीं कर पाते और आदेशपाल बन जाते हैं, मना कर पाए। अध्यापक अपने अधिकारियों को न सिर्फ़ मना नहीं कर सके, जो काम वे जबरन कर रहे थे, उसे स्वैच्छिक बताकर जायज़ भी ठहराने लगे।
इस प्रसंग पर विचार करते हुए मुझे अभी के चुनाव आयुक्तों के आचरण का ध्यान हो आया। कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज के विद्यार्थियों और चुनाव आयोग के आयुक्तों में क्या अंतर है? विद्यार्थी अपने धर्म के प्रति सजग हैं जबकि चुनाव आयुक्तों ने जान बूझ कर अपने धर्म का त्याग कर दिया है। विद्यार्थी का धर्म है मस्तिष्क की स्वतंत्रता की रक्षा करना। 
चुनाव आयुक्तों का धर्म है भारत के मतदाता के मतदान के अधिकार की रक्षा करना। स्कॉटिश चर्च कॉलेज के विद्यार्थियों ने ‘नमो सेवा गाथा’ नामक नाटक में अभिनय करने से इनकार कर दिया।उनका कहना था कि जिस नाटक के विचार से वे सहमत नहीं, उसमें अभिनय कैसे कर सकते हैं। अध्यापकों और अधिकारियों के दबाव के बावजूद उन्होंने कहा कि जो उनकी बुद्धि को स्वीकार नहीं, वह वे नहीं कर सकते। इस तरह उन्होंने बुद्धि के तर्क के आगे सत्ता के तर्क को मानने से इनकार किया। इससे ठीक उलट चुनाव आयुक्तों ने न सिर्फ़ अपने दायित्व या धर्म की अवहेलना की बल्कि भारतीय मतदाताओं के अधिकार का अपहरण करने के लिए सारे नियमों और परिपाटियों को ध्वस्त कर दिया।
क्या चुनाव आयुक्तों ने यह स्वेच्छा से किया? क्या यह निर्णय उनका था? या वे भारतीय जनता पार्टी के आदेश का पालन कर रहे थे, जैसा राहुल गांधी कह रहे हैं? राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को गवाह बनकर असली गुनहगारों का नाम बताने को कहा है। लेकिन क्या ज्ञानेश कुमार और बाक़ी दो आयुक्त अपनी ज़िम्मेवारी से बच सकते हैं? वैसे ही क्या अध्यापक, अधिकारी विद्यार्थियों पर मोदी के गुणगानवाले प्रचारात्मक नाटक और कार्यक्रम करवाने के अपराध की ज़िम्मेवारी से सिर्फ़ यह कह कर बरी हो सकते हैं कि उन्होंने ऊपर के आदेश का पालन भर किया है?
पिछले 13 सालों में बार-बार विद्यार्थियों ने अपने अध्यापकों और शक्तिसंपन्न लोगों को याद दिलाया है कि अपने धर्म का निर्वाह करना इतना भी कठिन नहीं है। विद्यार्थी तो पूरी तरह शक्तिहीन हैं। उन्हें फेल किया जा सकता है, दाख़िला रद्द किया जा सकता है। लेकिन चुनाव आयुक्त तो हर तरह के कवच से लैस हैं।उनके ख़िलाफ़ कोई भी क़ानून कार्रवाई करना लगभग असंभव है। फिर उन्होंने क्यों एस आई आर जैसा ग़ैर ज़रूरी अभियान चलाया? क्यों उन्होंने करोड़ों भारतीयों को मतदान के अधिकार से वंचित किया?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निश्चय ही अधिक ज़िम्मेवार हैं लेकिन क्या बाक़ी दो चुनाव आयुक्त सिर्फ़ यह कर बच सकते हैं कि उन्होंने कई बार अपनी आपत्ति पत्रों के ज़रिए व्यक्त कर दी थी? जब पश्चिम बंगाल के लाखों मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया तो उन्होंने वे आपत्तियाँ अदालत के आगे क्यों नहीं पेश कीं जो वे भीतरी ख़तो किताबत में ज़ाहिर कर रहे थे? जो बंगाल में हुआ, वह बिहार में पहले हो चुका था। असम में वही हुआ। इन सभी राज्यों के मतदाताओं के अधिकार का खून क्या उनके माथे नहीं है?
क्या वे यह कह कर बच सकते हैं कि उन पर राजनीतिक दबाव था? अगर वे इतने कमज़ोर थे कि इतने बड़े पद के साथ जुड़े दायित्व का निर्वाह न कर सकें तो क्या इस्तीफ़ा भी नहीं दे सकते थे? कम से कम वे उस पाप से बच जाते तो संवैधानिक जनतंत्र में। सबसे बड़ा पाप है। वह पाप है मतदाता के अधिकार की हत्या। क्योंकि ऐसा करने का मतलब है जनादेश को बदलना। जनादेश जो संसद बनाता है, संसद जो क़ानून बनाती है, क़ानून जो संविधान को जीवित रखते हैं। जनादेश बदलकर यह पूरी प्रक्रिया विकृत की जाती है। 
क़ानून जनता के ख़िलाफ़ बनते हैं और संविधान के भी। पिछले एक दशक में जो भी संविधान विरोधी और जन विरोधी क़ानून बने हैं, उनकी ज़िम्मेवारी चुनाव आयुक्तों की है। अभी हम न्यायाधीशों की बात नहीं कर रहे जो यह सब होने से रोक सकते थे।लेकिन उन्होंने वह होने दिया जो ख़ुद उनकी नज़र में ग़लत न तो संदिग्ध अवश्य था।
स्कॉटिश चर्च के विद्यार्थी हमारे लिए अनुकरणीय हैं या चुनाव आयुक्त या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश?