पश्चिम बंगाल में 60 विधायकों के विद्रोह के बाद ममता बनर्जी के सामने टीएमसी को बचाए रखने की चुनौती सामने आ गई है।
टीएमसी में बड़ी बगावत के बाद पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अपनी सभी पार्टी कमेटियों और मोर्चा संगठनों को तुरंत भंग कर दिया है। पार्टी ने कहा है कि अब सभी स्तर पर गंभीर आत्म-मंथन किया जाएगा, इसकी समीक्षा की जाएगी और संगठन में कमियों व गड़बड़ियों का पूरा आकलन किया जाएगा। इसके बाद नये संगठन की घोषणा की जाएगी।
नये संगठन की घोषणा जल्द: टीएमसी
टीएमसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी करते हुए कहा, 'सावधानीपूर्वक विचार-विमर्श के बाद यह फैसला लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियां और उसके सभी मोर्चा संगठन तुरंत भंग कर दिए जाएंगे। पार्टी हर स्तर पर आत्म-मंथन, प्रदर्शन की समीक्षा और संगठन के स्तर पर मूल्यांकन करेगी। इसके आधार पर मूल संगठन और सभी मोर्चा संगठन नये बनाए जाएँगे। समय रहते नये संगठन की घोषणा की जाएगी।' इसने कहा है कि पार्टी संगठन को मजबूत करने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है।
बागियों की खुली चुनौती
यह फ़ैसला बुधवार को विधानसभा में हुए घटनाक्रम के बाद आया। निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी 60 विधायकों के समर्थन के दावे के साथ विधानसभा पहुंचे और मुख्य विपक्षी दल का दावा किया। ममता बनर्जी ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया था, लेकिन बागी गुट ने इसे खारिज कर दिया। बागियों ने अपने पत्र में कहा कि वे ममता बनर्जी को अपना नेता मानते हैं, लेकिन ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाना चाहते हैं।
एंटी-डिफेक्शन से कैसे बचेंगे बागी?
टीएमसी के कुल 80 विधायक थे। दो विधायकों- संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया गया। अब संख्या 78 रह गई। एंटी-डिफेक्शन क़ानून से बचने के लिए दो-तिहाई यानी क़रीब 52 विधायकों के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं। दावा किया गया है कि मंगलवार दोपहर तक 57 और बुधवार सुबह तक 59 विधायकों ने बागी गुट के साथ जाने की सहमति दे दी। पहले के संकेत भी साफ़ थे। 6 मई को ममता बनर्जी के घर हुई बैठक में 80 में से सिर्फ 69 विधायक पहुंचे। 19 मई को संख्या घटकर 64 रह गई और 31 मई को सिर्फ 19 विधायक ही आए।
शुभेंदु अधिकारी के बयान के बाद विवाद
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा था कि ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने स्पीकर रथिंद्र बोस को शिकायत दी कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने वाले प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर जाली लगाए गए। इसके बाद दोनों को पार्टी से निकाल दिया गया। शोभनदेब चट्टोपाध्याय टीएमसी के वरिष्ठ नेता हैं। शोभनदेब चट्टोपाध्याय बंगाल में एकमात्र ऐसे विधायक हैं जिन्होंने 10 बार लगातार चुनाव जीता है। 1998 में जब ममता बनर्जी ने टीएमसी बनाई थी तब से वे उनके साथ हैं। उन्होंने कृषि, संसदीय मामलों, बिजली और गैर-पारंपरिक ऊर्जा जैसे कई अहम विभाग संभाले हैं।
ममता के साथ कौन बचा?
हाल के दिनों में ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई कई बैठकों में बड़ी संख्या में विधायक गायब रहे। जब ममता बनर्जी ने कोलकाता में पोस्ट-पोल हिंसा और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी पर हमले के खिलाफ प्रदर्शन किया तो उनके साथ 9 नेता दिखे थे जिसमें से सिर्फ 8 विधायक ही नजर आए। इनमें नयना बंद्योपाध्याय, फिरहाद हकीम, कुणाल घोष, बिमान बंदोपाध्याय, शोभनदेब चट्टोपाध्याय, मदन मित्रा, अशोक देब और असीमा पात्रा शामिल थे।
इनमें से कई नेता 1998 से ममता बनर्जी के साथ हैं। मदन मित्रा और फिरहाद हकीम लंबे समय से पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। फिरहाद हकीम को हाल ही में टीएमसी का चीफ व्हिप बनाया गया है, जिसे बागी विधायकों ने चुनौती दी है।'अभिषेक या ममता का विरोध'
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार ममता बनर्जी के क़रीबी एक वरिष्ठ नेता ने कहा, '60 से ज़्यादा विधायकों का यह क़दम सिर्फ अभिषेक बनर्जी के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के खिलाफ विद्रोह है। इससे साबित होता है कि ज्यादातर विधायक अब उनके नियंत्रण में नहीं हैं।' बीजेपी ने इसे टीएमसी का आंतरिक संकट बताया है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव बाद संकट
यह पूरा संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की बुरी हार के बाद सामने आया है। पार्टी अब अपने संगठन को पूरी तरह नया रूप देने की तैयारी में है। टीएमसी के इस बड़े फ़ैसले से साफ़ है कि पार्टी गंभीर संकट से गुजर रही है और अब जड़ों तक बदलाव लाने की कोशिश कर रही है।