सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल की जनता की पीठ ठोंकी है कि उसने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक नागरिक के तौर पर उन्हें मतदान का प्रतिशत देखकर बहुत ख़ुशी हुई है।उनके मुताबिक़ देश में लोगों को मतदान में भाग लेना चाहिए।अगर लोग जनतंत्र में अपनी ताक़त को समझेंगे ,वोट की ताक़त को, और अगर वे क़ानून के राज का पालन करेंगे, तब वे हिंसा नहीं करेंगे।यह इसलिए कि उन्हें जनतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास है।
मुख्य न्यायाधीश के साथ न्याय-पीठ पर बैठे दूसरे न्यायाधीश जयमाल्य बागची ने कहा कि एक और अच्छी बात यह रही कि हिंसा नहीं हुई। 
फिर उन्होंने अपने बंगाली होने का प्रमाण देते हुए बांग्ला एक कहावत सुनाई, ‘राजा राजा में युद्ध होता है,उलूखाग्रार की जान जाती है।” उलूखाग्रार एक पौधा है। राजाओं के बीच युद्ध में वह कुचला जाता है। यानी, युद्ध बड़े लोग लड़ते हैं, गरीब आदमी बीच में मारा जाता है।न्यायमूर्ति बागची इस चुनाव को राजाओं का युद्ध मानते हैं जिसमें उलूखाग्रार पौधे की तरह निष्क्रिय मतदाता बेचारा कुचला जाता है।
जनतंत्र में चुनावी प्रतिस्पर्द्धा के बारे में यह ख़याल है हमारे न्यायाधीशों का। वे मतदाताओं को बेचारी घास मानते हैं जो आपस में लड़ते हाथियों के पाँव तले कुचली जाती है। हमारे महान न्यायाधीशों को लगता है कि उन्हें इन बेचारे मतदाताओं का संरक्षण करने का अधिकार और दायित्व मिला हुआ है।उनके हिसाब से यह जनता न कुछ ख़ुद सोचती है, न ख़ुद फ़ैसला लेती है। 
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधान सभा चुनाव में 92% मतदाताओं ने वोट डाला है।इस प्रतिशत को देखकर हमारे न्यायमूर्ति हैरान और प्रसन्न हैं।
वोट के अधिकार और उसके महत्त्व के बारे में बंगाल की जनता को भाषण देने की जगह हमारी अदालत को बंगाल की जनता से कुछ सीखने की ज़रूरत है। क्योंकि इन्हीं न्यायमूर्तियों ने पिछले दिनों यह कहा है कि हर बार वोट देना इतना भी ज़रूरी नहीं है। एक बार वोट नहीं देने से क्या फ़र्क पड़ता है, यह इन्हीं न्यायमूर्तियों का विचार है जो आज बंगाल की जनता को शाबाशी दे रहे हैं कि वह अपने वोट का महत्त्व समझती है। 
बंगाल के 27 लाख मतदाता इन्हीं न्यायाधीशों के सामने अपने अर्ज़ी लेकर आए थे कि वे ज़िंदा हैं, भारत के नागरिक हैं लेकिन उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। वे चाहते थे कि अदालत चुनाव आयोग को निर्देश दे कि वह उनके नाम वापस मतदाता सूची में डाले। लेकिन तब अदालत ने कहा था कि हर बार वोट देना कोई ज़रूरी नहीं। उनकी अर्ज़ियों की जाँच करने में वक्त लगेगा और हो सकता है कि इस बार उनका नाम न जुड़ पाए। लेकिन इससे कौन सा पहाड़ टूट पड़ता है?
इस बार भी उन्होंने वोट देने के लिए बंगाल की जनता की प्रशंसा तब की जब वे 65 बंगालियों की अर्ज़ी की सुनवाई कर रहे थे जो उनके सामने यह प्रार्थना लेकर आए थे कि उनके नाम मतदाता सूची में फिर से जोड़ दिए जाएँ। ये कोई मामूली लोग नहीं थे, मतदान अधिकारी थे। वोट डलवाने वाले का ही नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है, इससे बड़ा मज़ाक़ कुछ नहीं हो सकता। लेकिन इस बात ने हमारे न्यायाधीशों को विचलित नहीं किया। उन्होंने कहा कि आप अपनी अर्ज़ी लेकर न्यायिक ट्रिब्यूनल के पास जाइए। वहाँ अगर आप साबित कर सके कि आपकी अर्ज़ी बड़ी अर्जेंट है तो वे शायद सुन लें। फिर कहा कि वक्त कम है इसलिए इस बार शायद नाम न जुड़ पाए।लेकिन कोई बात नहीं, असली बात है कभी न कभी मतदाता सूची में नाम जुड़ना।
एक मतदाता आपके सामने हाथ जोड़े खड़ा है: उसने हर बार वोट डाला है और इस बार उसका नाम चुनाव आयोग ने यह कहकर काट दिया है कि उसके दावे में तार्किक विसंगति है। न्यायमूर्ति बागची को भी तार्किक विसंगति वाली जाँच पर हैरानी है क्योंकि यह जाँच दूसरे किसी राज्य में नहीं की गई है। फिर भी वे उन लोगों के नाम मतदाता सूची में वापस डालने का आदेश चुनाव आयोग को नहीं देते। वे कहते हैं कि हरेक के दावे की जाँच न्यायिक आयोग करेगा। इसमें वक्त लग सकता है। लेकिन वे इससे चिंतित नहीं कि इस देर का मतलब यह होगा कि ये लोग इस बार वोट नहीं दे पाएँगे।

बंगाल की जनता का मताधिकार एक निहायत बेहूदा तर्क के सहारे छीना जा रहा है। हमारी अदालत इसे समझ रही है, इस तर्क को वह भी ग़लत मानती है लेकिन वह लोगों के मताधिकार को बहाल करने में कोई जल्दी नहीं करना चाहती।

अगर दोनों न्यायाधीशों में सच देखने और बोलने की प्रवृत्ति होती तो वे यह कहते कि उन्हें बड़ी हैरानी है कि बंगाल के लोगों के लिए वोट देने से बड़ा काम और कुछ नहीं।वे सारा काम धाम छोड़ कर वोट देने ट्रेन में धक्के खाते अपने गाँव-घर पहुँच जाते हैं।आख़िर ‘पॉलिटिक्स’ उनके लिए जीने और मरने का सवाल क्यों है? 
न्यायमूर्तियों को यह कहना चाहिए था कि एक वोट डालने के लिए 15 दिन, एक महीना अपना काम छोड़ने से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है।आर्थिक तरक्की अधिक ज़रूरी है या राजनीति? वे यह पूछते कि क्यों बंगाल के लोग इतने राजनीतिक हैं?
इसी सुनवाई के दौरान इस पीठ ने नाराज़गी जताई थी बंगाल में हर कोई ‘राजनीतिक भाषा’ में बात करता है। उसके पहले उन्होंने यह भी कहा था कि बंगाल में हद से ज़्यादा राजनीतिक ध्रुवीकरण है। 
हर किसी के राजनीतिक भाषा में बात करने का मतलब है जनतांत्रिक चेतना का सक्रिय होना। इससे खुश होना चाहिए लेकिन हमारे न्यायाधीश बंगाल की तीव्र राजनीतिक संवेदना को देखकर चिंतित थे। राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक अर्थ यह भी है कि लोग अपने राजनीतिक पक्ष के बारे में गंभीर हैं।यह कोई नकारात्मक बात नहीं है जैसी हमारे न्यायाधीशों को लगती है।
92% बंगालियों के मतदान की खबर सुनकर न्यायाधीशों को गंभीर आत्मसमीक्षा करनी चाहिए। उन्हें सार्वजनिक तौर पर पश्चाताप करना चाहिए कि उन्होंने चुनाव आयोग के साथ मिलकर बंगाल के 27 लाख मतदाताओं के मताधिकार को स्थगित कर दिया। अदालत को इन लाखों मतदाताओं से माफी माँगनी चाहिए कि वह उनकी तरह जनतांत्रिक अधिकार के प्रति चौकन्ना नहीं रह पाई, कि वह चुनाव आयोग की क्रूरता से मतदाताओं की रक्षा नहीं कर पाई। 
पश्चिम बंगाल में 92% मतदान एक आईना है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय का असली चेहरा दिखलाई पड़ता है।शायद अपने उस चेहरे को देखकर न्यायाधीश महोदय भी अपनी आँख फेर लेना चाहेंगे।काश! उनमें इतनी भर जनतांत्रिक संवेदना बची हो!