SIR में मतदाता सूची से नाम कटने के बाद डिपोर्टेशन का सामना कर रहे एक शख्स के मामले में सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ जमीन की रजिस्ट्री या इसके दस्तावेज किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता साबित नहीं करते। अदालत ने कहा कि कोई विदेशी नागरिक भी भारत में संपत्ति खरीद सकता है, इसलिए केवल जमीन के रिकॉर्ड के आधार पर किसी को भारतीय नागरिक नहीं माना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी उस वक़्त की जब पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद निवासी नासिर मोल्ला के मामले की सुनवाई हो रही थी। नासिर का नाम एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से कट गया था और इसके बाद उनको गिरफ़्तार किया गया। नासिर पर बांग्लादेशी नागरिक होने का संदेह है और वह फिलहाल डिपोर्टेशन की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।
नासिर मोल्ला को 18 जून को पुलिस ने हिरासत में लिया था। अधिकारियों को संदेह है कि वह बांग्लादेशी नागरिक हैं और अवैध रूप से भारत में रह रहे थे। गिरफ्तारी के बाद उन्हें लालगोला होल्डिंग सेंटर में रखा गया है। नासिर के परिजनों का दावा है कि वह भारतीय नागरिक हैं और उन्हें ग़लत तरीके से हिरासत में लिया गया है। इसी आधार पर परिवार ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

कोर्ट ने मांगा नागरिकता का प्रमाण

मामले की सुनवाई जस्टिस देबांगसु बसाक और जस्टिस एम.डी. शब्बार रशीदी की खंडपीठ ने की। अदालत ने नासिर के चचेरे भाई सुमन मोल्ला से कहा कि वे ऐसे दस्तावेज पेश करें जिनसे नासिर की भारतीय नागरिकता साफ़ तौर पर साबित हो सके। इसके जवाब में सुमन मोल्ला ने नासिर के नाम पर दर्ज जमीन की रजिस्ट्री और ज़मीन रिकॉर्ड अदालत में पेश किए।

नासिर मोल्ला की जमीन के दस्तावेज देखने के बाद हाईकोर्ट ने साफ़-साफ़ कह दिया कि भूमि रिकॉर्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, 'कोई विदेशी नागरिक भी भारत में संपत्ति खरीद सकता है। केवल भारत में जमीन खरीद लेने से वह व्यक्ति स्वतः भारतीय नागरिक नहीं बन जाता।' कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया जिससे नासिर की भारतीय नागरिकता अंतिम रूप से साबित हो सके।

परिवार को मिला आखिरी मौका

हालाँकि अदालत ने परिवार को राहत देते हुए एक अंतिम अवसर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई तक नासिर की भारतीय नागरिकता साबित करने वाले ठोस दस्तावेज शपथपत्र के साथ पेश किए जाएं। कलकत्ता हाईकोर्ट ने नासिर मोल्ला के परिवार को 20 जुलाई तक का समय दिया है। यदि इस दौरान परिवार उनकी भारतीय नागरिकता साबित करने वाले ठोस दस्तावेज पेश करता है तो अदालत आगे इस मामले पर फैसला करेगी।
सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार ने अदालत में एक रिपोर्ट भी पेश की। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने कहा कि पूछताछ के दौरान नासिर मोल्ला ने कथित रूप से स्वीकार किया कि 'उनका जन्म बांग्लादेश के रोहिमपुर में हुआ था। करीब 14-15 साल पहले वह अवैध रूप से भारत आए थे।' हालाँकि नासिर के परिवार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज किया है।

नासिर के रिश्तेदारों का कहना है कि वह जन्म से भारतीय नागरिक हैं। परिवार के मुताबिक उनके पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी जैसे सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं। उन्होंने पहले कई चुनावों में मतदान भी किया था। परिजनों का कहना है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के दौरान उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया।

'केरल में नौकरी कर रहे थे तो छूटा नाम'

नासिर के वकील ने अदालत को बताया कि जब SIR की प्रक्रिया चल रही थी, तब नासिर केरल में काम कर रहे थे। बाद में उन्होंने अपने चचेरे भाई के पते से नाम जोड़ने के लिए ज़रूरी फॉर्म भरा, लेकिन इसके बावजूद उनका नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किया गया। इसके खिलाफ उन्होंने एसआईआर अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील भी की, लेकिन वह अभी तक लंबित है।

फिलहाल हाईकोर्ट की टिप्पणी ने एक अहम कानूनी सिद्धांत को साफ़ कर दिया है कि जमीन के कागजात या संपत्ति का मालिक होना किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता है।

पासपोर्ट और नागरिकता पर भी चल रही है बहस

यह मामला तब सामने आया है जब नागरिकता और पहचान से जुड़े दस्तावेजों पर देशभर में बहस जारी है। हाल ही में केंद्र सरकार ने भी साफ़ किया था कि पासपोर्ट अपने आप में भारतीय नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता है।

इसी बीच पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण और संभावित एनआरसी जैसी चर्चाओं के कारण नागरिकता का मुद्दा राजनीतिक और क़ानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

SIR से नाम कटा तो पासपोर्ट भी रुका!

हाल में पश्चिम बंगाल में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें मतदाता सूची से नाम कटने के बाद ऐसे लोगों के पासपोर्ट का रिन्यूअल रुक गया है! इस मामले में हाईकोर्ट का फ़ैसला भी आया था। कलकत्ता हाईकोर्ट की जलपाईगुड़ी बेंच ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए साफ़ किया कि किसी भी व्यक्ति को नागरिकता की पुष्टि के बिना पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता है। अदालत ने SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटा दिए जाने के बाद एक व्यक्ति को तत्काल पासपोर्ट जारी करने का निर्देश देने से साफ़ इनकार कर दिया।
यह मामला कूचबिहार जिले के तूफानगंज विधानसभा क्षेत्र के निवासी सिराजुल शेख का था। सिराजुल ने हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर मांग की थी कि पासपोर्ट अधिकारियों को उनका 'होल्ड' पर रखा गया पासपोर्ट आवेदन आगे बढ़ाने का निर्देश दिया जाए। हालाँकि हाल ही में कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार आर राजगोपाल का पासपोर्ट का रिन्यूअल इन्हीं वजहों से रोक दिया गया था। लेकिन मामला मीडिया में उछलने, केरल के सीएम वीडी सतीशन के हस्तक्षेप पर कोलकाता पुलिस ने उनका वेरिफिकेशन कर दिया और उनके पासपोर्ट का रिन्यूअल हो गया। लेकिन पत्रकार राजगोपाल जैसा प्रिविलेज हर भारतीय को हासिल नहीं है।

वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं: SC

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ही दो टूक कह दिया है कि वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब नागरिकता ख़त्म होना नहीं है। कोर्ट ने दोहराया कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यह टिप्पणी तब की जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने बिहार SIR मामले के फ़ैसले में पहले ही साफ़ कर दिया था कि चुनाव आयोग के पास केवल मतदाता सूची तैयार और संशोधित करने का अधिकार है। इसने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम संदेहास्पद नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जाता है तो चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह उस मामले को केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के पास भेजे, जहां नागरिकता कानून के तहत अंतिम फैसला किया जाएगा।