देश भर में एसआईआर के दौरान करोड़ों लोगों का वोटर लिस्ट से नाम काटना किस तरह नागरिक पहचान का संकट खड़ा कर रहा है उसे द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल की व्यथा से समझा जा सकता है। आर. राजगोपाल ने दावा किया है कि मतदाता सूची से उनका नाम हटाए जाने के बाद वे न केवल मतदान के अधिकार से वंचित हो गए, बल्कि उनका पासपोर्ट रिन्यूअल भी अटक गया। उन्होंने अपनी पूरी आपबीती सोशल मीडिया पर साझा करते हुए कहा है कि उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन लाखों भारतीयों की है जो अपनी नागरिक पहचान साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मार्च में वोटर लिस्ट से हटा नाम

राजगोपाल ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि मार्च 2026 में कोलकाता के बालीगंज विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया। उनके अनुसार, SIR के दौरान अधिकारियों को न तो उनका और न ही उनके दिवंगत पिता का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में मिला। इसी आधार पर उनका नाम सूची से हटा दिया गया।

उन्होंने लिखा कि उनके पिता एक गांधीवादी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर और केरल में गांधी स्मारक निधि के पूर्व राज्य सचिव थे, जिनका 2016 में निधन हो चुका है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतने सजग मतदाता रहे उनके पिता का नाम मतदाता सूची में कैसे नहीं मिला।
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27 लाख लोगों के साथ हुए सूची से बाहर

राजगोपाल का कहना है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख लोगों के नाम तथाकथित 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए। उन्होंने मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र समेत अन्य दस्तावेज जमा किए, लेकिन उन्हें कोई साफ़ कारण नहीं बताया गया। उन्होंने बताया कि उनका मामला अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित एक ट्रिब्यूनल के सामने लंबित है। इसी वजह से वे हाल में हुए चुनाव में मतदान भी नहीं कर सके।

पासपोर्ट रिन्यूअल भी अटका

राजगोपाल ने बताया कि उन्होंने 19 मार्च 2026 को पासपोर्ट रिन्यूअल के लिए बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन पुलिस सत्यापन नहीं हो सका क्योंकि उनका नाम मतदाता सूची में नहीं था।

राजगोपाल का कहना है कि उन्होंने कई वैकल्पिक दस्तावेज जमा किए, लेकिन उन्हें पर्याप्त नहीं माना गया। 27 जून को उनके बायोमेट्रिक हुए 100 दिन पूरे हो गए।

पिछले सप्ताह उन्हें पासपोर्ट कार्यालय से बताया गया कि कोलकाता पुलिस ने मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर एडवर्स यानी प्रतिकूल रिपोर्ट भेजी है। हालाँकि उन्हें क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में तत्काल उपस्थित होने को कहा गया, लेकिन ऑनलाइन अपॉइंटमेंट 17 जुलाई 2026 की मिली।

बेटी की शादी में भी नहीं जा सके

राजगोपाल ने बताया है कि उनकी बेटी अमेरिका के कैलिफोर्निया में पत्रकार हैं और उनकी 17 अप्रैल को सैन फ्रांसिस्को में शादी हुई। लेकिन पासपोर्ट रिन्यूअल अटके रहने के कारण वह शादी में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने कहा कि उनके पास अमेरिका का वैध 10 वर्षीय वीजा था, लेकिन सक्रिय पासपोर्ट न होने के कारण विदेश यात्रा संभव नहीं थी। राजगोपाल की इस व्यथा को परंजॉय गुहा ठाकुरता ने भी एक्स पर साझा किया है। 

'हर दिन पुराने दस्तावेज़ खोजने में बीत रहा है'

राजगोपाल ने लिखा कि अब उनकी सुबह वोटिंग अधिकार से जुड़ी अपील और पासपोर्ट आवेदन की स्थिति देखने से शुरू होती है। इसके बाद वे अपनी मां और पिता से जुड़े दशकों पुराने रिकॉर्ड जुटाने की कोशिश करते हैं।

उन्होंने बताया कि वे उस कॉलेज से संपर्क कर रहे हैं जहां उनकी मां 1965 में पढ़ाती थीं और उस स्कूल से भी जहां उन्होंने 1959 में पढ़ाई की थी, ताकि यह साबित किया जा सके कि उनका परिवार वास्तव में अस्तित्व में था। साथ ही वे केरल में शराबबंदी अभियान से जुड़े पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क कर रहे हैं, ताकि उनके पिता के सामाजिक कार्यों से जुड़े पुराने समाचार, तस्वीरें और दस्तावेज़ मिल सकें।

'मेनस्ट्रीम मीडिया का आम लोगों से सरोकार कम हो गया'

राजगोपाल ने कहा कि कई मित्रों और सार्वजनिक जीवन के लोगों ने उनकी मदद की है, लेकिन किसी बड़े मीडिया संस्थान या पत्रकार संगठन ने उनके मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई।

उन्होंने साफ़ किया कि उनका मक़सद खुद को पीड़ित के रूप में पेश करना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि यदि एक ऐसे व्यक्ति को, जिसने वर्षों तक पत्रकारिता की और एक प्रमुख अखबार का संपादन किया, अपनी पहचान साबित करने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ रहा है, तो समाज के सबसे कमजोर और हाशिए के लोगों की स्थिति कितनी मुश्किल होगी।

उन्होंने लिखा, 'मैं यह मुद्दा अपने बारे में नहीं बनाना चाहता था। लेकिन अब मुझे यह और अधिक साफ़ हो गया है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता का आम लोगों के जीवन से संबंध लगातार कमजोर होता जा रहा है।'
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नागरिकता और पहचान पर बहस

राजगोपाल की यह टिप्पणी तब आई है जब देश में मतदाता सूची के पुनरीक्षण, नागरिक पहचान और सरकारी दस्तावेजों की वैधता को लेकर बहस तेज है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि हाल ही में सरकार ने दोहराया था कि पासपोर्ट स्वयं नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाता।

उनका कहना है कि आज उनकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे वर्षों पुराने दस्तावेज़ जुटाकर अपनी पहचान और अधिकारों को फिर से साबित कर सकें।