स्वतंत्र भारद्वाज भारत के आज के कुछ सबसे चर्चित नामों में से एक है। यह भी जोड़ना चाहिए: सबसे चर्चित हिंदू नाम। या ‘उच्च जाति हिंदू’ नाम। इससे इस देश, इस धर्म और इस ‘जाति समूह’ की आज की अवस्था का पता चलता है कि स्वतंत्र भारद्वाज उसका सबसे लोकप्रिय और प्रतिनिधि चेहरा है। इतना ही नहीं, स्वतंत्र भारद्वाज एक प्रतिनिधि है वैसे लोगों का जिन्हें भारत का आज का राजकीय तंत्र अपना सबसे भरोसेमंद मित्र मानता है। जिसे भारत की जनता के बीच से उसने अपने सहयोगी के रूप में चुना है।

याद कीजिए वह नारा : ‘दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं।’ यह नारा 2020 में स्वतंत्र भारद्वाज जैसे हिंदू नौजवान लगा रहे थे जब पुलिस की हिंसा का रुख़ मुसलमानों की तरफ़ था। दिल्ली पुलिस ने कभी भी इस नारे की भर्त्सना नहीं की। कभी नहीं कहा कि वह इन गुंडों की तरफ़ से लट्ठ नहीं चला रही। बल्कि संभवतः उसने ऐसे नारे को अपने काम की अनुशंसा और प्रशंसा के रूप में स्वीकार किया। इससे मुसलमानों के ख़िलाफ़ उसका रवैया और सख़्त हुआ क्योंकि जनता का एक हिस्सा उसे शाबाशी दे रहा था कि पुलिस उसकी तरफ़ से यह हिंसा कर रही थी।
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पुलिस स्वतंत्र भारद्वाज में क्या संबंध?

पुलिस और स्वतंत्र भारद्वाज जैसे हिंदू लट्ठबाज़ों का गठजोड़ दिखलाई दिया 5 जनवरी, 2020 को जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के परिसर में घंटों तक गुंडे विद्यार्थियों और अध्यापकों पर हमला करते रहे और पुलिस ख़ामोश देखती रही। सब कुछ वीडियो पर रिकॉर्ड हुआ। वे गुंडे पुलिस की निगरानी में परिसर में घुसे और इत्मीनान से लट्ठ चलाते रहे। पुलिस ने उन्हें रोकने से इनकार कर दिया। फिर वे अपना काम ख़त्म करके निकले और पुलिस के क़रीब खड़े रहे। हमलावरों का चेहरा साफ़ दिख रहा है। लेकिन आज 6 साल गुजर जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस इन गुंडों को पकड़ नहीं पाई है। यह कहना ठीक होगा कि उसकी इन्हें पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसे नहीं लगता कि इन गुंडों ने कुछ ग़लत किया था। क्या वह यह नारा लगाना चाहती थी: ‘गुंडो, तुम लट्ठ चलाओ, हम तुमारे साथ हैं’ ?

फिर वह लट्ठ, जो पुलिस चला रही थी, स्वतंत्र भारद्वाज के हाथ आ गया। पुलिस के जूते भी उसके पैरों में आ गए। अब वह पुलिस की तरफ़ से लट्ठ चला रहा था। लेकिन इस बार उसके निशाने पर मुसलमान नहीं थे। वह सरकार का विरोध कर रहे नौजवानों पर लट्ठ चला रहा था। स्वतंत्र भारद्वाज इस सरकार और इसके नेता नरेंद्र मोदी की तरफ़ से उनके विरोधियों पर लट्ठ चला रहा था।

स्वतंत्र भारद्वाज का इतिहास देखते हुए उसे ग़लत नहीं लगा कि वह जो कर रहा था, उसे खुलेआम बतलाए भी। आख़िर वह भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दुलारे नौजवानों में शामिल था।

पीएम के शपथ ग्रहण के लिए निमंत्रण

तस्वीरें भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं के साथ हैं। वे कह सकते हैं कि ज़रूरी नहीं हर तस्वीर खिंचानेवाले को वे जानते हों। लेकिन वह हमें सबूत देता है कि उसे नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया गया था। यही नहीं, रक्षा मंत्रालय के कार्क्रम में भी उसे आमंत्रित किया गया था। इसका मतलब यही है कि स्वतंत्र भारद्वाज ने भारतीय राजकीय तंत्र के भीतर अपनी पैठ बना ली थी।

स्वतंत्र भारद्वाज हिंदुत्ववादी राज्य के भीतर अपनी स्थिति को लेकर इतना निश्चिंत था कि सार्वजनिक तौर पर उसे यह स्वीकार करने में कोई हिचक न हुई कि उसने हिंसा की है और उसका नतीजा हत्या में हो सकता था। लेकिन इतना संगीन अपराध करने के बाद भी उसे गिरफ़्तार नहीं किया गया क्योंकि वह न सिर्फ़ चिराग़ पासवान, कपिल मिश्रा का आदमी है बल्कि वह बिना किसी परीक्षा के पुलिस का आदमी भी है।

चिराग़ पासवान ने ख़ुद को अलग किया

चिराग़ पासवान को तुरत ख़ुद को उससे अलग करना पड़ा क्योंकि उसने जिन पर हमला किया था, वे दलित हैं। चिराग़ के लिए यह काफ़ी नुक़सानदेह होगा कि दलितों को यह लगे कि एक दलित विरोधी गुंडा चिराग़ का करीबी है। लेकिन अब तक न तो कपिल मिश्रा, न मनोज तिवारी या भाजपा ने ख़ुद को स्वतंत्र भारद्वाज से दूर करने की ज़रूरत महसूस की है। हर मसले पर फ़ौरन ट्वीट करनेवाली पार्टी ने स्वतंत्र भारद्वाज के बयान की निंदा नहीं की है। जिस मसले पर पूरे देश में बहस हो रही है, उस पर वह ख़ामोश है। यह मौन स्वतंत्र भारद्वाज के प्रति उसके समर्थन का वक्तव्य है।

अगर बीजेपी को इतना वक्त गुजर जाने के बाद कभी स्वतंत्र भारद्वाज की आलोचना करनी भी पड़े तो उसका मतलब यही होगा कि वह यह करना तो नहीं चाहती थी लेकिन हिंदुत्व के शत्रु अभी भी इतने मज़बूत हैं कि उसे मजबूरी में ऐसा करना पड़ रहा है। इसका आशय यह है कि स्वतंत्र भारद्वाज के रास्ते जाना ग़लत नहीं है, असल ज़रूरत स्वतंत्र जैसे लोगों के लिए सुरक्षित माहौल बनाना है। वह तभी हो सकता है, जब बीजेपी को निरंकुश सत्ता मिल जाए और उसके रास्ते से ‘दिमाग़ी नक्सल’ काँटे साफ़ कर दिए जाएँ। तब स्वतंत्र जैसे बीजेपी के असली मित्रों को कोई ख़तरा न होगा।
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स्वतंत्र भारद्वाज अकेला नहीं

पत्रकारों ने ध्यान दिलाया है कि स्वतंत्र भारद्वाज कोई अपवाद नहीं है। उसके पहले दक्ष चौधरी, पिंकी चौधरी, मोनू मानेसर, रिद्धिमा शर्मा जैसे गुंडे खुलेआम हिंसा करते हुए ख़ुद वीडियो बनाते रहे हैं। उनका निशाना हमेशा मुसलमान या ईसाई होते हैं और कभी कभी वे हिंदू भी जिन्हें बीजेपी और नरेंद्र मोदी अर्बन नक्सल या दिमाग़ी नक्सल कहते हैं। इन गुंडों में ज़्यादातर ‘उच्च जाति’ के हिंदू होते हैं। इनका आत्मविश्वास अलग क़िस्म का है क्योंकि इन्हें पीढ़ियों से दलितों को गाली-गलौज करने और उनके ख़िलाफ़ हिंसा की छूट मिली हुई है। संविधान ने अब उस हिंसा को, जो इनका अधिकार हुआ करता था, अब अपराध घोषित कर दिया है। आज ‘उच्च जाति’ की नई पीढ़ी हिंसा का पारंपरिक अधिकार वापस माँग रही है। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह बहुत मुफ़ीद है। इसीलिए उसने जंतर मंतर पर आरक्षण विरोधी आंदोलन पर भी अपना मुँह नहीं खोला है।

बीजेपी और स्वतंत्र भारद्वाज का गठजोड़ भारत के लिए ख़तरनाक है लेकिन वह स्वाभाविक है। भारत के लिए असल ख़तरा है भारतीय राजकीय तंत्र के साथ स्वतंत्र भारद्वाज का गठजोड़। उसके लिए जितना बीजेपी जवाबदेह है उतना ही भारत का प्रशासनिक और पुलिस तंत्र। राज्य के गुंडाकरण को रोकना फ़ौरी ज़रूरत है।