क्या ममता बनर्जी आख़िरी दम तक चुनाव आयोग का पीछा नहीं छोड़ेंगी? संसद से सड़क तक विरोध-प्रदर्शन के बाद अब टीएमसी ने हाई कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया है? पढ़िए, ममता का चुनाव आयोग पर आरोप क्या।
ज्ञानेश कुमार, ममता बनर्जी।
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा किए गए अफसरों के ताबड़तोड़ तबादले का विवाद अब हाई कोर्ट पहुँच गया है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने शुक्रवार को कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। वह राज्य के कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले के चुनाव आयोग के आदेश पर सवाल उठा रहे हैं।
यह याचिका 15 मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा के ठीक बाद हुए इन तबादलों के ख़िलाफ़ है। कल्याण बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी इस मामले में पक्षकार बनाया है। कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सुजॉय पॉल की डिवीजन बेंच के सामने इस मामले का ज़िक्र किया गया। याचिकाकर्ता के वकील ने जल्द सुनवाई की मांग की। यह याचिका अगले हफ्ते की शुरुआत में सुनी जा सकती है।
याचिका में मुख्य शिकायत यह है कि चुनाव आयोग ने राज्य सरकार से कोई सलाह लिए बिना ये तबादले किए। यह चुनाव के नियमों के ख़िलाफ़ बताया जा रहा है।
चुनाव आयोग ने 15 मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीख़ें घोषित की थीं। घोषणा के कुछ घंटों के अंदर ही राज्य के कई बड़े अधिकारी बदल दिए गए। इनमें चीफ़ सेक्रेटरी, होम सेक्रेटरी, डीजीपी यानी पुलिस महानिदेशक जैसे बड़े नाम शामिल थे। पिछले चार दिनों में 50 से ज़्यादा वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को हटाया या ट्रांसफर किया गया। पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनाव दो चरणों में होंगे। पहला चरण 23 अप्रैल को और दूसरा चरण 29 अप्रैल को होगा। वोटों की गिनती 4 मई को होगी।
तबादलों पर ममता बोलीं- 'अघोषित इमरजेंसी'
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग पर हमलावर हैं। उन्होंने चुनाव आयोग के फ़ैसले को 'अघोषित इमरजेंसी' बताया। ममता ने कहा कि यह राजनीतिक बदले की भावना से किया गया 'अघोषित राष्ट्रपति शासन' जैसा है।उन्होंने एक्स पर पोस्ट में लिखा कि चुनाव आयोग ने बंगाल को निशाना बनाया है। उन्होंने कहा, 'यह अभूतपूर्व है। संस्थाओं का दुरुपयोग करके राज्य पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है।' ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि बीजेपी जनता का विश्वास नहीं जीत पाई, इसलिए जबरदस्ती और धमकी से राज्य हथियाने की कोशिश कर रही है।
'चुनाव अधिसूचना से पहले ही 50 बड़े अफसर हटाए'
मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव की अधिसूचना से पहले ही 50 से ज़्यादा बड़े अधिकारी हटा दिए गए। इसमें चीफ़ सेक्रेटरी, होम सेक्रेटरी, डीजीपी, एडीजी, आईजी, डीआईजी, डीएम और एसपी शामिल हैं। ममता ने इसे सबसे ऊंचे स्तर का राजनीतिक हस्तक्षेप बताया। उन्होंने कहा कि यह शासन नहीं, बल्कि अराजकता और अक्षमता है, जिसे अधिकार के नाम पर दिखाया जा रहा है।
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कुछ आईपीएस अधिकारियों को तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भेजा गया था, लेकिन बाद में पांच नाम वापस ले लिए गए। इनमें बिधाननगर पुलिस कमिश्नर मुरलीधर शर्मा और सिलीगुड़ी पुलिस कमिश्नर वकार राजा शामिल हैं। राज्य सरकार ने हटाए गए 13 जिला मजिस्ट्रेटों के लिए वैकल्पिक पद दिए हैं।
इससे पहले ममता ने मंगलवार को चुनाव आयोग पर तंज कसते हुए कहा था,
अंधेरे में छिपकर काम करने के बजाय चुनाव आयोग को अब खुलकर बीजेपी के लिए प्रचार करना शुरू कर देना चाहिए, कम से कम यह ज़्यादा ईमानदारी भरा होगा। ममता बनर्जी
मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
ममता ने आरोप लगाया कि पिछले चार महीनों से बीजेपी के 'दिल्ली के ज़मींदारों' ने पूरे राज्य प्रशासन को बेरहमी से अपनी गिरफ्त में जकड़ रखा है और एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार की हर शक्ति छीन ली है। उन्होंने कहा कि 'वे अधिकारियों को हटा सकते हैं। वे पुलिसकर्मियों का तबादला कर सकते हैं। वे सैकड़ों चुने हुए पर्यवेक्षकों को बाहर से ला सकते हैं। हो सकता है कि उन्होंने हर संस्था पर कब्ज़ा कर लिया हो। लेकिन एक चीज़ है जिस पर वे कभी कब्ज़ा नहीं कर पाएँगे, वह है जनता की ताक़त। और बंगाल की जनता की यही अजेय शक्ति बीजेपी को इस धरती से हमेशा-हमेशा के लिए उखाड़ फेंकेगी।'
सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग: TMC
तबादलों की घोषणा के तुरंत बाद टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय ने कहा था कि बीजेपी चुनाव जीतने के लिए सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग कर रही है। उन्होंने कहा था, 'बीजेपी हर तरकीब इस्तेमाल कर रही है। मुख्य सचिव को इसी वजह से हटाया गया। जनता तृणमूल के साथ है।' पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे। पहले चरण में 23 अप्रैल को और दूसरे चरण में 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। वोटों की गिनती 4 मई को होगी।
बहरहाल, यह मामला अब कोर्ट में है और राजनीतिक गर्मी बढ़ गई है। टीएमसी इसे लोकतंत्र पर हमला बता रही है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए ये क़दम जरूरी हैं। आगे क्या होता है, यह कोर्ट की सुनवाई पर निर्भर करेगा।